A Dark Secret – Chapter 388
मैंने पन्ना ठीक से पकड़ा। “क्यों?”
“ताकि दोनों साथ मिटें,” काजल ने कहा। “वह जानती थी कि बाबू का पहला नाम मिटने से सौदा कमज़ोर पड़ेगा। तो उसने अपना नाम उसके साथ चिपका दिया। जो पन्ना रजिस्टर से उठता, दोनों नाम साथ उठते। एक नहीं, दो। रजिस्टर को दो के लिए जगह बनानी पड़ती। और एक जगह तो खाली नहीं थी।”
“तो रजिस्टर ने क्या किया?”
“उसने पन्ना ही उखाड़ दिया।” काजल ने पन्ने की तरफ़ देखा, जो मेरे हाथ में काँप रहा था। “यह पन्ना रजिस्टर का नहीं है, मीरा। यह चोरी हुआ पन्ना है। रजिस्टर ने इसे बाहर निकाल दिया क्योंकि इसमें दो नाम एक साथ थे और उसे एक-एक नाम चाहिए थे। सुशीला ने अपना हिस्सा मुझे गाड़ने के लिए दिया था। तेरी माँ ने अपना नाम नहीं छोड़ा — उसने उसे बाबू का नाम में फँसा दिया।”
रिया ने कहा, “तो इसका मतलब माँ का नाम रजिस्टर में है, पर बाबू के नाम से बँधा हुआ।”
“हाँ।” काजल ने पहली बार रिया की तरफ़ सीधे देखा, बिना मुस्कुराए। “अगर तेरी माँ का नाम बचाना है, तो पहले मेरे दादा का नाम बचाना पड़ेगा। या मिटाना पड़ेगा। दोनों साथ हैं।”
भैरों ने कुछ कहना चाहा, रुक गया।
मैंने पन्ना अपनी जेब में रखा, उस पीतल की गोलियों के साथ जो पहले से थीं। मेरी जेब अब भारी थी।
“मनोहर,” मैंने कहा, “तुमने कहा था कि तुमने खरीदार के लिए हिस्सा निकाला था। कौन सा हिस्सा?”
वह झिझका। “काग़ज़ाें का। बाई के कमरे से लिखी कॉपी। पर असली डिब्बे मैंने नहीं छुए।”
“अच्छा।” मैंने टॉर्च उसकी तरफ़ की। “तो चलो, अब मुझे अस्पताल जाना है। बाई तक।”
हम सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। काजल सबसे पीछे थी, धीरे। आधी सीढ़ी पर मैंने पीछे मुड़कर देखा — वह रुकी थी, दीवार पर हाथ रखे। फिर आगे बढ़ी, और उसका पैर फिसला। भैरों ने हाथ बढ़ाया, उसने थाम लिया, बिना कुछ बोले।
ऊपर आकर मैंने सुधा को सब बताया। वह पन्ना देखकर चुप रही, फिर बोली — “मुझे यह नहीं पता था कि सुशीला ने दोनों नाम जोड़े थे। यही तो उसने छिपाया।”
“अब छिपा नहीं है,” मैंने कहा।
“अब ख़तरा बढ़ गया है,” सुधा ने कहा, धीमे। “क्योंकि जो पन्ना रजिस्टर से बाहर है, उसका हिसाब रजिस्टर में नहीं है, पर उसकी महक रजिस्टर तक जाती है। वह खरीदार यह सब जानता है। वह इसी पन्ने के लिए आया था।”
मैंने रिया की तरफ़ देखा। वह रजिस्टर गोद में लिए खड़ी थी, चुप। मुझे लगा कुछ कहूँ, पर तभी तहखाने से आवाज़ आई — दरवाज़े की, जो हमने बंद नहीं किया था। धातु की चरमराहट।
भैरों तुरंत टॉर्च लेकर गया। हम सब पीछे। सीढ़ियाँ उतरकर देखा — तहखाने का दरवाज़ा खुला था और अंदर कोई नहीं था। पर नींव के पत्थर के पास, जहाँ डिब्बा दबा था, वहाँ अब मिट्टी ऊपर उछली पड़ी थी, जैसे किसी ने जल्दी में खोदा हो।
“हमने डिब्बा निकाला तो था,” रिया ने कहा। “पर गड्ढा तो भरा हुआ था।”
“इसका मतलब कोई हमारे पीछे आया,” मनोहर ने कहा। “और उसने पत्थर के नीचे जो बचा था, वह भी निकाल लिया।”
मैंने झुककर देखा। पत्थर के नीचे एक दूसरा खोखला हिस्सा था, छोटा, जिसमें अब सिर्फ़ सूखी स्याही और एक धागा बचा था — ज़र्द रंग का, हल्का, बाल जैसा।
“यह क्या है?” मैंने पूछा।
काजल ने धागा उठाया, उँगलियों में घुमाया। “यह बाबू की तिजोरी का धागा है। उन्होंने हर चीज़ पर ऐसा धागा बाँधा था।”
“तो इसका मतलब?”
“इसका मतलब यह है,” काजल ने कहा, “कि जो पत्थर के नीचे था, वह पहले से निकाला जा चुका है। हम देर से आए।”
रिया ने अचानक कहा, “माँ।”
मैं मुड़ी। वह रजिस्टर देख रही थी, जो अब भी उसकी गोद में था। पन्ने अपने आप सरक रहे थे, धीरे-धीरे, जैसे कोई ऊपर से पन्ना पलट रहा हो।
“क्या हो रहा है?”
“यह मेरे हाथ में गरम हो रहा है।” उसकी आवाज़ सपाट थी, डर से। “और एक नया पन्ना खुल रहा है।”
मैंने झुककर देखा। नया पन्ना साफ़ था, सिर्फ़ ऊपर एक पंक्ति — “एक नाम जोड़ा गया है: सुशीला जोशी। बाबू हरनाम सिंह के साथ।”
नीचे तारीख़ नहीं थी। नीचे सिर्फ़ एक खाली जगह थी, और उस जगह के बगल में छोटे अक्षरों में — “कीमत: एक आवाज़।”
“माँ,” रिया ने कहा, “रजिस्टर तेरी आवाज़ माँग रहा है।”
मैंने रजिस्टर उसके हाथ से लिया। वह मेरे हाथ में भी गरम था, पर जलता नहीं था।
“काजल,” मैंने कहा, “तुम्हारे दादा की आवाज़ टेप में है। क्या वह आवाज़ रजिस्टर से नहीं निकाली जा सकती?”
काजल ने सिर हिलाया। “वह टेप रजिस्टर का नहीं है। वह सिर्फ़ रिकॉर्डिंग है।” फिर वह रुकी। “पर एक बात है। रजिस्टर जब आवाज़ माँगता है, तो वह आवाज़ उसी की लेता है जिसने नाम लिखा हो। सुशीला ने अपना नाम लिखा था। तो कीमत उसकी आवाज़ है।”
“मेरी माँ की आवाज़ चालीस साल से नहीं है,” मैंने कहा, गला सख़्त करके।
“तो रजिस्टर तेरी आवाज़ लेगा,” काजल ने कहा। “क्योंकि तू उसका बदला है।”
तभी ऊपर से भैरों की आवाज़ आई — “मीरा! गाड़ी में कोई बैठा है!”
मैं सीढ़ियाँ चढ़ी, सीधे आँगन में। एम्बुलेंस के पास एक आदमी खड़ा था — नहीं, बैठा था, गाड़ी के पीछे के डिब्बे में खुली सीट पर। काला कोट, चश्मा। वही।
उसने मुझे देखकर हाथ हिलाया। “मीरा जोशी। तुम्हारी गाड़ी में बैठने की इजाज़त तो नहीं माँगी, पर दरवाज़ा खुला था।”
“निकलो।”
“मैं निकलने नहीं आया।” उसने पीली फाइल खोली, पन्ने गिनाए। “तुम्हारे पास जो पन्ना मिला — सुशीला वाला — वह अधूरा है। पूरा पन्ना मेरे पास है। वह हिस्सा जो पत्थर के नीचे था।”
मैंने कदम बढ़ाया।
“अगर तुम मुझे वह पन्ना दे दो,” उसने कहा, “तो रजिस्टर तुम्हारी आवाज़ नहीं लेगा। सिर्फ़ सुशीला की आवाज़ लेगा, जो चालीस साल से है ही नहीं। यानी कुछ नहीं लेगा।”
“और बदले में?”
“बदले में मैं हवेली छोड़ दूँगा। तुम्हारे पास।”
काजल पीछे से बोली, “झूठ।”
वह हँसा। “काजल हरनाम। तुम्हारा नाम अब ‘क’ है। तुम्हें बोलने का हक़ नहीं।”
काजल आगे आई, मेरे बगल में खड़ी हुई। “मेरा नाम ‘क’ है, यह तुमने कहा। पर यह हवेली मेरे दादा की है, तुम्हारी नहीं। और मैं इसे किसी बाहरी को नहीं दूँगी।”
उसने काजल को देखा, फिर मुझे। “तो फिर रजिस्टर तुम्हारी आवाज़ लेगा। और मैं देखना चाहता हूँ कि उसके बाद तुम क्या बोलोगी।”
वह गाड़ी से उतरा, धीरे-धीरे चला, गली के मोड़ पर मुड़ा। जाते वक़्त बिना पीछे देखे बोला — “मैं कल सुबह तक इंतज़ार करूँगा। पन्ना या आवाज़। तुम्हारी मर्ज़ी।”
वह गया। गली खाली हुई।
रामदीन का फोन फिर आया। “मीरा, मैंने बाई की चिट्ठी पढ़ ली। वह कहती है कि सौदा तोड़ने के लिए तीनों पीतल की गोलियाँ एक साथ पिघलानी होंगी, वह हाथ जिसका नाम रजिस्टर में न हो। और वह पन्ना — सुशीला वाला — उसी हाथ में जलना चाहिए, तभी नाम अलग होगा।”
“यानी पहले पन्ना जलाना है।”
“हाँ। पर पन्ना अधूरा है। अधूरा पन्ना जलाने से नाम आधा जलेगा।”
“तो पूरा पन्ना चाहिए।”
“हाँ।”
मैंने फोन बंद किया और रिया की तरफ़ देखा। वह अब भी रजिस्टर गोद में लिए खड़ी थी। उसका चेहरा शांत था, पर होंठ हिल रहे थे — वह कुछ गिन रही थी, धीरे-धीरे।
“क्या गिन रही हो?”
“नाम, माँ,” उसने कहा। “रजिस्टर ने कहा था — जो अपना नाम बचाने निकला है, उसे पहले उन सबके नाम गिनने पड़ेंगे। मैं गिन रही हूँ।”
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