A Dark Secret – Chapter 386
“मैं चाबी लेकर तहखाने जाना चाहता था। उस पत्थर के नीचे नाम है — मैंने इंद्रजीत से सुना था। मैं सोचता था कि अगर मैं अपना नाम खुद लिख दूँ, तो वापस आ जाएगा।”
“इंद्रजीत?”
“चौकीदार। कब्रिस्तान वाला। वह जानता है, पर किसी को नहीं बताता।”
मैंने रिया की तरफ़ देखा। वह हवेली के बरामदे में खड़ी थी, गोद में रजिस्टर, हाथ पीले पन्ने पर। सुधा उसके पीछे खड़ी थी, और काजल दहलीज़ के बाहर, जैसे वह अंदर क़दम रखने से डर रही हो।
“मनोहर,” मैंने कहा, “तू मेरा टायर भी काटा था?”
वह चुप हुआ।
“काजल के कहने पर?”
“मैडम ने कहा था कि तू ज़्यादा आगे बढ़ रही है। सिर्फ़ एक टायर काटना था। बस रोकने के लिए।”
काजल ने दहलीज़ से आवाज़ दी — “मैंने ऐसा नहीं कहा था। मैंने कहा था कि उसे रोकना पड़ेगा।”
“वही तो कहा था, मैडम,” मनोहर ने कहा, बिना पलटे। “बस आपने ‘रोकना’ शब्द बोला था, और मैंने उसे अमल में उतार दिया।”
काजल ने हाथ उठाया। मैंने उसकी कलाई पकड़ ली।
“अभी नहीं,” मैंने कहा। “अभी हम सब एक ही रास्ते पर हैं।”
काजल ने हाथ नीचे किया। उसकी आँखें मोटी थीं, जैसे दो रातों से सोई न हो।
मनोहर ने चाबी मेरी हथेली पर रख दी।
“पर सुन ले,” उसने कहा। “तहखाने में एक ही रास्ता है। वहाँ से लौटने का रास्ता सीधा नहीं होता। सुशीला मैडम इसे जानती थीं। इसीलिए उन्होंने अपना नाम वहाँ गाड़ा था — किसी और के भरोसे नहीं।”
भैरों ने कहा, “मैं साथ चलूँगा।”
रिया ने कहा, “मैं भी।”
“नहीं,” मैंने कहा, बिना सोचे।
“रजिस्टर मेरे हाथ में है, माँ। तेरे हाथ में नहीं। अगर नीचे तेरा नाम खाली होने लगे, तो रजिस्टर मेरे पास होगा — मैं उसे तेरा नाम बोलकर याद दिला सकती हूँ।”
सुधा ने कहा, “मैं नहीं जा सकती। तहखाने में मेरा नाम फिर खाली हो सकता है। मैं बाहर रहकर कुएँ की सीढ़ियाँ देखूँगी।”
काजल ने कहा, “मैं भी नहीं जाऊँगी। मेरा नाम आधा है — नीचे जाकर वह पूरा खाली हो जाएगा।”
“ठीक है,” मैंने कहा। “तू बाहर रुक।”
वह चौंकी। शायद उसे लगा था कि मैं उसे मजबूर करूँगी।
“अगर मैं न लौटूँ,” मैंने कहा, “तो रजिस्टर रिया के पास रहेगा। और तू रिया का ख़याल रख।”
काजल ने कुछ कहना चाहा, पर चुप रही। सिर्फ़ सिर हिलाया।
हम हवेली के पिछले हिस्से में पहुँचे। जंग लगी सीढ़ियाँ नीचे जाती थीं। भैरों ने टॉर्च जलाई, और सबसे पहले उतरा। फिर मैं, फिर रिया, और सबसे आख़िर में मनोहर, जिसके हाथ में उसकी फाइलें थीं।
सीढ़ियाँ गीली थीं। दीवारों पर काई जमी थी। नीचे पहुँचकर मैंने एक ठंडी स्याही की महक सूँघी — वही महक जो माँ की संदूक से आती थी।
भैरों ने टॉर्च आगे की। एक लोहे का दरवाज़ा था, पूरा जंग खाया, बीच में बड़ा ताला।
“यही है,” मनोहर ने कहा।
मैंने चाबी डाली। ताला दो बार घूमा, फिर तीसरी बार अटक गया। भैरों ने अपना कंधा लगाया। दरवाज़ा चरमराकर खुला, और अंदर से बहुत पुरानी हवा बाहर आई।
कमरा छोटा था। दीवारों पर शेल्फ़ थे, और शेल्फ़ों पर लकड़ी के डिब्बे। बीच में एक पत्थर रखा था, चौकोर, सपाट। उस पर उभरी लिखाई थी।
मैंने टॉर्च माँगी। रोशनी पत्थर पर डाली। उभरी लिखाई में सिर्फ़ एक नाम था — सुशीला जोशी। और उसके नीचे, छोटे अक्षरों में, एक लाइन — “जिसने अपना नाम खुद लिखा, उसे कोई नहीं उठा सकता।”
मैंने घुटने टेके। उँगली से उस लाइन को छुआ।
“माँ ने यह लिखा है,” मैंने कहा।
“हाँ,” मनोहर ने कहा। “और उस दिन के बाद उन्होंने अपना नाम फिर कभी नहीं खोया।”
भैरों ने पीछे से कहा, “तो इसका मतलब है कि तेरा नाम भी अगर तू खुद लिख दे, तो तू इसे हरा सकती है।”
“पर लिखने के लिए क्या चाहिए?” रिया ने पूछा।
मनोहर ने अपनी फाइल खोली और उसमें से एक पीली पुड़िया निकाली। “यही। रजिस्टर की स्याही।”
मैंने पुड़िया ली। उसमें सूखी स्याही थी, दानेदार। मैंने उसे सूँघा। वही महक — फँसी हुई, थोड़ी मीठी।
“यह कहाँ से आई?” मैंने पूछा।
“मैंने सुशीला मैडम के संदूक से ली थी, बहुत साल पहले। माफ़ करना। मुझे लगा था कि इससे मेरी फाइल भर जाएगी।”
मैंने पुड़िया जेब में रखी। तभी कमरे की दीवार पर कुछ हिला। मैंने टॉर्च घुमाई।
दीवार पर स्याही से लिखा था, ताज़ी स्याही से — “देर हो रही है, मीरा जोशी।”
रिया ने रजिस्टर खोला। “माँ, तेरा नाम और गहरा हो रहा है। और नीचे तारीख़ बदल रही है — अब आज और कल दोनों लिखी हैं।”
“यानी रजिस्टर को जल्दी है,” मनोहर ने कहा। “वह चाहता है कि तू यहाँ रुक जाए।”
मैंने पत्थर की तरफ़ देखा। उस पर अपना नाम खुदवाने का मन हुआ। पर तभी मुझे एहसास हुआ — पत्थर पर नाम खुदवाने के लिए भी उसी पीतल की कलम से लिखना होगा।
“कलम कहाँ है?” मैंने पूछा।
“कौन सी कलम?” मनोहर ने पूछा।
“जो माँ की संदूक में थी। वही पीतल की कलम जो रामदीन के पास थी।”
“वह तो तेरे पास होनी चाहिए,” भैरों ने कहा। “जो चीज़ें तूने अस्पताल से उठाईं, वे सब एम्बुलेंस में हैं।”
मैं ऊपर भागी। सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त मेरे फेफड़े जल रहे थे। एम्बुलेंस का पिछला दरवाज़ा खोला, और डिब्बों में हाथ डाला। मिल गई — कपड़े में लिपटी, ठंडी, भारी।
वापस नीचे उतरते वक़्त मैंने देखा — मनोहर ने मेरा रास्ता रोक लिया था। सीढ़ी के बीच में खड़ा था।
“क्या?” मैंने पूछा।
“एक बात कहनी है। अगर तू अपना नाम यहाँ लिख देगी, तो रजिस्टर को इसका पता चल जाएगा। वह जान जाएगा कि उसे कहाँ खोजना है।”
“तो?”
“तो वह पहले तेरा नाम उठाएगा, और फिर तेरी माँ का।”
मैं सीढ़ी पर रुकी। ठंडी हवा पीछे से आ रही थी।
“मेरी माँ का नाम तो पहले ही उठ चुका है,” मैंने कहा।
“नहीं। तेरी माँ का नाम — सुशीला जोशी — अभी भी उस पत्थर में है। उसे कोई नहीं उठा सका, क्योंकि उसने खुद लिखा था। पर अगर तू भी खुद लिखेगी, तो उस पत्थर पर दो नाम हो जाएँगे। रजिस्टर को दोनों में से एक चुनना होगा।”
“तो मैं क्या करूँ?”
“तू अपना नाम उस काग़ज़ पर लिख जो रजिस्टर में न हो। तू पहले से रजिस्टर में है। मेरा मतलब — रजिस्टर के बाहर कोई ऐसा काग़ज़ ढूँढ जो रजिस्टर का हिस्सा न हो। उस पर लिख। फिर तेरा नाम रजिस्टर से बाहर चला जाएगा, और वह तुझे नहीं पकड़ पाएगा।”
“काग़ज़ कौन सा?”
उसने अपनी फाइल से एक पन्ना निकाला। सादा, बिना लिखा।
“यह हवेली के बाहर का काग़ज़ है। मैं इसे बाज़ार से लाया था, अपने नाम के लिए। अब तेरे काम आएगा।”
मैंने पन्ना लिया। फिर उसकी आँखों में देखा।
“तू अपना नाम क्यों नहीं लिख रहा?”
“क्योंकि रजिस्टर ने मेरा नाम पहले ही खाली कर दिया है। अब उस पर लिखने का कोई मतलब नहीं।”
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। “अगर मैं इसे तोड़ दूँ, तो मैं तेरा नाम भी वापस लाने की कोशिश करूँगी।”
वह हँसा, सूखा हँसा। “पहले अपना बचा ले।”
हम नीचे पहुँचे। रिया ने पीतल की कलम मेरी तरफ़ बढ़ाई। मैंने पुड़िया खोली, उसमें थोड़ा पानी डाला, और स्याही गाढ़ी होने लगी। फिर कलम की नोक डुबोई।
“क्या लिखूँ?” मैंने पूछा।
“अपना पूरा नाम, गली, आवाज़ — तीनों,” भैरों ने कहा। “माँ ने यही लिखा था।”
मैंने काग़ज़ पर लिखा — “मीरा जोशी, पीतल गली के पास की कोठी, आवाज़ वही जो अभी बोल रही है।”
जैसे ही कलम उठाई, पत्थर पर सुशीला का नाम धुँधला पड़ा — फिर साफ़ हो गया। और मेरे हाथ से काग़ज़ गरम होने लगा। मैंने उसे नीचे रख दिया। रिया ने रजिस्टर खोला और देखा।
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