A Dark Secret383 / 536

A Dark Secret – Chapter 383

6 min read November 6, 2026

मैंने पहली ईंट पर हथौड़ा मारा। ईंट टूटी। दूसरी, तीसरी। धूल उड़ी। दस मिनट में एक आदमी के निकलने लायक छेद बन गया।

मैंने अंदर झाँका। अँधेरा था। स्याही की महक आ रही थी — बहुत तेज़।

"बत्ती है?"

भैरों ने अपना मोबाइल जलाया। उसकी रोशनी में मैंने देखा — तहखाने का कोना, और वहाँ एक पत्थर, जिस पर कुछ खुदा था।

मैं अंदर उतरी। पत्थर के पास गई। उस पर लिखा था — "यहाँ से शुरू हुआ था।"

मैंने पत्थर को धकेला। वह हिला। भैरों ने भी धक्का दिया। पत्थर सरक गया और उसके नीचे एक गड्ढा दिखा। गड्ढे में पीतल का एक छोटा डिब्बा था, और उसके ऊपर एक लिफ़ाफ़ा — बिना नाम का।

मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया। उसे खोला। अंदर एक काग़ज़ था, जिस पर बूढ़े हाथों की लिखाई थी —

"जो इसे पढ़े, वह जान ले कि पहला नाम यहाँ नहीं है। पहला नाम तीन हिस्सों में बाँटा गया है। दो हिस्से मिट्टी में, एक हिस्सा हवा में। और जो तीनों को जोड़ेगा, वह रजिस्टर का मालिक नहीं बनेगा — वह रजिस्टर को ख़त्म करेगा।"

मैंने डिब्बा खोला। उसमें एक पीतल की गोली थी, जिस पर खुदा था — "सिंह।"

तीसरा हिस्सा। "नाम सिंह" का "सिंह"।

मैंने गोली जेब में रखी और भैरों की तरफ़ देखा। "तीसरा हिस्सा मिल गया। पर पहला हिस्सा मनोहर के पास है। और दूसरा हिस्सा — वह पीतल की गोली जो मेरे पास थी, 'बाबू' — वह रिया के पास है।"

"तो अब तीनों जोड़ने हैं?"

"हाँ। पर पहले उस ताले को खोलना है। और मनोहर को ढूँढ़ना है।"

मैं सीढ़ियों से ऊपर लौटी। रिया अब भी खिड़की के पास खड़ी थी। उसने मुझे देखा और रजिस्टर उठाया।

"माँ, रजिस्टर ने कुछ नया लिखा है।"

मैंने रजिस्टर देखा। पहले पन्ने पर, तीन तारीख़ों के नीचे, एक नई लाइन उभर रही थी। धीरे-धीरे, शब्द दर शब्द —

"जो ताले को तोड़ेगा, वह अपना नाम देगा।"

मैंने रिया की तरफ़ देखा। उसने रजिस्टर अपनी छाती से लगा लिया।

"माँ, यह मुझसे कह रहा है।"

"नहीं।" मैंने उसके हाथ से रजिस्टर लिया। "यह मुझसे कह रहा है। और मैं अपना नाम नहीं दूँगी। मैं इसे तोड़ूँगी।"

तभी नीचे से सुधा की आवाज़ आई। "मीरा, नीचे आ। चौकीदार कुछ कह रहा है।"

मैं नीचे भागी। चौकीदार दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ में लाठी, चेहरा घबराया हुआ।

"मैडम, कब्रिस्तान से आया हूँ। वहाँ एक क़ब्र खोदी गई है। सुशीला की क़ब्र।"

"क्या?"

"और उसके नीचे से एक और डिब्बा निकाला गया है। वह डिब्बा अब खाली है।"

मैंने काजल की तरफ़ देखा। वह दहलीज़ पर खड़ी थी, और उसके हाथ काँप रहे थे।

"मनोहर," उसने कहा। "उसने सुशीला की क़ब्र खोदी है। वह पहला हिस्सा नहीं, पूरा नाम ढूँढ़ रहा है।"

मैंने चौकीदार से पूछा, "डिब्बे में कुछ था?"

"नहीं। सिर्फ़ एक काग़ज़।" उसने जेब से मुड़ा काग़ज़ निकाला। "इस पर लिखा है — 'अब मैं तुम्हारे पास आ रहा हूँ, मीरा जोशी।'"

मैंने काग़ज़ पढ़ा। स्याही गीली थी। और उस पर मनोहर की लिखाई थी।

मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा। "ठीक है। तो अब वह आ रहा है। हमें तैयार रहना है।"

"तैयार कैसे?" काजल ने पूछा।

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तू मुझे बता। तू उसकी मालकिन थी। तू जानती है कि वह कहाँ छुपेगा।"

काजल ने आँखें नीची कर लीं। "वह हवेली में छुपेगा नहीं। वह उस जगह छुपेगा जहाँ कोई नहीं ढूँढ़ता।"

"कहाँ?"

"अस्पताल। तीसरी मंज़िल का पुराना स्टोर। वहीं जहाँ से तुम्हें वह पीली फाइल मिली थी।"

मैंने भैरों की तरफ़ देखा। "गाड़ी निकाल।"

"मैडम, रिया?"

"रिया यहीं रहेगी। सुधा के साथ।" मैंने रिया की तरफ़ देखा, जो सीढ़ियों पर खड़ी सब सुन रही थी। "रिया, तू हवेली में रह। और रजिस्टर किसी को मत देना — न मनोहर को, न काजल को, न किसी को।"

"माँ, तू अकेली जा रही है?"

"नहीं। भैरों साथ है। और सुनीता भी।" मैंने सुनीता की तरफ़ देखा। "तू चलेगी?"

सुनीता ने सिर हिलाया। "चलूँगी। मेरा नाम लौटा है, अब मैं किसी से नहीं डरती।"

मैंने रिया के सिर पर हाथ रखा। "सुन, अगर मैं देर से आऊँ, तो तू रजिस्टर का आख़िरी पन्ना देखना। अगर उस पर मेरा नाम उभरे, तो समझ जाना कि मैं फँस गई हूँ।"

"माँ—"

"और अगर मेरा नाम उभरे, तो तू मेरा नाम, मेरी गली, और मेरी आवाज़ — तीनों बोलना। मैं लौट आऊँगी।"

रिया ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ मज़बूत थी। "माँ, मैं तुझे नहीं खोना चाहती।"

"तू मुझे नहीं खोएगी।" मैंने उसका हाथ खोला और सीढ़ियों से नीचे उतरी।

गाड़ी में बैठते वक़्त मैंने एक बार पीछे मुड़कर देखा। हवेली की खिड़की बंद हो चुकी थी। रिया उसके पीछे खड़ी थी, रजिस्टर उसकी छाती से लगा हुआ।

मैंने इंजन चालू किया। गाड़ी पुराने बाज़ार की सड़क की तरफ़ बढ़ी। सुनीता पीछे बैठी थी, भैरों बगल में।

रास्ते में सुनीता ने कहा, "मीरा, एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

"तू यह सब क्यों कर रही है? तेरा नाम भी तो रजिस्टर में है। तू भी भूल सकती है।"

मैंने सड़क देखी। "क्योंकि मेरी बेटी ने मुझसे पूछा था कि अगर मेरा नाम उठ गया, तो वह मुझे कैसे याद रखेगी। मैं उसे यह जवाब नहीं देना चाहती कि वह मुझे भूल जाए।"

सुनीता कुछ नहीं बोली।

अस्पताल का गेट आया। मैंने गाड़ी रोकी। तीसरी मंज़िल की खिड़कियाँ अँधेरी थीं। पर एक खिड़की में हल्की पीली बत्ती जल रही थी।

"वहाँ," भैरों ने कहा। "वही स्टोर है।"

मैंने गाड़ी से उतरकर अस्पताल की तरफ़ देखा। सामने इमरजेंसी वार्ड की बत्तियाँ जल रही थीं। पर तीसरी मंज़िल पर वह पीली बत्ती जल-बुझ रही थी, जैसे कोई उसे हिला रहा हो।

"चल," मैंने कहा। "पर एक बात याद रखना — अंदर जाकर मनोहर से सीधे नहीं लड़ना। पहले देखना कि वह क्या कर रहा है।"

भैरों ने सिर हिलाया। हम तीनों अस्पताल की सीढ़ियों की तरफ़ बढ़े। पीछे, हवेली की तरफ़, आसमान में बादल घिर रहे थे।

और मुझे तब नहीं पता था कि उस रात अस्पताल की तीसरी मंज़िल पर सिर्फ़ मनोहर नहीं था। वहाँ कोई और भी था — कोई जिसका नाम किसी रजिस्टर में नहीं था, और जो चालीस साल से उसी स्टोर में बंद था।

॥

अस्पताल की सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त भैरों ने मेरा हाथ पकड़कर रोका।

“एक बात,” उसने धीमे से कहा। “मनोहर अंदर हो, तो सीधे मत जाना। वह डरता है, पर डरकर भी चाकू चलाता है।”

“तो क्या करना है?”

“मैं आगे जाऊँगा। तू पीछे रह। और सुनीता बाहर दरवाज़े पर खड़ी रहे। अगर वह भागे, तो उसका रास्ता बंद होना चाहिए।”

सुनीता ने सिर हिलाया। “मैं दरवाज़े पर रहूँगी। मुझे भागना नहीं है, भागने देना नहीं है।”

अस्पताल की तीसरी मंज़िल तक पहुँचे तो बत्तियाँ बंद थीं। बस लिफ़्ट के पास एक बत्ती जल रही थी जो हर दो सेकंड में झपकती थी। रिकॉर्ड रूम का दरवाज़ा सीढ़ियों से बाईं तरफ़ था। मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा — ताला बाहर से नहीं था, पर कुंडी पर जंग जमी थी।

“यह तो खुला ही है,” मैंने कहा।

भैरों ने दरवाज़े को धक्का दिया। दरवाज़ा चरमराकर खुला। अंदर की हवा बाहर निकली — फाइलों की, गीले काग़ज़ की, और उसके साथ वही स्याही की महक, थोड़ी मीठी, थोड़ी फँसी हुई।

“यह महक,” सुनीता ने पीछे से कहा।

“मुझे पता है,” मैंने कहा।

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