A Dark Secret384 / 536

A Dark Secret – Chapter 384

7 min read November 6, 2026

रूम के अंदर रैक पर रैक लगे थे, काग़ज़ों के बंडल रस्सी से बँधे थे, कुछ खुले पड़े थे, कुछ ज़मीन पर गिरे थे। अलमारी के पास एक लोहे की छोटी मेज़ थी जिस पर कोई हाल में बैठा था — कुर्सी सरका हुआ था और मेज़ पर चाय का अधूरा कप रखा था।

“गरम है,” भैरों ने कप छूकर कहा।

“तो यहीं है,” मैंने कहा।

मैंने रैक के बीच से निकलकर फाइलें देखनी शुरू कीं। कुछ फाइलों पर सिर्फ़ तारीख़ लिखी थी — नाम की जगह खाली। मैंने एक फाइल खोली — अंदर मरीज़ का नाम नहीं था, बस एक तारीख़ थी और पीछे लिखा था “हस्ताक्षरित, चड्ढा।”

“यह क्या है?” मैंने सुनीता से पूछा।

सुनीता ने फाइल हाथ में ली और देखा। उसका चेहरा बदला।

“यह मेरी तारीख़ है,” उसने कहा। “अठारह साल पहले की। इसमें नाम होना चाहिए था। मेरा नाम।”

“पर किसी ने मिटा दिया।”

“नहीं,” सुनीता ने धीमे से कहा। “यहाँ नाम लिखा ही नहीं गया था। मेरा नाम रजिस्टर में था, अस्पताल के काग़ज़ में कभी आया ही नहीं। इसीलिए जब मैं गुम हुई, किसी को पता नहीं चला।”

भैरों ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “अब पता चला। बस यही काफ़ी है।”

मैं आगे बढ़ी। रैक के आख़िरी कोने में एक पुरानी लकड़ी की अलमारी थी जिसका दरवाज़ा टूटा था। उसके अंदर बंडलों के नीचे कुछ दबा था। मैंने हाथ बढ़ाया — एक पीला लिफ़ाफ़ा निकला, जिस पर कोई नाम नहीं था, पर मुहर हरनाम की थी।

“रुको,” सुनीता ने कहा। “यह वही लिफ़ाफ़ा है जो मनोहर लेकर चला था।”

मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक फाइल थी, आधी जली हुई। ऊपर के कोने पर साफ़ अक्षरों में लिखा था — “सुनीता चौहान, पड़ाव गली, एक।” और नीचे, छोटे अक्षरों में — “पुत्री: शालिनी।”

सुनीता ने फाइल देखी और एक हाथ मुँह पर रख लिया। फिर वह बैठ गई, वहीं ज़मीन पर, काग़ज़ों के बीच।

“मेरी बेटी का नाम,” वह बोली। “यहाँ लिखा है। मेरी बेटी का नाम इस फाइल में है।”

“तो इसे बचाना है,” मैंने कहा। “यह काग़ज़ अब किसी को जलाने नहीं देना।”

मैंने फाइल अपनी जेब में रखी और आगे बढ़ी। तभी पीछे रैक के पीछे से आवाज़ आई — हल्की खड़खड़ाहट, जैसे कोई बैठा हो और उसका पैर काग़ज़ों पर रगड़ रहा हो।

भैरों ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया। उसने रैक पकड़कर ज़ोर लगाया और उसे किनारे धकेल दिया।

पीछे, दीवार के साथ, ज़मीन पर मनोहर बैठा था। उसकी शर्ट मैली थी, बाल बिखरे थे, हाथों में एक पीतल का डिब्बा दबाए बैठा था। उसके सामने ज़मीन पर कुछ काग़ज़ बिखरे थे — कुछ खाली, कुछ पर आधे नाम।

वह उठा नहीं। बस घुटनों के बल बैठा हाथ जोड़कर मेरी तरफ़ देखने लगा।

“मैडम ने नहीं भेजा,” वह काँपते हुए बोला। “मैं खुद भागा हूँ।”

“भागा क्यों?” मैंने पूछा।

उसने काग़ज़ों की तरफ़ इशारा किया। “देखिए। मेरा नाम। मेरा अपना नाम।”

मैंने झुककर एक काग़ज़ उठाया। उस पर लिखा था — “मनोहर, चालीस वर्ष, लेखक।” और नीचे, एक और लाइन थी जो आधी मिटी हुई थी — “पत्नी: …”

“यह क्या है?” मैंने पूछा।

“मैं चालीस साल से हरनाम के लिए नाम लिखता आया हूँ,” मनोहर ने कहा, आवाज़ लड़खड़ा रही थी। “हर फाइल, हर रजिस्टर, हर काग़ज़। मैंने सोचा था मैं लिखने वाला हूँ, मिटाने वाला नहीं। पर कल रात मैंने अपना ही नाम इन काग़ज़ों में देखा — खाली। मेरी पत्नी का नाम भी।”

भैरों ने मेरी तरफ़ देखा। “यह सच बोल रहा है।”

“तुम्हें कैसे पता?”

“क्योंकि मैंने भी यही देखा था,” भैरों ने कहा, बहुत धीमे से। “तीन साल पहले, मेरी बेटी आशा के साथ। जब उसका नाम उतरा, तो काग़ज़ों में सिर्फ़ तारीख़ बची थी।”

मनोहर ने पीतल का डिब्बा आगे बढ़ाया। “यह मेरे पास है। इसमें बाबू हरनाम का पहला हिस्सा है — ‘बाबू हर’। मैंने इसे काले कोट-चश्मे वाले को बेचने की कोशिश की, पर उसने मना कर दिया। उसने कहा कि वह पूरा चाहता है, आधा नहीं।”

“कौन है वह?” मैंने पूछा।

“मुझे नाम नहीं पता,” मनोहर ने कहा। “वह सिर्फ़ कहता है कि वह हवेली खरीदना चाहता है, पूरी, और उसके साथ वह सब जो उसके नीचे है।”

मैंने डिब्बा लिया और खोला। अंदर एक पीतली की गोली थी जिस पर खुदा था — “बाबू हर।” मैंने उसे जेब में रखा और मनोहर की तरफ़ देखा।

“तुमने सुशीला की क़ब्र क्यों खोदी?”

मनोहर ने आँखें नीची कर लीं। “क्योंकि मैडम ने कहा था कि अगर तीसरा हिस्सा नहीं मिला, तो मेरा नाम कभी वापस नहीं आएगा। मैंने सोचा कि सुशीला ने कुछ छिपाया होगा। पर क़ब्र में सिर्फ़ एक पीतल का डिब्बा था, खाली, और उसके तले पर लिखा था — ‘भूलो मत।’”

“तो तुम्हें कुछ नहीं मिला?”

“कुछ नहीं।” उसने एक काग़ज़ उठाया। “बस यह। यह मैंने खुद लिखा था, बहुत पहले। पता नहीं क्यों।”

मैंने काग़ज़ देखा — उस पर लिखा था “रिया जोशी, हरनाम हवेली।” मेरा खून ठंडा हो गया।

“तुमने यह क्यों लिखा?”

“मुझे याद नहीं,” मनोहर ने कहा, और उसकी आवाज़ में सच में डर था। “मुझे याद नहीं कि मैंने यह कब लिखा। बस इतना याद है कि मैडम ने कहा था कि रखवाले का नाम पहले से तय है, और वह रिया ही है।”

मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा। “तुम मेरे साथ चलोगे।”

“कहाँ?”

“हवेली। तुम वहाँ जो जानते हो, सब बोलोगे। काजल के सामने।”

मनोहर ने भैरों की तरफ़ देखा, जैसे उससे मदद माँग रहा हो। भैरों ने कुछ नहीं कहा।

“मैं चलूँगा,” मनोहर ने धीमे से कहा। “पर एक बात — मेरी फाइल भी साथ ले चलिए। जिसमें मेरा नाम है। अगर वह मिट गया, तो मैं भी मिट जाऊँगा।”

मैंने सुनीता की तरफ़ देखा जो दरवाज़े पर खड़ी सब सुन रही थी। उसने मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया।

“ले चलो,” मैंने कहा। “पर सुनीता की फाइल मेरे पास रहेगी।”

मैंने सुनीता की आधी जली फाइल अपनी जेब से निकाली और उसे देखा। काग़ज़ के किनारे जले थे, पर नाम साफ़ था। मैंने उसे सुनीता को दिया।

“यह तेरी है,” मैंने कहा। “तू इसे रख।”

सुनीता ने फाइल दोनों हाथों से पकड़ी, जैसे कोई बहुत पुरानी चीज़ मिल गई हो। उसकी आँखें भर आईं, पर वह रोई नहीं।

“मैं इसे शालिनी को दिखाऊँगी,” उसने कहा। “उसे पता चलेगा कि उसकी माँ का नाम कहीं लिखा था।”

हम नीचे उतरे। इमरजेंसी वार्ड के बाहर सुमित्रा देवी बेंच पर बैठी थीं। उन्होंने हमें देखा और उठकर आईं।

“क्या मिला?” उन्होंने पूछा।

“बहुत कुछ,” मैंने कहा। “पर एक बात पूछनी है। तीसरी मंज़िल के स्टोर में चालीस साल से कोई बंद है — तुम्हें पता है?”

सुमित्रा देवी ने मेरी तरफ़ देखा और उनका चेहरा बदल गया।

“तुम्हें कैसे पता?”

“किसी ने कहा।”

वह कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं, “मैं उस औरत को नहीं जानती। पर मैंने एक बार सुना था, बहुत पहले, जब मैं नई नर्स थी। कहते थे कि तीसरी मंज़िल पर एक कमरा है जिसमें कोई औरत रहती है, जो हरनाम के लिए अंगूठा लगाने का काम करती थी। उसका नाम कभी रजिस्टर में नहीं लिखा गया। इसीलिए वह मरती भी नहीं, और जाती भी नहीं।”

“वह अब भी वहाँ है?”

“मुझे नहीं पता,” सुमित्रा देवी ने कहा। “पर जब से तुमने रजिस्टर के बारे में बताया, मुझे लगता है कि वह वहाँ हो सकती है।”

मैंने भैरों की तरफ़ देखा। “हमें वापस ऊपर जाना होगा।”

“पहले मनोहर को गाड़ी में बिठा दो,” भैरों ने कहा। “वह भागे नहीं, इसका इंतज़ाम करना होगा।”

हमने मनोहर को एम्बुलेंस की पिछली सीट पर बिठाया और भैरों उसके बगल में बैठ गया। मैंने दरवाज़ा बंद किया और अपनी जेब से तीनों गोलियाँ निकालीं — “बाबू”, “सिंह” — और अब “बाबू हर” भी। तीनों हिस्से अब मेरे पास थे। सिर्फ़ जोड़ना बाक़ी था।

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