A Dark Secret – Chapter 390
“क्या मतलब?”
“तीनों गोलियाँ — बाबू, बाबू हर, सिंह। मैंने सोचा था कि यही पूरा नाम है। पर अगर जोड़कर भी नाम नहीं बन रहा, तो इसका मतलब जो नाम मैंने तीन हिस्सों में तोड़ा था, वह असली नाम ही नहीं था। असली नाम किसी और चीज़ में लिखा है।”
“कहाँ?”
“उस काग़ज़ में जो मनोहर ने जलाया था।”
मैंने मनोहर की तरफ़ देखा। वह दीवार से टिका खड़ा था, और जैसे ही रामदीन ने यह कहा — वैसे ही उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। वह होंठ हिलाने लगा, पर आवाज़ नहीं निकली।
“मनोहर,” मैंने कहा।
“मैंने नहीं जलाया,” वह फुसफुसाया। “मैंने वह काग़ज़ काजल के हाथ में दिया था। उसने कहा था कि वह इसका इंतज़ाम कर देगी।”
सबकी नज़रें काजल पर गईं।
वह पहले तो सीधी खड़ी रही। फिर उसका हाथ काँपा। उसने दीवार का सहारा लिया। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं आई। फिर उसने कहा, बहुत धीरे — “मैंने जलाया था।”
कमरे में जो भी था, वह ठहर गया।
सुधा ने कहा, “क्यों?”
“क्योंकि उसमें मेरा नाम था।” काजल की आवाज़ काँप रही थी, पर वह बोलती रही। “बाबू ने वह काग़ज़ मेरे नाम के साथ लिखा था। मेरा नाम उसी पन्ने पर था जिस पर बाबू का पहला नाम था। मुझे लगा कि अगर मैं उसे जला दूँगी, तो मेरा नाम रजिस्टर में नहीं जाएगा।”
“तो तुमने अपने नाम के डर से बाबू का पहला नाम भी जला दिया?” मैंने कहा।
“मैंने सोचा था कि उसमें सिर्फ़ मेरा नाम है!” वह चीखी। “बाबू ने कभी नहीं बताया कि उस काग़ज़ पर और क्या लिखा है। मैंने उसे पढ़ा। वहाँ सिर्फ़ मेरा नाम और एक लाइन थी — ‘रखवाले का नाम।’ मैंने सोचा कि अगर मैं इसे जला दूँगी, तो रजिस्टर मुझे नहीं पकड़ेगा।”
सुधा ने मुँह फेरा। “बाबू ने तुम्हें धोखा दिया था। वह काग़ज़ तुम्हें दिखाते, पर वह पूरा नहीं पढ़ने देते। उस पर बाबू का पहला नाम था — वह नाम जो कोई नहीं जानता। तुमने उसी को जला दिया। अब वह नाम किसी को याद नहीं।”
काजल की आँखें भर आईं। “मैंने नहीं जाना था…”
रिया ने मेरा हाथ कसकर पकड़ा। “माँ, तो अब? अगर बाबू का नाम कोई नहीं जानता, तो हम रजिस्टर कैसे तोड़ेंगे?”
मैंने रजिस्टर फिर खोला। जिस पन्ने पर सुशीला का नाम था, उसके नीचे खाली जगह थी। बस एक लाइन थी — “नाम नहीं लिखा गया।”
“रामदीन?” मैंने फोन पर कहा।
“हूँ।”
“अगर नाम जल गया, तो क्या रजिस्टर उसे कभी नहीं लौटाएगा?”
“लौटा सकता है,” रामदीन ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में कुछ था जो पहले नहीं था। “पर उसके लिए तुम्हें वह जगह जाननी होगी जहाँ आग लगी थी। राख से नाम नहीं बोला जाता। नाम वहाँ से बोला जाता है जहाँ वह ज़िंदा था।”
“कहाँ?”
“जहाँ काजल ने उसे जलाया।”
मैंने काजल की तरफ़ देखा। “वह काग़ज़ तुमने कहाँ जलाया था?”
वह रो रही थी, पर उसने कहा, “हवेली के पीछे। कुएँ के पास।”
“और राख?”
“मैंने उसे वहीं पानी में बहा दिया।”
रामदीन ने सुना और फिर कहा — “तो राख नहीं मिलेगी। पर कुएँ के किनारे पर ज़रूर कुछ बचा होगा। आग से चीज़ें सिर्फ़ तभी पूरी जलती हैं जब कोई उन्हें देख रहा हो। अगर काजल अकेली थी, तो कुछ बचा होगा। जाओ, देखो।”
मैंने फोन रखा और काजल का हाथ पकड़ा। “चलो।”
“कहाँ?”
“कुएँ के पास। जहाँ तुमने उसे जलाया था।”
हम सब नीचे उतरे, आँगन की तरफ़। दीवार पर वह लाइन अब भी हल्की दिख रही थी, पर फीकी। कुएँ के पास ज़मीन पर एक छोटा सा जला हुआ गड्ढा था। मैंने झुककर देखा। मिट्टी काली थी। और उस काले हिस्से के बीच, बहुत छोटा, एक कोना बचा था — पीले काग़ज़ का कोना, जला हुआ, पर बचा हुआ।
मैंने उसे उठाया। उस पर कुछ अक्षर थे, आधे जले। मैंने ध्यान से देखा।
“ह… र…”
“हर?” रिया ने पूछा। “बाबू हर?”
“नहीं।” मैंने कोना पलटा। दूसरी तरफ़ भी कुछ था। “यह ‘हर’ नहीं है। यह ‘हरि’ है।”
काजल ने पास आकर देखा। उसकी आँखें फैल गईं। “हरि…”
“क्या?”
“मेरे दादा का नाम हरि था?” वह हकलाई। “मैंने हमेशा उन्हें बाबू हरनाम सिंह ही सुना। कभी हरि नहीं।”
सुधा आगे आई और उसने काग़ज़ का कोना मेरे हाथ से लिया। “हरि हरनाम सिंह,” उसने धीरे से कहा। “यही तो उनका असली नाम था। बाबू तो सिर्फ़ लोग बुलाते थे। हरनाम उपनाम था। और पहला नाम — हरि — किसी को याद नहीं।”
“तो क्या यही पहला हिस्सा है?” मैंने पूछा।
“हाँ,” सुधा ने कहा। “पर यह अधूरा जला है। सिर्फ़ ‘हरि’ का हिस्सा है। बाकी नाम अभी भी आग में गया।”
“तो?”
सुधा ने मेरी तरफ़ देखा। “तो अब तुम्हें वह जगह बोलनी होगी जहाँ यह नाम ज़िंदा था। यह काग़ज़ जहाँ जला, वह जगह। और नाम के साथ उसकी आवाज़ भी चाहिए।”
“बाबू की आवाज़?”
“हाँ।” सुधा ने कुएँ की तरफ़ देखा। “और मुझे लगता है कि वह आवाज़ इसी हवेली में कहीं बंद है।”
मैंने रजिस्टर खोला। पन्ना अब भी वही था — सुशीला का नाम, नीचे खाली जगह, और “नाम नहीं लिखा गया”।
“तो फिर,” मैंने कहा, “हमें बाबू हरनाम सिंह की आवाज़ ढूँढनी होगी।”
काजल ने अपनी आँखें पोंछीं। “मेरे दादा की आवाज़ उस टेप में है। जो मैंने तुम्हें सुनाया था।”
“वह सिर्फ़ हुक्म की आवाज़ है,” सुधा ने कहा। “नाम बोलने के लिए वह काफ़ी नहीं। नाम वह आवाज़ बोलती है जिसमें नाम का मालिक खुद को पहचानता हो।”
हम सब खड़े रहे। हवा में अब भी वह स्याही की महक थी।
तभी काजल ने कहा, बहुत धीमी आवाज़ में, जैसे खुद से — “मैंने जो जलाया था, वह बाबू हरनाम का पहला नाम था। और अब वह नाम किसी को याद नहीं।”
उसकी आवाज़ टूट गई। वह कुएँ के किनारे बैठ गई, मुँह हाथों में छिपाकर।
मैंने रिया की तरफ़ देखा। वह मेरे पास आई और फुसफुसाई — “माँ, अगर बाबू का नाम कोई नहीं जानता, तो रजिस्टर कैसे टूटेगा?”
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। “कोई नहीं जानता… अभी।”
और मैंने रजिस्टर बंद कर दिया। जिस पल वह बंद हुआ, उसी पल कुएँ के पानी में एक बूँद गिरी — ज़ोर की आवाज़ के साथ। मैंने झाँका। पानी साफ़ था, और उसके नीचे, गहरे में, कुछ पीला दिख रहा था।
काजल ने भी देखा। वह उठी। “वह… वह क्या है?”
मैंने पानी में देखा। पीला काग़ज़, पूरा सलामत, कुएँ की तली में पड़ा था। जैसे किसी ने उसे अभी गिराया हो।
“माँ,” रिया ने कहा, “वह तो जला हुआ काग़ज़ नहीं लगता।”
“हाँ,” मैंने कहा। “वह पूरा है।”
और तभी कुएँ के पानी में एक और बूँद गिरी। फिर एक और। और मुझे लगा कि कुएँ की तली में पड़ा वह पीला काग़ज़ हिल रहा है — जैसे कोई उसे पढ़ रहा हो।
भैरों ने मेरी बाँह पकड़ी। “मीरा, रुको। पानी में हाथ मत डालो।”
“क्यों?”
“क्योंकि कुआँ अब वैसा नहीं है जैसा सुबह था।” उसने अपना मोबाइल पानी के ऊपर किया। रोशनी तली तक गई और वह पीला काग़ज़ साफ़ दिखा। पूरा। कोई कोना जला नहीं। कोई अक्षर मिटा नहीं।
“रस्सी लाओ,” मैंने कहा।
“मीरा—”
“रस्सी, भैरों।”
वह गया और पीछे के कमरे से मोटी रस्सी ले आया। उसके सिरे पर एक बाल्टी बाँधी। मैंने बाल्टी कुएँ में उतारी। जैसे ही बाल्टी पानी को छूने लगी, काग़ज़ हिला — सच में हिला, जैसे किसी ने उसे नीचे से धक्का दिया हो।
रिया ने मेरी कमर पकड़ ली।
“माँ, वह ज़िंदा है क्या?”
“काग़ज़ ज़िंदा नहीं होते,” सुधा ने कहा, पर उसकी आवाज़ में वह भरोसा नहीं था जो अक्सर होता था।
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