A Dark Secret – Chapter 385
मैंने गोलियों को हथेली में रखा और उन्हें देखा। तीनों पर एक जैसी खुदाई थी, एक जैसी स्याही की महक। मैंने उन्हें करीब लाया। तभी एक गोली गरम हुई — नहीं, ठंडी हुई, बर्फ़ जैसी। मैंने हाथ खोला।
“बाबू हर” वाली गोली पर एक नई लाइन उभर रही थी, ताज़ी स्याही से — “जल्दी कर, मीरा।”
मैंने गोलियाँ जेब में रखीं और अस्पताल की सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ी। सुमित्रा देवी मेरे पीछे आईं।
“तुम अकेली मत जाओ,” उन्होंने कहा।
“तुम मेरे साथ चलोगी?”
“हाँ। मैं उस कमरे का दरवाज़ा जानती हूँ।”
हम तीसरी मंज़िल पर लौटे। सुमित्रा देवी ने रिकॉर्ड रूम के बगल में एक और दरवाज़ा दिखाया — छोटा, लोहे का, जिस पर कोई नंबर नहीं था। दरवाज़े पर जंग लगी थी और हैंडल टूटा हुआ था।
“यह कमरा चालीस साल से बंद है,” सुमित्रा देवी ने कहा। “मैंने इसे कभी खुलते नहीं देखा।”
“आज खुलेगा,” मैंने कहा।
भैरों ने हथौड़ा उठाया और हैंडल पर एक ज़ोरदार वार किया। हैंडल टूटकर गिरा। दरवाज़ा धीरे से खुला और अंदर से वही स्याही की महक आई, बहुत तेज़, बहुत पुरानी।
अंदर एक छोटा कमरा था। ज़मीन पर पत्थर का फ़र्श, कोने में एक चारपाई, एक छोटी अलमारी, और दीवार पर एक पुराना कैलेंडर जिस पर साल लिखा था — चालीस साल पहले का। कमरे के बीच में एक बूढ़ी औरत बैठी थी, सफ़ेद साड़ी में, सिर झुकाए। उसके हाथ में एक पीतल की कलम थी और सामने ज़मीन पर काग़ज़ों का ढेर।
वह उठी नहीं। बस सिर उठाया और मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें धुँधली थीं, पर उनमें कुछ था — कोई पुरानी पहचान।
“तू सुशीला की बेटी है,” उसने कहा। आवाज़ सूखी थी, जैसे चालीस साल से बोली न हो।
“हाँ।”
“मुझे तेरे आने का इंतज़ार था।” उसने काग़ज़ों की तरफ़ इशारा किया। “बैठ। बहुत काम बाक़ी है।”
मैंने भैरों की तरफ़ देखा। वह दरवाज़े पर खड़ा था, हथौड़ा अब भी हाथ में। बूढ़ी औरत ने उसे देखा और मुस्कुराई।
“डरो मत,” उसने कहा। “मैं तुम्हारा नाम नहीं लूँगी। मैं तो खुद ही उस काग़ज़ पर नहीं हूँ।”
मैंने आगे बढ़कर उसके सामने बैठ गई। “तुम्हारा नाम क्या है?”
उसने कलम उठाई और काग़ज़ पर कुछ लिखा — “जो नाम मेरा होता, वह मैंने कभी जाना नहीं।”
“तो मैं तुम्हें क्या बुलाऊँ?”
वह कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर बोली, “जो लोग मुझे जानते थे, वे मुझे ‘बाई’ बुलाते थे। बस बाई।”
उसने सामने रखे काग़ज़ों में से एक उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
“यह तेरे लिए है,” उसने कहा। “सुशीला ने इसे मेरे पास छोड़ा था। कहा था कि जब उसकी बेटी आए, तो दे देना।”
मैंने काग़ज़ लिया। उस पर माँ की लिखाई थी, काँपती हुई, जल्दी में लिखी — “मीरा, तू जब यह पढ़े, तो मैं नहीं होऊँगी। पर सुन — रजिस्टर को तोड़ने के लिए तीनों हिस्से चाहिए, और उन्हें एक साथ पिघलाना होगा। पिघलाने के लिए आग नहीं, स्याही चाहिए — वही स्याही जो रजिस्टर में है। और उसे पिघलाने वाला हाथ वही होगा जिसका नाम रजिस्टर में न हो। मैंने तेरा नाम कभी नहीं लिखवाया — मैंने सिर्फ़ तेरे होने वाले बच्चे का नाम लिखवाया था, यह सोचकर कि अगर मैं न रहूँ, तो वह नाम तुझे बचाएगा। पर रजिस्टर ने उसे तेरे नाम में बदल दिया। इसीलिए तेरा नाम है उसमें, और इसीलिए तू ही उसे पिघला सकती है।”
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा। मेरे हाथ काँप रहे थे।
“माँ ने यह कब लिखा?” मैंने पूछा।
“जिस रात वह भागी थी,” बाई ने कहा। “उस रात वह इस कमरे में आई थी। मुझसे मिली। मुझे अपना नाम दिया — बस थोड़ी देर के लिए। मैंने उसे काग़ज़ पर लिख दिया। फिर वह चली गई। उसके बाद रजिस्टर ने मेरा नाम भी उठा लिया, पर मैं यहाँ रह गई, क्योंकि मैंने अपना नाम कभी खुद नहीं लिखा था।”
उसने कलम उठाई। “अब तू जा। तेरा काम बाक़ी है। और मेरा भी।”
“तुम्हारा क्या काम?”
“मुझे अपना नाम लिखना है,” उसने कहा। “आज पहली बार। अपने हाथ से।”
मैं उठी। भैरों ने दरवाज़ा खोला। बाहर निकलते वक़्त मैंने एक बार पीछे मुड़कर देखा। बाई काग़ज़ पर झुकी हुई थी, कलम हाथ में, और उसकी उँगली काँप रही थी।
सीढ़ियों से उतरते वक़्त मेरे फोन की घंटी बजी। रिया का नाम आया।
“माँ,” उसकी आवाज़ आई, बहुत तेज़। “रजिस्टर का पन्ना अपने आप पलट रहा है। और उस पर एक नाम उभर रहा है।”
“किसका नाम?”
“तेरा, माँ। तेरा। और तारीख़ — आज की।”
मैं सीढ़ियों पर रुक गई। भैरों ने मेरी तरफ़ देखा।
“रिया,” मैंने कहा, अपनी आवाज़ को स्थिर रखते हुए। “तू मेरा नाम, मेरी गली, और मेरी आवाज़ — तीनों याद रख। और अगर मैं भूलने लगूँ, तो मुझे बोलना। मैं सुनूँगी।”
“माँ—”
“अभी के लिए रजिस्टर बंद कर दे। और हवेली में किसी को अंदर मत आने देना। मैं आ रही हूँ।”
मैंने फोन काटा और भैरों की तरफ़ देखा।
“गाड़ी तेज़ चलानी होगी,” मैंने कहा।
“क्या हुआ?”
“मेरा नाम उभर रहा है। रजिस्टर मुझे बुला रहा है। और अगर मैं हवेली पहुँचने से पहले भूलने लगी, तो तू मुझे मेरा नाम बोलना।”
भैरों ने सिर हिलाया। “क्या नाम बोलूँ?”
“मीरा जोशी, पीतल गली के पास की कोठी, और मेरी आवाज़ — जो अभी तुझसे बोल रही है।”
उसने मेरी आवाज़ सुनी और सिर हिलाया।
“समझ गया,” उसने कहा। “चल।”
हम एम्बुलेंस की तरफ़ भागे। पीछे, तीसरी मंज़िल की उस खिड़की में, बाई ने बत्ती जला दी थी।
और मुझे तब नहीं पता था कि जब मैं हवेली पहुँचूँगी, तब तक रजिस्टर पर मेरा नाम पूरा उभर चुका होगा — और उसके नीचे एक नई लाइन भी, जो अभी किसी ने नहीं पढ़ी थी।
॥
मैंने फोन कान से लगाया हुआ था और भैरों की आँखों में देख रही थी। रामदीन की आवाज़ आई, धीमी, जैसे किसी पुराने ताले में चाबी घूम रही हो।
“मीरा, तहखाने में जाने से पहले एक बात सुन ले। तेरी माँ ने वहाँ जो गाड़ा था, वह बाबू हरनाम का नाम नहीं था। वह उसका अपना नाम था।”
मैंने गाड़ी का दरवाज़ा पकड़ लिया। भैरों ने मेरी तरफ़ देखा।
“मेरी माँ का नाम?”
“उसने अपना नाम उस डिब्बे में इसलिए रखा था कि अगर रजिस्टर उसे उठाए, तो उसे अपना पूरा नाम वापस लेने का रास्ता मिल जाए। पर वह नहीं आई। वह भूल गई।”
“मैं भूलूँगी नहीं,” मैंने कहा।
“तू भूल सकती है। हर कोई भूलता है। बस एक फ़र्क़ है — जो अपना नाम खुद लिख लेता है, उसे कोई नहीं मिटा सकता। यह बाई ने अभी मुझे बताया।”
फोन कट गया। मैंने एम्बुलेंस को हवेली के पीछे लगाया। सामने लोहे का दरवाज़ा था, जंग लगा, आधा खुला। मनोहर पीछे बैठा था, हाथ जोड़े, फाइलें गोद में।
“चाबी कहाँ है?” मैंने पूछा।
“मैं देता हूँ,” उसने कहा, और अपनी जेब से एक पुरानी लोहे की चाबी निकाली, जिसमें धागा बँधा था। “पर पहले सुन लो।”
“क्या?”
“मैं दस साल से काजल मैडम के लिए नाम लिख रहा हूँ। रजिस्टर में, काग़ज़ों में, फाइलों में। हर नाम मैंने लिखा है — तारीख़, गली, घर, सब। और कल रात मैंने अपनी फाइल खोली। मेरा नाम वहाँ नहीं था। खाली था। मेरी जगह सिर्फ़ तीन तारीख़ें थीं।”
उसकी आवाज़ टूट गई। यह वही मनोहर था जिसने कब्र खोदी थी, जिसने काग़ज़ जलाए थे। पर अभी उसकी आँखों में वही डर था जो मेरे अंदर था।
“तभी तू भागा?” मैंने पूछा।
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