A Dark Secret – Chapter 392
वह कुएँ के पास गई। रजिस्टर खोला। उसने उँगली खाली जगह पर रखी और बोली — “हरि हरनाम सिंह।”
आवाज़ उसकी थी, पर जैसे उसमें कोई और भी मिल गया हो। कुएँ में पानी चक्कर खाने लगा। रजिस्टर के पन्ने पर स्याही भरने लगी। और इस बार खाली जगह भरने लगी — अक्षर दिखने लगे— ह, रि, ह, र, ना, म, सिं, ह।
पूरा। पूरा। पूरा।
और जैसे ही आख़िरी अक्षर बना, हवेली के पिछले हिस्से से एक बड़ी आवाज़ आई — दरवाज़ा खुलने की आवाज़। लंबी, भारी, जैसे बीस बरस से बंद कोई चीज़ खुल गई हो।
रिया ने मेरी तरफ़ देखा। “माँ, दरवाज़ा खुल गया।”
पर सुधा वहीं खड़ी रही, रजिस्टर हाथ में। उसने मेरी तरफ़ देखा और कहा — “मेरा नाम देखो।”
मैंने देखा। रजिस्टर में सुधा का नाम कहीं नहीं था। न पूरा, न आधा। उसकी जगह एक छोटी सी लाइन थी—
नाम नहीं लिया गया।
“इसका मतलब?” भैरों ने पूछा।
“मतलब,” सुधा ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार थोड़ी हँसी आई, “कि मैंने अपना नाम नहीं दिया। मैंने उनका नाम दिया। रजिस्टर को मेरा नहीं, उनका नाम चाहिए था। और मैंने उन्हें उनका नाम लौटा दिया।”
पर तभी काजल ने रजिस्टर की तरफ़ उँगली उठाई। उसकी आवाज़ सूखी थी। “मेरा नाम आधा है। रजिस्टर ने मेरा नाम आधा ले लिया। मैंने बाबू का नाम बोलकर अपना नाम खो दिया।”
सुधा ने उसका हाथ पकड़ा। “तो अब तुम वह करो जो कोई नहीं करता। बाबू की आवाज़ में अपना नाम बोलो। अगर वह तुम्हें पहचानते हैं, तो वह तुम्हारा नाम लौटा देंगे।”
काजल कुएँ के पास गई। रजिस्टर खोला। अपने आधे नाम पर उँगली रखी और उसने आँखें बंद करके कहा — “बाबू… मैं काजल हूँ।”
कुछ पल कुछ नहीं हुआ। फिर कुएँ से वही भारी आवाज़ आई — बस एक शब्द — “काजल।”
और रजिस्टर में उसका नाम पूरा हो गया। पूरा, गहरा, ताज़ा।
काजल ने आँखें खोलीं। आँसू बह रहे थे, पर वह हँ
॥
काजल के आँसू सूखने से पहले ही हवेली के पिछले हिस्से से वह भारी आवाज़ फिर आई — दरवाज़ा और खुल रहा था, जैसे कोई अंदर से धक्का दे रहा हो। सब पीछे हट गए। सुधा ने रजिस्टर अपने सीने से लगा लिया और कहा, “अब यह किसी को नहीं दूँगी।”
मैंने कुएँ के पास पड़ा पीला काग़ज़ उठाया और सुधा से पूछा, “जो मनोहर ने जलाया था — उस काग़ज़ पर काजल का नाम था। अगर वह जल गया, तो काजल का नाम अब कहाँ से आएगा?”
सुधा ने काजल की तरफ़ देखा। काजल ने अपनी भीगी आँखें पोंछीं और बोली, “मेरा नाम रजिस्टर में पूरा है न? तो मुझे क्या?”
“रजिस्टर में है,” सुधा ने कहा, “पर उस काग़ज़ पर तेरा नाम और रखवाले का नाम दोनों साथ लिखे थे। वह काग़ज़ जला — मतलब रजिस्टर की जड़ में जो लिखा था, वह भी जल गया। तेरा नाम ऊपर से तो पूरा दिख रहा है, पर अंदर से वह खोखला है। आज नहीं, पर महीने में तेरा नाम फिसलने लगेगा।”
काजल का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। “तो तोड़ दो इसे। तोड़ दो ना!” उसने रजिस्टर की तरफ़ हाथ बढ़ाया। सुधा ने पीछे हटकर उसे रोका।
“जल्दबाज़ी मत कर। रजिस्टर को तोड़ने का तरीक़ा अभी हमारे पास नहीं। जो जल गया, उसे पहले लौटाना पड़ेगा।”
मैंने आँगन की दीवार देखी। “तेरी आवाज़ का इंतज़ार है” वाली लाइन फीकी पड़ चुकी थी, पर उसके नीचे एक नई लकीर उभर रही थी, धुँधली, जैसे कोई उँगली भीगी मिट्टी में खींच रहा हो। मैंने करीब जाकर पढ़ा — “जो जल गया, वह याद में है। याद से निकालो।”
भैरों ने तहखाने की तरफ़ देखा। “मैं जाकर राख देखता हूँ।”
वह गया। दो मिनट में लौटा। उसके हाथ खाली थे और मुँह पर गर्द थी। “दरवाज़ा बंद हो गया। अपने आप। चाबी अंदर ही रह गई।”
“तो तोड़ो,” काजल ने कहा।
“लोहे का दरवाज़ा है,” भैरों ने कहा। “अगर तोड़ा तो शोर से आधा बाज़ार जमा हो जाएगा। और अभी हमें शोर नहीं चाहिए।”
मैंने रिया की तरफ़ देखा। वह कुएँ के किनारे बैठी थी, हाथ में सुशीला का पीला काग़ज़, और उसकी आँखें दरवाज़े की तरफ़ थीं — वैसे ही जैसे वह स्कूल की किताब में सवाल देखती है जिसका जवाब उसे पता हो पर कोई पूछे नहीं।
“रिया,” मैंने कहा। “तू क्या सोच रही है?”
उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। “माँ, यहाँ पर लिखा है — ‘मेरी आवाज़ मेरे नाम में है, सुनो मत, बोलो।’ और दूसरी तरफ़ ताले का निशान है।”
मैंने देखा। पीले काग़ज़ के पलटे हुए कोने पर एक छोटा सा ताले का चिह्न था, जैसे मोहर। मैंने सुधा की तरफ़ देखा। “इसका मतलब?”
सुधा ने काग़ज़ अपने हाथ में लिया, उसे उलट-पलट कर देखा और धीरे से बोली, “बाबू हरनाम खुद लिखते थे — हर काग़ज़ पर एक चिह्न। यह उनका चिह्न है। जो काग़ज़ उनके हाथ के चिह्न वाले ताले में बंद हो, उसे खोलने के लिए रजिस्टर चाहिए। रजिस्टर अपने साथ काग़ज़ का रास्ता खोल देता है।”
“मतलब ताले पर रजिस्टर रखो,” रिया ने कहा।
सुधा ने उसकी तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। “यह बच्ची…”
“यह बच्ची मेरी बेटी है,” मैंने कहा। “और यह जो कह रही है, वही अब करते हैं।”
हम सब तहखाने के दरवाज़े पर पहुँचे। दरवाज़ा बंद था, ऊपर ताला, और ताले पर जंग का एक नया परत — जैसे सुबह तक यह खुला था ही नहीं। मैंने सुधा से रजिस्टर लिया। रिया ने कहा, “मैं रखती हूँ।”
मैंने मना किया। “नहीं। मैं रखती हूँ।”
“पर माँ, तुम्हारा नाम—”
“मेरा नाम मेरे पास है,” मैंने कहा। उसकी कलाई पकड़ी और दबाकर कहा, “और तेरा नाम भी मेरे पास है। मैं किसी और को नहीं रखने दूँगी।”
मैंने रजिस्टर ताले के ऊपर रखा। कुछ नहीं हुआ। रिया आगे आई और अपना हाथ मेरे हाथ के ऊपर रख दिया, जैसे स्कूल में पेंसिल पकड़ते वक़्त करती है। ताला एक बार हिला। फिर “टक” करके खुल गया।
मैंने पीछे देखा। भैरों की आँखें बड़ी थीं। सुधा के होंठ हिल रहे थे, जैसे कोई पुराना मंत्र पढ़ रही हो। काजल दूर खड़ी थी, बोली कुछ नहीं।
भैरों ने दरवाज़ा खींचा। अंदर से एक पुरानी आवाज़ आई — कुछ गिरने की, हल्की सी। मैंने मोबाइल की बत्ती जलाई और सीढ़ियाँ उतरीं।
तहखाने में जो पहले पत्थर के नीचे खोखला हिस्सा था, उसके पास ज़मीन पर जले काग़ज़ का एक टुकड़ा पड़ा था — सिर्फ़ आधा इंच का, जिस पर स्याही के जले निशान थे। मैंने उसे उठाया। हल्का था, जैसे हवा में ही घुल जाए। मैंने उसे सुधा को दिया।
“एक ही टुकड़ा है,” सुधा ने कहा। “पर यह काफ़ी है। चलो, नींव पर चलें।”
हम सीढ़ियाँ चढ़कर आँगन में आए। सुधा ने कुएँ के पास वह जगह चुनी जहाँ हवेली की पहली ईंट सबसे पुरानी थी। वहाँ ज़मीन पर एक थाली रखी और उस पर जले काग़ज़ का टुकड़ा। फिर मेरी तरफ़ देखा। “टीन की पुड़िया है तेरे पास?”
मुझे रामदीन की दी हुई पीली पुड़िया याद आई — वही जिस पर उसकी लिखाई थी। मैंने जेब से निकाली और सुधा को दी। सुधा ने उसमें उँगली डाली, थोड़ी स्याही ली, और जले काग़ज़ पर डाल दी।
कुछ देर तक कुछ नहीं हुआ। फिर टुकड़े के किनारे से एक अक्षर उभरा। छोटा सा, झुका हुआ — “ह”।
काजल आगे बढ़ी और झुककर देखा। “बस एक अक्षर?”
“पूरा नाम तभी उभरेगा,” सुधा ने कहा, “जब इसे याद करने वाला उसे याद करे। यह काग़ज़ जिसने पढ़ा था, वही याद कर सकता है।”
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