A Dark Secret387 / 536

A Dark Secret – Chapter 387

6 min read November 6, 2026

“माँ, तेरा नाम हल्का पड़ रहा है।”

“अच्छा है।”

“पर उसके नीचे एक नई लाइन आ रही है।”

“क्या लिखा है?”

रिया ने पढ़ा — “जो अपना नाम बचाने निकला है, उसे पहले उन सबके नाम गिनने पड़ेंगे जो उसने खोए।”

मैंने पत्थर पर हाथ रखा। ठंडा था।

“कितने नाम गिनने हैं?” मैंने पूछा।

रिया ने रजिस्टर के पन्ने उलटे। “पूरा पन्ना भरा है, माँ। बहुत सारे नाम।”

फिर अचानक, ऊपर से आवाज़ आई — सुधा की, ज़ोर से — “मीरा! ऊपर आओ! कुएँ की सीढ़ियों पर कोई खड़ा है!”

भैरों टॉर्च लेकर भागा। मैं रिया को साथ लेकर सीढ़ियाँ चढ़ी। ऊपर पहुँचकर देखा — कुएँ के मुँह पर एक आदमी खड़ा था। काला कोट, चश्मा। हाथ में पीली फाइल।

“मीरा जोशी,” उसने कहा, आवाज़ बहुत चिकनी। “मैंने सुना था तुम ज़िद्दी हो। पर इतनी ज़िद्दी नहीं सोचा था।”

“कौन हो तुम?”

“मैं वह हूँ जो पूरी हवेली खरीदना चाहता हूँ। पूरी। आधी नहीं।”

मनोहर पीछे से फुसफुसाया, “यही है। यही खरीदार है।”

आदमी ने फाइल खोली। “तुम्हारे पास जो नाम है, वह मेरे पास भी है। काजल का आधा नाम, सुधा का खाली पन्ना, सुशीला का पत्थर। मैंने सब जोड़ लिया है। बस एक चीज़ बाक़ी है — तुम्हारा नाम।”

उसने मेरी तरफ़ देखा।

“अगर तुम अपना नाम मुझे दे दो,” उसने कहा, “तो मैं शहर को तोड़ दूँगा, पर तुम्हारी बेटी का नाम नहीं लूँगा। वादा करता हूँ।”

रिया ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।

“मेरा नाम तुम्हें नहीं मिलेगा,” मैंने कहा।

“तो फिर रजिस्टर तैयार है।”

उसने फाइल बंद की और पलट गया। जाते वक़्त उसने कहा, “तीसरी मंज़िल की बाई ने अपना नाम लिख लिया है। सुनकर अच्छा लगा। पर वह अब बोल नहीं पाएगी।”

मैं सीढ़ियों पर जम गई।

“क्या कहा?”

वह रुका। “तुमने सुना। अपना नाम लिखने की कीमत होती है।”

और वह चला गया। मैंने भैरों की तरफ़ देखा। भैरों ने कहा, “मैं उसके पीछे जाऊँ?”

“नहीं।” मैंने रिया का हाथ कसकर पकड़ा। “पहले अस्पताल। बाई के पास।”

हम एम्बुलेंस की तरफ़ भागे। सुधा ने पीछे से पुकारा, “और तहखाना?”

“बंद कर दो,” मैंने कहा। “अभी के लिए।”

गाड़ी में बैठते वक़्त रामदीन का फोन आया।

“मीरा, बाई ने अपना नाम लिखा है। पर उसने लिखते वक़्त कुछ और भी लिखा था। मैंने पढ़ा।”

“क्या?”

“एक पता। अस्पताल के नीचे, पुराने भट्टे के पास, एक कमरा है जहाँ रजिस्टर रखा जाता था — असली रजिस्टर, काजल वाला नहीं। चालीस साल से बंद। बाई ने वह पता इसीलिए लिखा था कि कोई उसे ढूँढ सके।”

“और बाई?”

फोन पर सन्नाटा आया।

“बाई अब बोल नहीं रही,” रामदीन ने कहा, बहुत धीमे। “वह काग़ज़ पर झुकी है, आँखें खुली हैं, पर होंठ नहीं हिल रहे।”

मैंने एम्बुलेंस की चाबी घुमाई। इंजन ने पहली बार में नहीं पकड़ा। दूसरी बार में पकड़ा। भैरों ने तेज़ी से गाड़ी निकाली।

रिया ने मेरी तरफ़ देखा। “माँ, रजिस्टर पर एक और लाइन आई है।”

“क्या?”

वह काँप रही थी, पर पढ़ती गई — “जिसे नाम बचाना है, उसे पहले अपनी आवाज़ देनी होगी।”

॥

मैंने फोन पकड़ा और चिल्लाई — “रामदीन, साफ़ बोल! पूरी बात बोल!”

फोन पर हवा की आवाज़ आ रही थी। फिर उसका धीमा स्वर — “मीरा, फोन पर नहीं। रजिस्टर सुन रहा है।”

“क्या?”

“जो नाम बोला जाता है, वह सुनता है। मैं अभी बाई के कमरे में हूँ। वह काग़ज़ पर झुकी है। मैंने उसकी चिट्ठी पढ़ी। पर पूरी बात फोन पर नहीं कहूँगा। तुम हवेली पहुँचो। वहीं बताऊँगा।”

“रामदीन…”

“एक बात कह सकता हूँ।” उसने साँस ली। “सुशीला ने अपना नाम कब्रिस्तान में इसीलिए गाड़ा था, ताकि सौदे में उसका असली नाम कहीं दर्ज न हो। वह चाहती थी कि तू बच जाए। पर काग़ज़ के हिसाब से नाम लिखा ही रहा। नाम गाड़ने से मिटता नहीं, मीरा। वह किसी और के हाथ में चला जाता है।”

“किसके हाथ में?”

“यही तो मैं फोन पर नहीं कहूँगा। आ जाओ।”

लाइन कट गई।

मैंने एम्बुलेंस घुमाई। भैरों ने पीछे मुड़कर देखा। “हवेली?”

“हवेली।”

रिया ने मेरी बाँह पकड़ी। “माँ, अस्पताल नहीं जा रहे?”

“बाई के पास रामदीन है। वह उसे सँभाल लेगा।” मैंने गाड़ी की रफ़्तार बढ़ाई। “हमें वह चीज़ चाहिए जो तहखाने में है।”

मनोहर पीछे बैठा था, हाथ जोड़े। “मैंने तुम्हें सादा काग़ज़ दिया था ना? और पुड़िया? तो फिर मुझे क्यों ले चल रही हो?”

“क्योंकि तुम वहाँ हो जहाँ मैं नहीं पहुँच सकती,” मैंने कहा। “तुम काजल के मुंशी हो। तुम्हें हवेली का हर कोना याद है। और तुम्हारा खुद का नाम रजिस्टर से मिट चुका है। यानी तुम अंदर आ सकते हो तहखाने में बिना रजिस्टर के पकड़े।”

मनोहर ने कुछ सोचा, फिर सिर हिलाया। “तहखाने में हर तरफ़ एक ताले का कमरा है — बीच में नींव का पत्थर। वहाँ बाबू हरनाम ने स्याही का घड़ा फोड़ा था। चालीस साल से वह स्याही सूखकर मिट्टी में मिल गई है। पर महक नहीं गई।”

एम्बुलेंस हवेली के पिछले हिस्से में रुकी। सुधा दरवाज़े पर खड़ी थी, शालिनी उसके पीछे। काजल दहलीज़ पर बैठी थी, घुटने सीने से लगाए।

मैं उतरी। “काजल, चलो।”

“मैं नहीं जा रही,” उसने कहा, आवाज़ सूखी। “तहखाने में वही हुआ था जो मुझे हर रात दिखता है। मैं डरती हूँ।”

“तुम डरती हो या तुम्हें याद नहीं आता कि क्या गाड़ा था?”

वह उठी। देर तक मेरी तरफ़ देखती रही। फिर बोली — “मुझे याद है। मैंने ही तो गाड़ा था।”

भैरों ने लोहे का दरवाज़ा खोला। सीढ़ियाँ नीचे गईं। पहली सीढ़ी पर पैर रखते ही ठंडी हवा आई, और साथ में वह महक — फँसी हुई, मीठी, पुराने काग़ज़ की गोंद जैसी। रामदीन की बताई हुई स्याही। पर यहाँ वह इतनी तेज़ थी कि गला भर आया।

“स्याही का घड़ा,” मनोहर ने फुसफुसाया, मेरे पीछे आते हुए। “यहाँ ही है। बहुत सारा।”

टॉर्च की रोशनी में मिट्टी साफ़ दिखी — ऊपर सूखी, नीचे थोड़ी गीली। कोने में फूटा हुआ पीतल का घड़ा पड़ा था, बड़ा, आधे से ज़्यादा मिट्टी में धँसा। उसके नीचे से स्याही की एक लकीर बहकर नींव के पत्थर तक गई थी, और वह लकीर अब भी गाढ़ी काली थी, जैसे सूखी न हो।

रिया ने रजिस्टर खोला। “माँ, यहाँ गर्मी है।”

“मैं देख रही हूँ।”

भैरों ने नींव का पत्थर घुमाया। वह ज़ोर से निकला, नीचे से मिट्टी उड़ी। पत्थर के नीचे एक और डिब्बा था — पीतल का, छोटा, मुट्ठी भर। काजल ने देखते ही हाथ मुँह पर रख लिए।

“यही है,” वह बोली। “यही मैंने गाड़ा था।”

मैंने डिब्बा उठाया। ढक्कन में सख़्ती थी। भैरों ने छेनी जैसा कुछ पत्थर का देकर खोला। अंदर एक कटा हुआ पन्ना था — आधा जला, आधा फटा, ऊपर स्याही में लिखा हुआ, और नीचे से कटा हुआ। सिर्फ़ इतना पढ़ा गया — “सुशीला।” आगे का हिस्सा फटा था। पन्ने के किनारे उँगली के निशान बने थे, और वे निशान अब भी गीले थे।

रिया ने पन्ना देखा। “माँ, यह तेरी माँ का नाम है। अधूरा है।”

मेरे हाथ काँपे। मैंने पन्ना काजल की तरफ़ बढ़ाया। “किसका है यह?”

वह पीछे हटी। “इसीलिए मैं नहीं आना चाहती थी।”

“काजल।”

वह दीवार से टिक गई, आँखें बंद कर लीं, फिर खोलीं। “तेरी माँ ने अपना नाम नहीं लिखवाया था, मीरा।” उसकी आवाज़ पहली बार साफ़ थी, कोई मिठास नहीं, कोई गोंद नहीं। “उसने आख़िरी वक़्त में बाबू हरनाम का पहला नाम अपने नाम के साथ जोड़ दिया था। एक ही पन्ने पर। दोनों एक साथ।”

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho