A Dark Secret – Chapter 382
मैंने ब्रेक मारे। काजल गाड़ी के सामने आकर खड़ी हो गई, हाथ फैला कर। मैंने खिड़की नीचे की।
"काजल, हट।"
"मीरा, रुक।" उसकी आवाज़ टूट रही थी। उसका चेहरा वैसा नहीं था जैसा दो घंटे पहले हवेली में था। वह थकी हुई थी, और वह खुद उसे जानती थी। "मैं अंदर नहीं आ सकती।"
"क्यों?"
"क्योंकि मेरा नाम अब 'क' रह गया है। और अगर मैं हवेली की दहलीज़ पर पैर रखूँगी, तो रजिस्टर मुझे पूरा खा जाएगा। मैं दहलीज़ के बाहर ही रहूँगी — पर मैं कुछ जानती हूँ जो तुम्हारे काम आएगा।"
"क्या?"
"मनोहर। उसने मुझसे कहा था कि रजिस्टर का पहला पन्ना ख़ुद खुलेगा, और उस दिन… उस दिन किसी को रखवाला बनना पड़ेगा। सच में बनना। मैंने उसे इसीलिए तहखाने की चाबी दी थी। उसने कहा था कि वह रजिस्टर को ठीक करेगा। पर…"
"पर वह ताला लगा गया।"
काजल ने आँखें बंद कर लीं। "हाँ।"
भैरों पीछे से आया। उसके कपड़ों पर धूल थी, जैसे वह दौड़कर आया हो। "मैडम, हवेली की पहली मंज़िल की खिड़की खुली है। और अंदर टेप चल रहा है। वही पुरानी आवाज़।"
"कौन सी आवाज़?"
"बाबू हरनाम की। लगातार एक ही लाइन — 'पहला नाम, पहला नाम, पहला नाम।'"
मैंने गाड़ी से नीचे देखा। काजल अब भी सामने खड़ी थी।
"काजल, तू बाहर रुक। भैरों, तू मेरे साथ।" मैंने इंजन बंद किया और उतरने लगी, तभी काजल ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"एक बात सुन। मनोहर के पास जो पहला हिस्सा है — 'बाबू हर' — वह उसने छुपाया नहीं है। वह उसे बेचने की कोशिश कर रहा है। किसी ऐसे आदमी को जो हवेली खरीदना चाहता है।"
"कौन?"
"मुझे नाम नहीं पता। पर वह कल मेरे दफ़्तर आया था। काला कोट, चश्मा। उसने कहा था कि वह हवेली और उसका पूरा का पूरा पुराना सौदा एक साथ खरीदेगा।"
मैंने उसका हाथ खींचकर छुड़ाया। "तू यह सब पहले क्यों नहीं बोली?"
"क्योंकि मेरा नाम जा रहा है, मीरा। और जब नाम जाता है, तो याद भी जाती है। मुझे अभी-अभी याद आया।"
मैं गाड़ी से उतरकर हवेली की तरफ़ बढ़ी। भैरों पीछे था। पर मैंने तीन कदम चलकर देखा कि सुनीता गाड़ी के पीछे से निकलकर मेरे पास आ रही है, हाथ में कुछ काग़ज़ लिए।
"मीरा, रुक।"
"सुनीता, अभी वक़्त नहीं—"
"सुन ले।" उसने मेरे सामने काग़ज़ फैला दिए। "ये मेरे घर के काग़ज़ हैं। शालिनी के दाखिले के लिए चाहिए। पर इन पर मेरा नाम नहीं है। सिर्फ़ पिता का नाम है, और माँ के खाने में खाली लकीर। स्कूल वालों ने कहा कि बच्ची की माँ का नाम चाहिए, वरना दाखिला रुक जाएगा।"
मैंने काग़ज़ देखे। सच में, माँ के नाम की जगह खाली थी। जैसे किसी ने मिटा दिया हो।
"मैं चालीस साल से ज़िंदा हूँ," सुनीता ने कहा, "और मेरे ही काग़ज़ में मेरा नाम नहीं है। मेरी बेटी को स्कूल में यह साबित करना पड़ेगा कि मैं उसकी माँ हूँ। तू समझ रही है? नाम सिर्फ़ काग़ज़ का टुकड़ा नहीं है। नाम के बिना आदमी को कोई ढूँढ नहीं सकता — न स्कूल, न अस्पताल, न पुलिस। मैं ज़िंदा हूँ, पर काग़ज़ों में नहीं हूँ।"
मैंने वह काग़ज़ उसे वापस दिया। "तेरा नाम लौट आया है, सुनीता। अब इसे लिखवा। किसी भी दफ़्तर में जाकर। कहना कि नाम ग़लती से छूट गया था।"
"क्या वे मानेंगे?"
"हाँ। क्योंकि अब तेरे नाम की महक काग़ज़ों तक पहुँच रही है।"
वह रो पड़ी। मैंने उसका कंधा थामा और हवेली की तरफ़ बढ़ी।
हवेली का दरवाज़ा खुला था। अंदर से वही आवाज़ आ रही थी — बूढ़ी, भारी, हर शब्द पर ज़ोर देती हुई। "पहला नाम, पहला नाम, पहला नाम।"
भैरों आगे बढ़ा और अंदर गया। मैंने उसे रोकना चाहा, पर वह पहले ही अंदर था।
मैं दरवाज़े पर खड़ी रही। दो सेकंड बाद टेप बंद हो गया। सन्नाटा छा गया।
भैरों लौटा। उसके हाथ में एक पुराना टेप रिकॉर्डर था। "मैडम, यह पहली मंज़िल के कमरे में रखा था। और तहखाने का दरवाज़ा…"
"क्या?"
"बंद है। और उस पर ताज़ा ताला लगा है।"
मैंने काजल की तरफ़ देखा, जो दरवाज़े के बाहर खड़ी थी, दहलीज़ पर पैर न रखते हुए। उसका चेहरा पीला पड़ गया।
"ताले की चाबी किसके पास है?" मैंने पूछा।
काजल ने होंठ हिलाए, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उसने धीरे से कहा, "इस ताले की चाबी मेरे पास थी। मनोहर ने मुझे धोखा दिया।"
मैं तहखाने की तरफ़ बढ़ी। सीढ़ियाँ नीचे जाती थीं। दरवाज़े पर लोहे का बड़ा ताला लगा था — एकदम नया, चमकता हुआ। उस पर स्याही की बूँदें लगी थीं।
मैंने ताला छुआ। ठंडा था। बहुत ठंडा, जैसे हवा में रखा हो।
"मनोहर ने यह ताला बाहर से लगाया है," भैरों ने कहा। "अंदर से कोई नहीं जा सकता।"
"रिया कहाँ है?"
"ऊपर। पहली मंज़िल पर। सुधा उसके साथ है।"
मैं सीढ़ियाँ चढ़ी। रिया कमरे के बीच में खड़ी थी, रजिस्टर उसके हाथ में। खिड़की अब भी खुली थी, पर हवा नहीं चल रही थी। सुधा खिड़की के पास खड़ी थी, हाथ से उसे धकेलने की कोशिश कर रही थी, पर खिड़की हिल भी नहीं रही थी।
"सुधा, हट जा," मैंने कहा। "खिड़की बंद नहीं होगी। वह खुलना चाहती है।"
रिया मेरी तरफ़ मुड़ी। उसकी आँखें सूखी थीं। "माँ, तूने कहा था कि अगर तेरा नाम उठ जाए, तो मैं तुझे याद रखूँगी। पर अगर मेरा नाम उठ गया, तो कौन मुझे याद रखेगा?"
मैं उसके पास गई। "मैं। और तेरी माँ का नाम सिर्फ़ मैं नहीं, पूरा शहर याद रखेगा जब हम यह सौदा तोड़ेंगे।"
तभी सुधा ने कहा, "मीरा, नीचे आ। ताले में कुछ है।"
मैं नीचे भागी। सुधा तहखाने के दरवाज़े के पास खड़ी थी, ताले को देख रही थी।
"देख," उसने कहा। "ताले के नीचे कुछ लिखा है।"
मैंने झुककर देखा। ताले के नीचे, लोहे पर, ताज़ी स्याही से छोटे अक्षरों में लिखा था — "नींव का पत्थर। कोने में। स्याही का घड़ा।"
"नींव का पत्थर?" मैंने कहा।
भैरों आगे आया। "मैडम, हवेली की नींव का पत्थर तहखाने के कोने में है। वहीं जहाँ स्याही का घड़ा फूटा था। मुझे बचपन में दादी बताती थी।"
"तो तहखाने में जाना पड़ेगा।"
"पर दरवाज़ा बंद है।"
मैंने काजल की तरफ़ देखा। वह अब भी दहलीज़ पर खड़ी थी, हाथ बाँधे, जैसे कोई माफ़ी माँग रही हो।
"काजल, ताले की दूसरी चाबी?"
"नहीं है। मनोहर ने बदल दिया।"
"तो कैसे खुलेगा?"
काजल ने कुछ सोचा। फिर बोली, "तहखाने की दीवार पर एक और दरवाज़ा है। पीछे की तरफ़। वह कुएँ की सीढ़ियों से जुड़ता है।"
"कुएँ की सीढ़ियाँ? जो हवेली के पीछे हैं?"
"हाँ। वहाँ से नीचे उतरकर तहखाने में पहुँचा जा सकता है। पर वह रास्ता अब बंद है। मेरे दादा ने उसे ईंटों से चिनवा दिया था।"
"तो ईंटें तोड़नी पड़ेंगी।"
भैरों ने कहा, "मैडम, मेरे पास गाड़ी में एक हथौड़ा है।"
"ले आ।"
वह भागा। मैंने रिया की तरफ़ देखा। वह ऊपर से नीचे झाँक रही थी।
"रिया, तू ऊपर रह। सुधा, तू भी।"
"माँ, मैं साथ चलूँगी।"
"नहीं। तू रजिस्टर संभाल। अगर वह कुछ लिखे, तो मुझे बताना।"
रिया ने सिर हिलाया। मैंने उसे देखा — वह डर नहीं रही थी। वह गुस्से में थी। और वह गुस्सा मेरे काम आएगा।
मैं हवेली के पीछे पहुँची। कुएँ की सीढ़ियाँ वैसे ही थीं जैसे सुधा ने बताई थीं — पत्थर की, ऊपर से नीचे जाती हुईं, और बीच में ईंटों की दीवार। भैरों हथौड़ा लेकर आया।
"मैडम, मैं तोड़ता हूँ।"
"नहीं, मैं तोड़ूँगी।" मैंने हथौड़ा उससे लिया। "तू पीछे रह। अगर कुछ हो, तो रिया को लेकर भाग जाना।"
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