A Dark Secret393 / 536

A Dark Secret – Chapter 393

7 min read November 6, 2026

सबकी नज़र काजल पर टिकी। काजल ने मुँह फेरा और कुछ देर कुछ नहीं बोली। फिर कहा, “मैंने पढ़ा था, पर पढ़ते वक़्त मुझे नहीं पता था कि यह मेरा ही नाम है। मैंने देखा था — मनोहर के हाथ में — और मैंने सोचा कि कोई पुराना काग़ज़ है। मैंने उस पर नज़र दौड़ाई और जला दिया।”

“तो याद करो,” मैंने कहा। “जो लिखा था, वह याद करो।”

“मुझे याद नहीं,” काजल ने कहा। “सच में नहीं। नाम की जगह बस धुँधला है। जैसे रात की नींद में देखा हुआ कोई सपना।”

मैंने रजिस्टर अपने हाथ में लिया। पन्ने उलटे। सुधा का नाम — पूरा। बाबू का नाम — पूरा। काजल का नाम — पूरा, पर उभरा हुआ कुछ हल्का। जैसे पेंसिल से लिखा और रबर मार दिया गया हो। मैंने रजिस्टर बंद किया।

“तो याद आने तक तुम मेरे साथ रहोगी,” मैंने कहा।

काजल ने सिर उठाया। “क्या कहा?”

“तुम मेरे साथ रहोगी,” मैंने दोहराया। “मेरे घर में। मेरी आँखों के सामने। क्योंकि जो तुम इन चालीस साल में भूल गई हो, वह मुझे तुमसे निकालना है। और अगर तुम आधी रात को भागकर अपना नाम मिटाने की कोशिश करोगी, तो मैं तुम्हें ऐसा नहीं करने दूँगी।”

काजल हँसी। सूखी हँसी। “तुम मुझे कैद करोगी?”

“नहीं,” मैंने कहा। “मैं तुम्हें अपने साथ रखूँगी। फ़र्क़ तुम खुद समझ जाओगी।”

भैरों ने कुछ कहना चाहा, पर काजल ने हाथ उठाकर उसे रोका। वह मेरी तरफ़ देखती रही, फिर बोली, “ठीक है। मैं चलूँगी। पर मैं तुमसे कुछ नहीं कहूँगी।”

“कहोगी,” मैंने कहा। “जब खुद याद आएगा तब कहोगी।”

सुधा ने काग़ज़ का टुकड़ा थाली से उठाया और उसे एक छोटे कपड़े में लपेट दिया। “इसे तेरे पास रखो,” उसने मुझे दिया। “हर रात इस पर स्याही डालना। जितने अक्षर उभरेंगे, उतना नाम लौटेगा।”

रात गहरी हो रही थी। हवेली में बत्ती जलाकर सब बैठे। सुधा ने सुनीता और शालिनी के लिए चाय बनाई और भैरों दरवाज़े पर बैठ गया, मानो किसी के आने का इंतज़ार कर रहा हो। मैंने रिया को लेकर एक कोने में बैठकर उससे कहा, “सुन, अब मैं तुझे सब बताने वाली हूँ।”

“माँ, मुझे पता है।”

“नहीं पता।” मैंने उसका हाथ पकड़ा। “तेरा नाम रजिस्टर में है। तुझे पता है?”

रिया ने एक पल मेरी आँखों में देखा। फिर कहा, “मुझे पता था। जिस दिन तुमने मेरी उँगली पर स्याही देखी थी, उस दिन से।”

मेरा हाथ काँपा। “और तूने बताया नहीं?”

“तुम पहले से डर रही थीं,” रिया ने कहा। “अगर मैं बताती, तो तुम और डर जाती।”

मैंने उसे अपनी तरफ़ खींचा। उसका सिर मेरी छाती पर आ गया। उसके बालों में चाय और धूल की महक थी, वैसे ही जैसे बचपन में हुआ करती थी। “अब तू स्कूल नहीं जाएगी।”

“मैं जाऊँगी,” रिया ने कहा, और सिर उठा लिया। “अगर मैं नहीं जाऊँगी, तो सबको लगेगा कि हम डर गए। और शालिनी अकेली है।”

“शालिनी के पास उसकी माँ है अब,” मैंने कहा। “सुनीता लौट आई।”

“फिर भी,” रिया ने कहा। “उसे स्कूल में कोई नहीं जानता। उसका नाम काग़ज़ों से मिटा था ना? तो क्लास-रजिस्टर में भी नहीं है। मैं उसके साथ बैठूँगी।”

मैंने उसकी तरफ़ देखा और सोचा कि यह बारह साल की लड़की कहाँ से इतनी बड़ी बातें सीख लेती है। फिर याद आया — मेरी माँ भी ऐसी ही थी। हर चीज़ आज ही, अभी, इसी वक़्त।

“ठीक है,” मैंने कहा। “पर एक शर्त पर। रजिस्टर रात को मेरे पास रहेगा।”

“आधी रात को तुम्हें सपना आए तो?”

“तो मैं जाग जाऊँगी और तुझे देख लूँगी।”

वह हँसी। पहली बार उस रात। फिर मेरे कंधे पर सिर रखकर सो गई।

मैं सोई नहीं। रजिस्टर गोद में रखकर बैठी रही और उस जले काग़ज़ के टुकड़े को देखती रही। मन में एक बात घूम रही थी — खरीदार ने कहा था, कल सुबह तक का वक़्त। सुबह होने में चार घंटे बाकी थे। मैंने सुधा की तरफ़ देखा, जो चारपाई पर बैठी आँखें बंद किए कुछ बुदबुदा रही थी।

“सुधा जी।”

उसने आँखें खोलीं। “क्या?”

“जो खरीदार है — वह कौन है?”

सुधा ने करवट बदली। “मुझे नहीं पता। पर मैं इतना जानती हूँ — वह उस आदमी का आदमी है जिसने चालीस साल पहले बाबू हरनाम को यह सौदा सुझाया था। बाबू ने सिर्फ़ शर्तें लिखीं। सुझाव किसी और का था।”

“किसका?”

“बाबू कभी नाम नहीं बोले। बस इतना कहते थे — ‘वह जो हवेली के पीछे वाले दरवाज़े से आता है।’”

मैंने पीछे वाले दरवाज़े की तरफ़ देखा। वह अभी भी खुला था। खुला और अंधेरा। भैरों वहीं बैठा था, पर उसकी आँखें भी उसी अंधेरे में गड़ी थीं।

मैंने रजिस्टर उठाया और आँगन की दीवार पर जाकर खड़ी हो गई। जले टुकड़े पर स्याही डाली। कुछ देर बाद “ह” के आगे एक और अक्षर उभरा — “र”। मेरा दिल तेज़ चला। मैंने सुधा को आवाज़ दी।

“देखो।”

सुधा आई, झुककर देखा, और उसकी आँखें भर आईं। “यह ‘हरि’ बन रहा है। धीरे-धीरे। काजल के याद करने से।”

“पर काजल तो याद नहीं कर रही।”

“वह सो रही है,” सुधा ने कहा। “और नींद में याद सबसे तेज़ होती है। हो सकता है वह सपने में वह पल देख रही हो जब उसने काग़ज़ पढ़ा था।”

मैंने काजल की तरफ़ देखा। वह कोने में चादर ओढ़कर सो रही थी, पर उसके होंठ हिल रहे थे। धीरे-धीरे। कुछ बुदबुदा रही थी। मैं करीब गई और कान लगाया। एक ही शब्द बार-बार आ रहा था — “रखवाला… रखवाला… रखवाला…”

भैरों ने मेरी तरफ़ देखा। “क्या हुआ?”

“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “वह याद कर रही है।”

सुबह होने में अभी भी वक़्त था जब मैंने एम्बुलेंस की चाबी उठाई। भैरों ने पूछा कि कहाँ जा रही हो। मैंने कहा, “अस्पताल। रामदीन को लेने। और बाई को देखने।” भैरों उठा। सुधा ने कहा कि वह हवेली पर रुकेगी, काजल और रिया के साथ।

“रिया को मेरे साथ आना है,” मैंने कहा।

“नहीं,” रिया ने कहा। वह जाग गई थी, चादर में लिपटी खड़ी थी। “मैं यहीं रहूँगी।”

“रिया —”

“माँ, तुमने कहा था कि मैं तुम्हारे साथ रहूँगी। अब मैं कहती हूँ, मैं काजल दीदी के साथ रहूँगी।” उसने काजल की तरफ़ देखा। “अगर उसे रात में कुछ हो, तो मैं तुम्हें फोन करूँगी। और तुम्हें पता है — मैं झूठ नहीं बोलती।”

मैं एक पल रुकी। फिर मैंने सुधा की तरफ़ देखा। सुधा ने हल्का सिर हिलाया। मैंने रिया के सिर पर हाथ रखा और भैरों के साथ बाहर निकल गई।

रास्ते में भैरों ने कहा, “तुमने अपनी बेटी को उस औरत के पास छोड़ दिया।”

“हाँ,” मैंने कहा। “क्योंकि अब वह औरत रजिस्टर से ज़्यादा डरती है, और रिया रजिस्टर से कम नहीं डरती। दोनों में से एक को तो मेरे साथ रहना ही था।”

भैरों कुछ देर चुप रहा। फिर एक मोड़ पर उसने कहा, “तुम अजीब हो, मैडम।”

“तू भी,” मैंने कहा। “इतनी देर में एक लाइन बोली जाती है तो कम से कम काम की बोल।”

वह हँसा। पहली बार। छोटी सी हँसी, फिर चुप।

अस्पताल पहुँचे तो सुबह की पहली किरण छत पर थी। इमरजेंसी वार्ड के बाहर बेंच पर रामदीन बैठा था। उसके हाथ में वही भूरी जैकेट थी और सामने एक कप चाय, ठंडी। उसने मुझे देखा और उठ खड़ा हुआ।

“बाई?” मैंने पूछा।

“बोल रही है,” रामदीन ने कहा। “थोड़ा-थोड़ा। रात में दो बार बोली। एक बार अपना नाम, एक बार तेरा।”

मैंने भैरों को बेंच पर छोड़ा और सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। तीसरी मंज़िल पर लोहे के दरवाज़े वाला कमरा अब खुला था। अंदर बाई चारपाई पर बैठी थी, हाथ में वही पीतल की कलम। मुझे देखकर उसने कलम रख दी और हाथ आगे किया।

मैंने उसका हाथ पकड़ा। उसकी हथेली गरम थी, नसें उभरी हुईं।

“बेटी,” उसने कहा, और आवाज़ में सिर्फ़ हवा थी, “तूने कुएँ से कुछ निकाला बैठ।”

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