A Dark Secret – Chapter 394
“तीनों गोलियाँ,” मैंने कहा। “और एक पीला काग़ज़।”
“काग़ज़ पर क्या था?”
“बाबू का पहला नाम। हरि हरनाम सिंह।”
बाई ने आँखें बंद कर लीं। “तो अब वह पूरा हो गया। बाबू काग़ज़ों में लौट आया। पर यह सिर्फ़ शुरुआत है।” उसने आँखें खोलीं। “अब रजिस्टर जाग जाएगा। पूरा। और जो रजिस्टर जागता है, वह किसी एक का नाम माँगता है — बदले में नहीं, शुरुआत में।”
“किसका नाम?”
“उसका जिसने सबसे बड़ी चीज़ छुपाई।”
मैंने उसकी आँखों में देखा। “किसने?”
बाई ने अपना हाथ वापस लिया और कलम उठाई। “सुशीला ने। तेरी माँ ने। उसने बाबू का नाम बचाया, पर अपना नाम उसी पन्ने पर जोड़ दिया। रजिस्टर ने वह पन्ना बाहर कर दिया, याद है ना? तूने खुद देखा था।”
“हाँ।”
“तो अब वह पन्ना कहाँ है?”
मैं रुक गई। हवेली में जो पन्ना था, वह जल गया था — काजल ने जलाया था। और जो पन्ना बाहर किया गया था, वह कहाँ था?
“बाई,” मैंने धीरे से कहा, “वह पन्ना कहाँ है?”
बाई ने कलम उठाकर काग़ज़ पर कुछ लिखा और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। उसकी लिखाई छोटी और झुकी हुई थी। मैंने पढ़ा — “खरीदार के पास।”
“पूरा पन्ना उसके पास है,” मैंने कहा। “यह तो मुझे पता है।”
“पर तू यह नहीं जानती कि वह उसे क्यों रखे हुए है,” बाई ने कहा। “वह उसे बेचने के लिए नहीं रखे हुए। वह उसे इसलिए रखे हुए है कि उस पन्ने से सौदा बंद होता है। जिस दिन वह पन्ना जल जाएगा, उस दिन रजिस्टर का सौदा खत्म। और खरीदार चाहता है कि सौदा खत्म हो, पर इस शर्त पर कि अगला सौदा उसका हो।”
“तो वह चाहता है कि मैं पन्ना जलाऊँ?”
“वह चाहता है कि पन्ना जले,” बाई ने कहा, “पर जलाने वाला हाथ उसका हो। तेरा नहीं।”
मैंने कुर्सी खींचकर बैठ गई। सिर भारी हो रहा था। बाहर से नर्सों की आवाज़ आ रही थी, कोई स्ट्रेचर खींच रहा था, और दूर कहीं सुबह की पहली एम्बुलेंस की सीटी बजी।
“बाई,” मैंने कहा, “खरीदार ने मुझे सुबह तक का वक़्त दिया है। अब सुबह हो गई। तो वह आएगा। मैं उसे क्या दूँ?”
बाई ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने कलम उठाई और काग़ज़ पर लिखा — “उसे वह दो जो उसने माँगा नहीं।”
“क्या?”
“तू,” बाई ने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार साफ़ निकली। “तू खुद जा। उसके पास। और उसे बता कि तू रजिस्टर का आख़िरी पन्ना नहीं, पहला नाम बनने आई है।”
मैं उठी। दरवाज़े तक गई, फिर रुककर पीछे मुड़ी। “बाई, तुमने अपना नाम लिख दिया। तुम अब बोल क्यों नहीं पातीं?”
बाई मुस्कुराई। बूढ़ी, थकी मुस्कान। “जो अपना नाम खुद लिखता है, वह बोल नहीं सकता। बोलना भी तो किसी और का नाम है। मैंने अपना नाम लिखकर सबको अपना कर दिया। अब मैं सिर्फ़ अपनी हूँ।”
मैं कुछ नहीं बोली। सीढ़ियाँ उतरीं।
नीचे इमरजेंसी के बाहर भैरों खड़ा था, सामने एक काली गाड़ी। गाड़ी का दरवाज़ा खुला था और उसमें से वही कोट-चश्मा वाला आदमी उतर रहा था। उसके हाथ में एक भूरा लिफ़ाफ़ा था — मोटा, भरा हुआ।
उसने मुझे देखा और मुस्कुराया। “मीरा जोशी। सुबह हो गई।”
मैंने भैरों को हाथ से रोका और उस आदमी के सामने जाकर खड़ी हो गई। “क्या चाहिए?”
“वही जो तुम्हारे पास है,” उसने कहा। “सुशीला वाला पन्ना। मैं जला दूँगा, तुम्हारी आवाज़ नहीं जाएगी। सौदा खत्म। सब खत्म। तुम, तुम्हारी बेटी, यह सारा शहर।”
“और तुम्हें क्या मिलेगा?”
“मुझे?” उसने लिफ़ाफ़ा खोला और उसमें से एक पुराना काग़ज़ निकाला, जिस पर स्याही फैली हुई थी। “मुझे नया सौदा मिलेगा। इस बार लिखने वाला मैं होऊँगा।”
मैंने उस काग़ज़ को देखा। पर स्याही फैली हुई थी, कुछ पढ़ा नहीं जा रहा था। फिर वह पल आया जब मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। मेरे पास रजिस्टर नहीं था — रजिस्टर रिया के पास था, हवेली में। मेरे पास सुशीला का पीला काग़ज़ था, जले टुकड़े वाली पुड़िया थी, और वह सादा काग़ज़ जिस पर मैंने अपना नाम लिखा था।
मैंने उसे अपना नाम वाला काग़ज़ दिया। “यह लो।”
उसने लिया, देखा, और हँसा। “यह सिर्फ़ तुम्हारा नाम है। मुझे पन्ना चाहिए।”
“पन्ना नहीं मिलेगा,” मैंने कहा। “पर यह लो — तुम्हारा अपना नाम।”
और मैंने उसके हाथ से लिफ़ाफ़ा खींचकर उसे उलट दिया। अंदर वह पुराना काग़ज़ था जिस पर बाबू हरनाम की मुहर थी। मैंने उसे ज़मीन पर गिराया, उसके ऊपर सुशीला की स्याही की पुड़िया डाली, और अपनी उँगली से उस पर लिख दिया — “काजल हरनाम, रखवाला।”
आदमी झुका। उसने अपना काग़ज़ उठाया। पर अब उस पर काजल का नाम लिखा था, और जैसे ही उसने उसे छुआ, उसका हाथ काँपा। उसने पीछे देखा, अपनी गाड़ी की तरफ़, और उसकी आवाज़ पहली बार बदली — “यह क्या किया तुमने?”
“जो तुमने सोचा नहीं था,” मैंने कहा। “तुमने सोचा था कि मैं पन्ना दूँगी या नहीं दूँगी। पर मैंने तुम्हें रखवाला बना दिया। और रखवाला सौदा नहीं बेच सकता। वह सिर्फ़ निभा सकता है। अब तुम चाहो तो सौदा तोड़ो — पर तुम्हारा अपना नाम जाएगा।”
वह पीछे हटा। उसके चेहरे पर पसीना था। उसने काग़ज़ अपनी जेब में ठूँसा और गाड़ी की तरफ़ भागा।
भैरों ने उसे रोकना चाहा, पर मैंने कहा, “जाने दो। वह खुद अपना रास्ता देखेगा।”
गाड़ी निकल गई। भैरों मेरी तरफ़ देखता रहा। “तुमने क्या किया?”
“तुमने सुना नहीं? उसे रखवाला बना दिया। अब उसके पास अपना नाम है, पर सौदा तोड़ने की हिम्मत नहीं। और अगर तोड़ेगा, तो खुद मिटेगा।”
“और अगर वह किसी और से तुड़वाए?”
“तब भी,” मैंने कहा, “उसे पहले काजल का नाम बोलना पड़ेगा। और काजल का नाम बोलने का मतलब है — रजिस्टर का ध्यान उस पर।”
भैरों कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “तुमने यह सोचा कैसे?”
“मैंने नहीं सोचा,” मैंने कहा। “बाई ने कहा था — ‘उसे वह दो जो उसने माँगा नहीं।’ तो मैंने उसे नाम दे दिया। बाकी रजिस्टर देखेगा।”
अंदर से रामदीन आया। उसके हाथ में एक कप चाय थी — मेरे लिए। उसने कहा, “खरीदार गया?”
“गया।”
“तो अब?”
मैंने चाय पकड़ी और एक घूँट लिया। फिर कहा, “अब वह वापस आएगा। सवाल यह है कि इस बार वह कौन बनकर आएगा।”
रामदीन ने सिर हिलाया। “और तेरी बेटी?”
मैंने जेब में हाथ डाला। रिया का फोन आ चुका था — तीन मिस्ड कॉल। मैंने वापस किया। दूसरी घंटी पर रिया ने उठाया।
“माँ?”
“हाँ।”
“काजल दीदी ने रात में काग़ज़ के टुकड़े पर दो और अक्षर उभारे हैं।”
“कौन से?”
“पता नहीं,” रिया ने कहा। “पर वे उभर रहे हैं। धीरे-धीरे। जैसे कोई दूर से आ रहा हो।”
मैंने फोन कान से दूर किया और आसमान देखा। सुबह साफ़ थी। अस्पताल के गेट पर लोग आ-जा रहे थे, कोई रो रहा था, कोई हँस रहा था। सब अपने-अपने नाम के साथ।
“रिया,” मैंने कहा, “मैं अभी आ रही हूँ। और सुन — आज अस्पताल के बाहर जो दीवार है, उस पर हम नाम लिखेंगे।”
“सबके?”
“जो गए हैं,” मैंने कहा। “सबके।”
फोन रखा। रामदीन मेरी तरफ़ देख रहा था। “सबके नाम?”
“हाँ।”
“तो पहला नाम कौन सा?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। “तुम्हारा।”
वह हँसा। पहली बार खुलकर। “मेरा नाम तो चालीस साल से मेरे पास ही नहीं।”
“तो अब होगा।” मैंने उसका हाथ पकड़ा। “चलो।”
हम अस्पताल के गेट की तरफ़ बढ़े, और पीछे कहीं, हवेली के पिछले दरवाज़े के अंधेरे में, एक लाइन स्याही से उभर रही थी जिसे अभी किसी ने नहीं पढ़ा था — “नाम जो आज लिखा जाएगा, वह कल तक नहीं रहेगा।”
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