A Dark Secret – Chapter 397
"नहीं," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ तेज़ थी। "तू अभी-अभी अपना नाम पाया है। मैं उसे किसी को नहीं दूँगी।"
बूढ़ा हँसा। "तो तेरा नाम दूँगी?"
मैंने उसकी कलाई का धागा देखा। फिर उसका चेहरा। फिर मैंने जेब से सुशीला की पीली पुड़िया निकाली और उसके सामने रख दी।
"मेरा नाम तेरे पास है," मैंने कहा। "मैं उसे वापस माँगने नहीं आई। मैं उसे बेचने के लिए भी नहीं आई।"
उसकी आँखें सिकुड़ीं।
"मैं यह पूछने आई हूँ कि तूने किसको बेचा।" मैंने उसकी कलाई की तरफ़ इशारा किया। "यह धागा मतलब तेरा नाम किसी के पास है। किसके पास है?"
बूढ़ा कुछ देर चुप रहा। फिर उसने धीरे से कहा, "मनोहर के पास। मनोहर ने मेरा नाम लिया था, यह सोचकर कि मैं उसके लिए काम करता रहूँगा। पर मनोहर खुद किसी और के पास है।"
"किसके?"
"खरीदार के। और खरीदार…" उसने दीवार की तरफ़ देखा। "खरीदार तो तुमने खुद रखवाला बना दिया।"
मैंने रामदीन की तरफ़ देखा। रामदीन ने गर्दन हिलाई — हाँ, वह जानता है। पर उसकी आँखों में सवाल था — खरीदार से पहले कौन था?
मैंने बूढ़े से पूछा, "और खरीदार से पहले?"
"खरीदार से पहले कुछ नहीं था।" उसकी आवाज़ भारी थी। "मैं था, सिर्फ़ मैं। चालीस साल पहले बाबू हरनाम ने मुझे बुलाया था, और मैं उसके घर गया। उसने कहा — तू नाम इकट्ठे करता है? मैंने कहा — हाँ। उसने कहा — फिर इकट्ठे कर, और बेच। मैंने बेचे।"
वह रुका। खाँसा। फिर बोला, "अब मैं पूछता हूँ कि क्या मेरा नाम वापस आएगा?"
बाई आगे आई। वह अब तक चुप थी, पर अब उसने कहा, "तेरा नाम कभी गया ही नहीं। तूने उसे कभी लिखा ही नहीं।"
बूढ़े ने उसकी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो बीस साल में नहीं आया था।
"तू…" उसने धीमे से कहा।
"हाँ," बाई ने कहा। "मैं वही हूँ। जिसे बाबू ने तेरे साथ भेजा था कि तू मेरा भी नाम लिख दे। पर तूने नहीं लिखा। तूने कहा — यह तो अभी छोटी है।"
वह मुस्कुराई। पहली बार।
"इसीलिए मैं अब भी यहाँ हूँ। और तू अब भी यहाँ है। हम दोनों… बच गए।"
बूढ़े की आँखें भर आईं। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया, पर बाई ने नहीं पकड़ा। वह पीछे हटी और मेरी तरफ़ मुड़ी।
"अब तू जानती है," उसने कहा। "तुझे किसी नाम की ज़रूरत नहीं। तुझे चाहिए — वह नाम जो सुशीला ने तुझे दिया था, वह नाम जो गिरवी है, वह नाम जो इस आदमी के पास है, और वह नाम जो खरीदार के पास है।"
"और इन सबका एक ही नाम?" मैंने पूछा।
"हाँ," बाई ने कहा। "सिर्फ़ एक।"
वह सीढ़ियों की तरफ़ मुड़ी, फिर रुकी। "और एक बात — अब तू रामदीन का नाम दीवार पर लिखा हुआ नहीं छोड़ सकती। काग़ज़ पर लिखा नाम दीवार पर तभी जाता है जब कोई उसे बोले। आज तेरे पास वक़्त है, कल नहीं।"
वह चली गई। बूढ़ा हमें देखता रहा, और उसकी कलाई का काला धागा धीरे-धीरे कसने लगा, जैसे कोई किसी शब्द का इंतज़ार कर रहा हो।
रामदीन ने अपनी जेब से वह काग़ज़ निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ाया। "तू इसे रख। मुझे नहीं पता क्या करना है।"
मैंने काग़ज़ लिया, और उस पर अपनी उँगली रखी। स्याही सूखी थी, पर गरम थी।
"इसे पहले दीवार पर नहीं," मैंने कहा। "इसे पहले उसके नाम वाले आदमी तक ले जाना है।"
"मनोहर?" रामदीन ने पूछा।
"मनोहर के पास तेरा नहीं, अपना नाम भी नहीं बचा," मैंने कहा। "पर उसके पास यह पता है कि सुशीला का नाम किसने लिया। और वह अब भी हवेली में है — काजल के पास।"
मैंने काग़ज़ जेब में रखा और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ी।
तभी बूढ़े की आवाज़ आई — धीमी, आख़िरी साँस जैसी। "वह जो दीवार पर लिख रहा था… वह तेरे नाम की तरफ़ बढ़ रहा है।"
मैं रुकी। पलटी।
"क्या?"
"वह स्याही जो काग़ज़ से दीवार पर आई," उसने कहा। "वह एक नाम का रास्ता बना रही है। जब वह रास्ता पूरा हो जाएगा, वह नाम अपने आप चला जाएगा।"
"कौन सा नाम?"
वह मुस्कुराया, और उसकी आँखें बंद होने लगीं। "जिसका कोई नाम है ही नहीं।"
बाई ने बाहर से आवाज़ दी — "मीरा! नीचे आ! डॉक्टर आ रहा है!"
मैं सीढ़ियों की तरफ़ भागी। रामदीन मेरे पीछे था। और पीछे, बूढ़े के बिस्तर पर, चादर पर एक पतली काली लकीर बन रही थी — वही स्याही, वही रास्ता — जो अब किसी ऐसे नाम की तरफ़ बढ़ रही थी जिसे किसी ने नहीं लिखा था।
॥
सीढ़ियों से उतरते वक़्त मेरे हाथ में वह काग़ज़ था जिस पर रामदीन ने अपना नाम लिखा था, और वह काग़ज़ अब भी गरम था। भैरों नीचे था, तीसरी मंज़िल के मोड़ पर, दीवार से टिका हुआ, हाथ जेब में। मुझे देखते ही सीधा हो गया।
"बूढ़ा बोल रहा है?" उसने पूछा।
"बोल रहा है," मैंने कहा। "और बहुत कुछ बोल रहा है। चल, दूसरी मंज़िल। वार्ड के आख़िरी बिस्तर पर है।"
भैरों ने एक पल मेरे हाथ में वह काग़ज़ देखा। "यह क्या है?"
"रामदीन का नाम। पहला साफ़ नाम। जो खुद लिखा गया है।" मैंने काग़ज़ तह करके जेब में रखा। "चल।"
दूसरी मंज़िल के वार्ड में बारह बिस्तर थे। सात पर मरीज़ लेटे थे, और दो पर तकिये के नीचे हाथ रखे सो रहे थे, पर उनके आसपास कोई नहीं बैठा था। मुझे वह सबसे पहले पता चलता है — जिन बिस्तरों के आसपास कोई नहीं बैठा, वहाँ मरीज़ ज़्यादा देर नहीं टिकता।
आख़िरी बिस्तर, खिड़की के पास। बूढ़ा आदमी चादर में आधा सिमटा, आँखें खुली, दीवार देख रहा था। सिर के ऊपर बोर्ड था, और बोर्ड पर कोई नाम नहीं था, सिर्फ़ लकड़ी पर सुई से खरोंच हुआ "बारह"।
मैं बिस्तर के पास पहुँची। भैरों दरवाज़े के पास स्ट्रेचर की तरफ़ घूमकर खड़ा हो गया, और शायद कोई पूछ दे तो कहेगा कि वह भी मरीज़ का आदमी है।
"आपका नाम क्या है?" मैंने पूछा।
बूढ़े ने आँख मेरी तरफ़ घुमाई। धुँधली, पर भीतर कुछ तेज़ था। बोला, "पहले क्या था, या क्या है?"
"जो है।"
वह हँसा। खाँसी आ गई, खाँसी के बीच हँसी फँसी रह गई। "कुछ नहीं है," उसने कहा। "मेरा नाम बीस साल पहले तक सिर्फ़ बाबू हरनाम के काग़ज़ों में था। अब वहाँ भी नहीं। बोर्ड पर देख लेना — बारह। इतना ही बचा हूँ।"
"आपने नाम इकट्ठे किए," मैंने कहा। "बेचे।"
"हााँ।"
"किसके लिए?"
"पहले बाबू हरनाम के लिए। फिर उसकी बेटी काजल के लिए। फिर अपने लिए।" उसने चादर ऊपर सरकाई। "अपने लिए सबसे ज़्यादा।"
"हिसाब बताइए।"
"हिसाब नहीं है," वह बोला। "हिसाब तभी होता है जब दोनों तरफ़ लिखा हो। इसमें तो एक तरफ़ नाम जाता था, दूसरी तरफ़… कुछ नहीं।"
"फिर आपने बेचा क्यों?"
वह देर तक मुझे देखता रहा। फिर उसने चादर के नीचे से अपनी बाईं कलाई निकाली। काला धागा। वही धागा जो मनोहर के हाथ पर था, जो मेरे बहुत करीब आ चुका था। "इसलिए," उसने कहा। "यह धागा मेरी कलाई पर उस दिन बाँधा गया जिस दिन मैंने पहला नाम लिखा। तब यह सिर्फ़ एक धागा था। जब भी मैं एक नाम लिखता, यह ज़रा सा कसता। जब मैंने सौवाँ नाम लिखा, यह इतना कस गया कि रात को नींद नहीं आई। जब मैंने दो सौवाँ लिखा, मेरी उँगलियाँ सुन्न होने लगीं।"
"और जब आपने रुकना चाहा?"
"तब काजल आई," उसने कहा। "काजल ने कहा कि हिसाब पूरा करना है। मैंने कहा — नहीं करूँगा। उसने कहा — तेरा नाम कहाँ है, मालूम है? मैंने कहा — मेरे पास है। उसने कहा — दिखा। मैंने दिखाया।"
वह रुका। खिड़की से रोशनी आ रही थी, उसकी आँखें उसी में बंद हुई जैसे कोई चीज़ याद करके दुखी हो रहा हो।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno