A Dark Secret – Chapter 396
रामदीन ने गर्दन हिलाई, जैसे किसी पुराने दर्द को हिला रहा हो। फिर उसने वह काग़ज़ उठाया जिस पर उसने अपना नाम लिखा था, और उसे मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"तू रख," उसने कहा। "मेरे पास रहेगा तो फिर मिट जाएगा।"
मैंने काग़ज़ लिया और उसे अपनी जेब में रखा, तीनों गोलियों के साथ।
तभी सुमित्रा ने कुछ देखा। उसकी आवाज़ में हल्की घबराहट थी। "वो दीवार… देखो।"
हम पलटे।
दीवार पर जहाँ मैंने चाक का निशान लगाया था, वहाँ अब चाक नहीं था। वहाँ काली स्याही से एक पतली लकीर बन रही थी — वही लकीर जो काग़ज़ पर बनी थी, वही खुरदुरी, वही स्याही।
वह मेरी तरफ़ बढ़ रही थी। धीरे-धीरे, उँगली जितनी मोटी, दीवार पर एक आधा गोला बना रही थी।
लोग जमा होने लगे। एक नर्स आई, फिर वार्ड का एक मरीज़, फिर बेंच पर बैठी एक माँ अपने बच्चे को गोद में लेकर।
"यह क्या है?" नर्स ने पूछा।
"पता नहीं," मैंने कहा। पर मुझे पता था। रजिस्टर नाम पकड़ नहीं पा रहा था, इसलिए वह जगह पकड़ रहा था — कोई भी जगह, कोई भी सतह।
मैंने बाई से पूछा, "इसे रोकना है तो क्या करें?"
बाई ने दीवार देखी। "इसे रोकने का तरीक़ा — इसे पूरा करना। जो अधूरा है उसे पूरा होने दो, फिर देखो क्या होता है।"
मैंने रामदीन की तरफ़ देखा। वह उठ चुका था और दीवार के सामने खड़ा था, ठीक वहीं जहाँ स्याही चल रही थी। उसकी आँखें उस लकीर पर टिकी थीं, और मुझे लगा वह कुछ पढ़ रहा है।
"यह लिख रहा है," उसने धीमे से कहा। "यह मेरा गली नंबर लिख रहा है।"
"क्या?"
देखो — स्याही ने गोला पूरा किया और फिर उसके अंदर एक आकृति बनी, फिर दूसरी, फिर तीसरी। रामदीन ने पढ़ा — "छह। सात।" फिर रुककर — "नहीं, यह सात नहीं। यह…"
वह चुप हो गया। फिर बोला, "यह मेरा मकान नंबर है।"
उसकी आवाज़ टूट गई। "इकतालीस। मकान नंबर इकतालीस।"
दीवार पर लिखा था — "इकतालीस।"
दीवार अब पूरी तरह साफ़ थी। स्याही रुक गई, फिर सूख गई, फिर दीवार के रंग में घुल गई, जैसे कभी थी ही नहीं। बस एक हल्का सा सफ़ेद निशान बचा, दूध के बूँद जितना।
सुमित्रा ने मुँह खोला, पर कुछ नहीं कहा।
रामदीन ने अपनी जेब से वह काग़ज़ निकाला जो मैंने रखा था, और उसके नीचे एक नई लकीर थी — "गली छह, मकान इकतालीस, आवाज़: खुरदरी, धीमी।"
"तो अब?" मैंने बाई से पूछा।
"अब तेरा नाम," बाई ने कहा। "पर उससे पहले —" वह रुकी, और उसकी आवाज़ बदली। "तुझे उस आदमी को ढूँढ़ना होगा जो अब तक हर नाम बेचता आया है।"
मैंने कहा, "कौन?"
बाई ने अस्पताल की सीढ़ियों की तरफ़ देखा। "जो दूसरी मंज़िल के वार्ड में मरीज़ बनकर पड़ा है। उसका नाम अभी भी रजिस्टर में है, इसलिए वह खुद को छिपा नहीं पाता। पर वह जानता है कि कौन सा नाम कब उठेगा, और किसको कितने में बेचा जा सकता है।"
"काजल का खरीदार?"
"उससे बड़ा," बाई ने कहा। "वह सिर्फ़ हवेली खरीदता है। यह आदमी नाम खरीदता है।"
रामदीन ने काग़ज़ जेब में रखा और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। मैंने उसका हाथ पकड़ा।
"तू ऐसे नहीं जाएगा," मैंने कहा। "तू अभी-अभी अपना नाम पाया है। दो मिनट पहले तुझे अपनी गली याद नहीं थी, अब तू दूसरी मंज़िल पर जाने की बात कर रहा है।"
"इसीलिए जाना है," उसने कहा। "क्योंकि अब मुझे याद है कि वह आदमी कौन है।"
वह रुका। उसकी आँखों में कुछ चमका — पहचान का, किसी पुराने दुश्मन का। "चालीस साल पहले, जब मैं एम्बुलेंस चलाता था, एक आदमी अस्पताल आया था। उसने मरीज़ों के नाम पूछे, उनके घर पूछे, उनकी आवाज़ सुनी। मैंने सोचा — कोई सर्वे करने आया होगा।"
"फिर?"
"फिर वही नाम रजिस्टर में दिखे।" रामदीन ने अपना हाथ मेरी पकड़ से छुड़ाया, पर धीरे से। "मैं उसका चेहरा भूल गया था। अब याद आ रहा है — उसके चेहरे पर एक निशान था, दाईं तरफ़, कान के नीचे। जैसे कोई पुराना ज़ख़्म।"
हम सीढ़ियों की तरफ़ बढ़े। सुमित्रा पीछे रह गईं, पर बाई भी साथ चली। उसकी चाल अब पहले से तेज़ थी — जैसे शरीर को याद आ गया हो कि चलना कैसे होता है।
दूसरी मंज़िल का वार्ड छोटा था। बारह बिस्तर, आधे खाली। खिड़कियों पर धूल, और कोने में एक पंखा धीरे घूम रहा था। भीतर जाते ही मेरी नाक में वही महक आई — गोंद जैसी, मीठी, फँसी हुई। मैं रुक गई।
"यहाँ कोई है," मैंने धीमे से कहा। "जो सौदे से जुड़ा है।"
रामदीन ने बिस्तरों की तरफ़ देखा। ज़्यादातर मरीज़ सो रहे थे या खिड़की की तरफ़ देख रहे थे। पर एक बिस्तर पर, दाईं तरफ़, खिड़की के पास, एक आदमी लेटा था — चादर ओढ़े, चेहरा छिपाए, सिर्फ़ सफ़ेद बाल दिख रहे थे।
बाई ने उसकी तरफ़ इशारा किया।
मैं उसके पास गई। चार क़दम दूर रुकी। उसकी साँस धीमी थी, पर सो नहीं रहा था — उसकी उँगलियाँ चादर पर हिल रही थीं।
"तुम जानते हो मैं आई हूँ," मैंने कहा।
चादर हिली। एक हाथ बाहर आया — झुर्रियों वाला, पतला, नाखून पीले। फिर चेहरा दिखा। बूढ़ा आदमी, सत्तर से ऊपर, आँखें छोटी, चेहरे पर दाईं तरफ़, कान के नीचे, वही पुराना निशान।
उसने मुझे देखा और मुस्कुराया। "तू सुशीला की बेटी है।"
मेरा पेट कस गया। "तुमने मेरी माँ को कैसे पहचाना?"
"मैंने तुझे पहचाना, उसे नहीं।" उसने करवट बदली और बैठने की कोशिश की। रामदीन उसके बिस्तर के पास आ गया था, और उसके चेहरे को देखकर रुक गया।
"तू…" रामदीन ने कहा, और उसकी आवाज़ में चालीस साल पुरानी थकान थी। "तू वही है। जिसने मरीज़ों के नाम पूछे थे।"
"मैं वही हूँ," बूढ़े ने कहा। "और मैं अभी भी वही काम करता हूँ।"
"क्यों?" मैंने पूछा।
"क्योंकि नाम की कीमत होती है, बेटी। किसी को अपना नाम याद रखना होता है तो मुझसे खरीदता है। किसी को किसी और का नाम भुलाना होता है तो मुझसे खरीदता है। यह सौदा मैंने नहीं बनाया — मैंने सिर्फ़ उसका बाज़ार बनाया।"
"तुमने कितने नाम बेचे?"
"गिनती नहीं रखी। पर एक नाम ऐसा है जो मैंने बेचा नहीं, सिर्फ़ गिरवी रखा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तेरा।"
मेरा मुँह सूख गया।
"तेरी माँ ने तुझे बचाने के लिए तेरा नाम मुझे दिया था," वह बोला। "यह सोचकर कि मैं उसे रजिस्टर से बाहर रखूँगा। मैंने रखा भी। पर तेरी माँ नहीं जानती थी कि गिरवी रखी चीज़ वापस लेने के लिए मुझे कुछ चाहिए।"
"क्या चाहिए?"
वह हँसा। खाँसी में बदली हुई हँसी। "अब क्या चाहिए? अब मैं खुद काग़ज़ पर लिखा हूँ, बेटी। मेरा नाम भी अब किसी और के हाथ में है।" उसने चादर सरकाई और अपनी कलाई दिखाई। उस पर एक पतला काला धागा बँधा था। "यह धागा रजिस्टर का है। जिस दिन यह खुलेगा, मैं भूल जाऊँगा कि मैं कौन हूँ।"
रामदीन आगे आया। "तो तू हमें क्यों बता रहा है?"
"क्योंकि मुझे तेरा नाम चाहिए।" उसने रामदीन की तरफ़ देखा। "तूने आज अपना नाम खुद लिखा। जो अपना नाम खुद लिखता है, उसे कोई नहीं उठा सकता — पर उसे कोई बेच सकता है। मैं तुझे बेच नहीं रहा, मैं तुझसे माँग रहा हूँ। अपना नाम मुझे दे दे, और मैं तुझे बताऊँगा कि जो आदमी सुशीला का नाम ले गया, वह कौन है।"
मैंने कहा, "क्यों चाहिए तुझे उसका नाम?"
"क्योंकि मेरे पास कोई नाम नहीं बचा।" उसने अपनी कलाई उठाई। "अगर मैं किसी और का नाम नहीं पकड़ूँगा, तो यह धागा मेरे ही नाम पर खिंच जाएगा।"
रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। "मेरा नाम…"
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