A Dark Secret – Chapter 389
“कितने हैं?”
उसने पन्ने पलटे, उँगली चलाई। “अभी तक इकतालीस। और यह पूरा पन्ना नहीं है।”
सुधा ने कहा, “इकतालीस नाम? इतने तो चालीस साल में नहीं उठे।”
“यह सिर्फ़ पहला पन्ना है,” रिया ने कहा, बिना उसकी तरफ़ देखे। “माँ, रजिस्टर के पन्ने जुड़ रहे हैं। जैसे कोई किताब सिल रहा हो।”
तभी तहखाने से आवाज़ आई — धमाका, फिर सीढ़ियों पर पैरों की आहट, और हवा इतनी ठंडी हो गई कि आँगन में खड़े पेड़ की पत्तियाँ भी रुक गईं।
भैरों भागा नीचे। मैं उसके पीछे। सीढ़ियों के आख़िर में पत्थर का गड्ढा अब खुला था, और उसमें से स्याही की एक पतली लकीर ऊपर की तरफ़ बह रही थी — बिल्कुल सीधी, जैसे किसी ने उँगली से खींची हो। लकीर आँगन की दीवार तक गई और दीवार पर उभर आया — “तेरी आवाज़ का इंतज़ार है।”
मैंने रिया का हाथ कसकर पकड़ा।
“माँ,” रिया ने कहा, “रजिस्टर अब मेरे हाथ में गरम नहीं है।”
“तो?”
“अब ठंडा है। बर्फ़ जैसा।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वह अब भी रजिस्टर पकड़े थी, पर उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ रही थीं, जैसे ठंड लगी हो।
“रजिस्टर नीचे रखो,” मैंने कहा।
“नहीं रख सकती।” उसकी आवाज़ धीमी थी। “वह चिपक गया है।”
मैंने अपने हाथ से रजिस्टर खींचा। वह आया। रिया ने हाथ पीछे किया, हथेली देखी — उस पर स्याही का कोई निशान नहीं था, बस ठंड से लाल थी।
“अब?” मैंने पूछा।
“अब ठीक है।”
काजल ने ऊपर से कहा, “मीरा, तेरे पास एक रात है। कल सुबह तक या तो पूरा पन्ना या तेरी आवाज़।”
“मुझे पता है।”
मैंने रजिस्टर भैरों को दिया। “इसे गाड़ी में रखो। पीछे, ताले में।”
भैरों ने लिया। मैंने रामदीन को फोन मिलाया। “बाई के पास कितनी देर रुक सकते हो?”
“जितनी देर कहो।”
“तो फिर वहीं रुको। मैं सुबह तक आऊँगी। और रामदीन…”
“क्या?”
“तुमने कहा था कि सुशीला ने अपना नाम गाड़ा था ताकि मैं बच जाऊँ। तो फिर उसने बाबू का नाम अपने साथ क्यों जोड़ा?”
फोन पर लंबी चुप्पी। फिर उसकी आवाज़ आई, बहुत धीमी — “क्योंकि वह जानती थी कि तू खुद भी उसी काग़ज़ की धूल में लिखी है। उसने सोचा कि अगर मेरा नाम तेरे साथ रहेगा, तो तू अकेली नहीं लड़ेगी।”
“पर वह नाम अब कहाँ है?”
“वही तो मैं नहीं कह सकता,” रामदीन ने कहा, और लाइन काट दी।
मैं आँगन में खड़ी रही। स्याही की लकीर धीरे-धीरे सूख रही थी, दीवार पर लिखी लाइन फीकी पड़ रही थी।
रिया ने मेरा हाथ थामा। “माँ, सुबह तक हम क्या करेंगे?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। “वह पूरा पन्ना ढूँढेंगे। और खरीदार जो चीज़ जानता है, वह हमें भी जाननी होगी।”
“कैसे?”
“उसने खुद कहा था — उसने सब जोड़ लिया है। यानी उसके पास एक जगह है जहाँ वह सब रखता है। और वह जगह हवेली से दूर नहीं हो सकती, क्योंकि वह हवेली खरीदना चाहता है।”
भैरों ने कहा, “तो कहाँ?”
मैंने काजल की तरफ़ देखा। “तुम्हारे दादा का और कोई ठिकाना था?”
काजल ने सोचा, फिर बोली — “पीतल गली के पीछे एक कोठरी है, जहाँ मनोहर फाइलें रखता था। पर वह बंद है।”
मनोहर ने कहा, “कुंजी मेरे पास है।”
“तो चलो,” मैंने कहा।
हम सब गली की तरफ़ बढ़े। पीछे आँगन की दीवार पर वह लाइन अब भी हल्की दिख रही थी — “तेरी आवाज़ का इंतज़ार है।”
मैंने एक बार पीछे देखा, फिर आगे बढ़ गई। और मुझे तब नहीं पता था कि उस कोठरी में जो मिलेगा, वह सिर्फ़ काग़ज़ नहीं होगा — वहाँ किसी की आवाज़ भी होगी।
॥
कोठरी की सीढ़ियाँ उतरते वक़्त हवा इतनी भारी हो गई थी कि साँस लेने में रुकावट आ रही थी। नीचे से रिया की आवाज़ आई — “माँ… माँ, यह क्या कर रहा है!”
मैं दौड़ी। भैरों मेरे पीछे था, हाथ में मोबाइल, उसकी टॉर्च की रोशनी सीढ़ियों पर काँप रही थी। मनोहर पीछे रह गया, काजल के साथ, और सुधा सबसे ऊपर खड़ी थी, हाँफ रही थी।
कोठरी का दरवाज़ा खुला था। अंदर मेज़ पर रजिस्टर पड़ा था — खुला। और उसके पन्ने अपने आप उलट रहे थे। एक-एक करके, धीरे-धीरे, जैसे कोई अदृश्य हाथ उन्हें पलट रहा हो। हर पन्ने पर स्याही चमक रही थी, ताज़ी, गीली, जैसे अभी लिखी गई हो।
रिया दो क़दम पीछे हटी। “मैंने छुआ नहीं! मैंने कुछ नहीं किया!”
“पास आ जा,” मैंने कहा और उसका कंधा पकड़ा।
भैरों ने मोबाइल ऊँचा किया। रोशनी में पन्ने उलटते जा रहे थे — पच्चीस, छब्बीस, तीस… और हर पन्ने पर एक नाम, एक तारीख़, एक गली, सब स्याही से भरे हुए। जो नाम पहले धुँधले थे, वे अब गहरे हो रहे थे। जो मिट चुके थे, वे वापस उभर रहे थे।
“यह तो… यह तो पूरा भर रहा है,” भैरों ने धीमी आवाज़ में कहा।
रिया ने रजिस्टर की तरफ़ हाथ बढ़ाया, फिर खींच लिया। “माँ, यह गरम है।”
“मत छू।”
“पर यह… यह मुझे बुला रहा है।”
“रिया!”
उसने हाथ खींच लिया, पर तभी एक पन्ना उलटा और रुक गया। उस पर लिखा था — “सुशीला जोशी”। अधूरा नाम, जो अब पूरा हो रहा था। एक-एक अक्षर स्याही से भरता जा रहा था, और जैसे ही नाम पूरा हुआ, वह पन्ना हल्का-सा चमक उठा।
रिया चीखी और रजिस्टर उसके हाथ से छूटकर मेज़ पर गिरा। वह अपने आप बंद हो गया। ज़ोर से, जैसे किसी ने धक्का दिया हो।
“ऊपर आओ!” सुधा की आवाज़ ऊपर से आई, फटी हुई, बहुत तेज़। “जल्दी! दरवाज़ा बंद हो रहा है!”
मैंने ऊपर देखा। कोठरी का दरवाज़ा, जो पूरा खुला था, अब धीरे-धीरे बंद हो रहा था। जैसे कोई उसे बाहर से खींच रहा हो। चरमराहट की आवाज़ आई।
“भागो!” मैंने रिया का हाथ पकड़ा और सीढ़ियों की तरफ़ दौड़ी।
भैरों पीछे था, पर उसने पलटकर रजिस्टर उठा लिया। एक सेकंड का फ़र्क़ था। मैं सीढ़ियाँ चढ़ने लगी, रिया मेरे आगे, सुधा ऊपर खड़ी हाथ बढ़ाए हुए। काजल और मनोहर दरवाज़े के पास खड़े थे, दोनों बाहर।
“हाथ दो!” सुधा चिल्लाई।
मैंने रिया को ऊपर खींचा। सुधा ने उसे पकड़ लिया। फिर मैंने हाथ बढ़ाया, और सुधा ने मुझे खींचा।
भैरों आख़िरी था। वह दरवाज़े की तरफ़ भागा, और उसका शरीर दरवाज़े के फटे हिस्से से निकला, और उसके ठीक पीछे दरवाज़ा ज़ोर से बंद हो गया।
धमाका। पूरी हवेली काँपी।
हम सब फ़र्श पर गिरे। कुछ पल सिर्फ़ साँसों की आवाज़ थी। भैरों ने अपनी कोहनी देखी — खून नहीं, बस लकड़ी का चूरा चिपका था। रजिस्टर उसके हाथ में था, बंद।
काजल पहले उठी। उसने अपने कपड़े झाड़े और कहा, “दरवाज़ा बंद हो गया। अब अंदर जाने का रास्ता?”
“कुएँ की सीढ़ियाँ,” मैंने कहा, खड़ी होते हुए। “वही तो खुला है।”
“तो फिर चलो वहाँ से।”
“नहीं।” मैंने रजिस्टर भैरों के हाथ से लिया। “पहले यह देखते हैं कि इसमें क्या लिखा है।”
मैंने रजिस्टर खोला। पन्ने अब उलट नहीं रहे थे। वे शांत थे। पर सुशीला वाले पन्ने पर नाम अब पूरा था — “सुशीला जोशी” — और उसके नीचे एक नई लाइन उभरी थी।
मैंने पढ़ा।
“एक नाम पूरा हुआ: सुशीला जोशी। शेष: हरनाम।”
उसके नीचे खाली जगह थी। बस खाली।
“हरनाम?” काजल ने आगे झुककर देखा। “यानी बाबू हरनाम का नाम?”
“पहला नाम,” मैंने कहा। “जो अब भी नहीं है।”
काजल का चेहरा बदला। वह पीछे हटी।
मैंने फोन निकाला। रामदीन को मिलाया। एक घंटी, दो, तीन। फिर उसकी आवाज़ — “बोल।”
“रजिस्टर ने सुशीला का नाम पूरा कर दिया है। और बाबू हरनाम के नाम की जगह खाली है।”
फोन पर सन्नाटा। फिर रामदीन की आवाज़ आई, बहुत धीमी, जैसे वह खुद से बोल रहा हो। “तो फिर वह नाम उस डिब्बे में नहीं था।”
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