A Dark Secret – Chapter 381
“यह मेरे लिए है,” मैंने कहा।
“हाँ,” सुधा ने कहा। “और यह तारीख़ — देख, यह वही दिन है जिस दिन रिया का जन्म हुआ था। तेरी माँ ने इसे यहाँ रखते वक़्त जान लिया था कि रिया भी इस सौदे में आएगी।”
रिया ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें चमक रही थीं, पर उसने कुछ नहीं कहा।
तभी ऊपर से चौकीदार की आवाज़ आई। “मीरा! जल्दी ऊपर आ!”
मैंने डिब्बा और गोली जेब में डाली और सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आई। आँगन में सब जमा थे। चौकीदार आँगन की दीवार की तरफ़ इशारा कर रहा था।
वहाँ एक शब्द उभर रहा था, गीली स्याही से, बड़े अक्षरों में। शब्द था — “देर।”
“यह क्या है?” रिया ने कहा।
“यह रजिस्टर का जवाब है,” सुधा ने कहा। “वह कह रहा है कि हम देर कर रहे हैं। कुछ होने वाला है।”
“कुछ क्या?” मैंने पूछा।
तभी मेरा मोबाइल बजा। नंबर अजीब था। मैंने उठाया।
“मीरा जोशी?” आवाज़ किसी औरत की थी, पर वह डर से काँप रही थी। “मैं अस्पताल से बोल रही हूँ। आपकी गाड़ी की ड्यूटी है, बत्तीस नंबर पर। मरीज़ की हालत ख़राब है।”
“मैं ड्यूटी पर नहीं हूँ,” मैंने कहा। “मेरी छुट्टी है।”
“पर सिस्टर, आपका नाम रजिस्टर में है। आज रात की ड्यूटी में। किसी ने आपका नाम लिख दिया है।”
मैंने फोन काट दिया और सुधा की तरफ़ देखा। “रजिस्टर मुझे अस्पताल बुला रहा है। वह मुझसे कह रहा है कि अगर मैं नहीं गई, तो कोई और नाम उठा लिया जाएगा।”
“तो जाओ,” काजल ने कहा। “जाओ और अपना नाम वहाँ लिखवाओ।”
“नहीं,” सुधा ने कहा। “वह जाल है। वह चाहता है कि तू वहाँ जाए, ताकि तू हवेली से दूर हो जाए।”
“तो क्या करें?” सुनीता ने कहा। “मरीज़ की जान का सवाल है। मीरा, तू डॉक्टर है, तू जानती है — तू अगर नहीं गई, तो किसी की जान जा सकती है।”
मैं खड़ी रही। मेरे अंदर एक आवाज़ थी जो कह रही थी — तू एम्बुलेंस ड्राइवर है, तेरा काम है। और दूसरी आवाज़ कह रही थी — यह जाल है।
तभी रिया ने कहा, “माँ, तू चली जा। मैं यहाँ रहूँगी। मैं रखवाला हूँ, मैं रजिस्टर संभाल सकती हूँ।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। “नहीं।”
“माँ, तूने खुद कहा था कि मैं बोझ नहीं हूँ। तो मुझे फ़ैसला लेने दे।”
मैंने उसे देखा। बारह साल की बच्ची, जिसकी आँखों में वह ज़िद थी जो मेरी माँ की आँखों में थी। मैंने कुछ कहना चाहा, पर मेरी आवाज़ नहीं निकली।
तभी भैरों आगे आया। “मैं रिया के साथ रहूँगा। हवेली के बाहर। अगर कुछ हो, तो मैं अंदर आ जाऊँगा।”
सुधा ने कहा, “मैं भी रहूँगी।”
मैंने सबको देखा। सुनीता, शालिनी, चौकीदार, भैरों, सुधा, काजल। और रिया।
“ठीक है,” मैंने कहा। “पर रिया, तू रजिस्टर का एक पन्ना ज़रूर पलटना — देखना कि मनोहर उसे लौटाने आया है या नहीं। और अगर वह कुछ भी लिखे, तो मुझे फोन करना।”
“ठीक है,” रिया ने कहा।
मैंने डिब्बा और गोली उसे दी। “यह तेरे पास रहेगा।”
मैंने एम्बुलेंस की तरफ़ बढ़कर कदम बढ़ाए, पर तभी रिया ने मेरा हाथ पकड़ा।
“माँ,” उसने कहा। “अगर तू जाएगी और तेरा नाम उठ गया, तो मैं तुझे कैसे याद रखूँगी?”
मैंने उसके सामने घुटने टेके और उसकी आँखों में देखा। “तू मेरा नाम, मेरी गली, और मेरी आवाज़ — तीनों याद रखना। और जब मैं लौटूँ, तो मुझे बोलना। मैं तुझे पहचान लूँगी।”
रिया ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में पानी था, पर उसने पोंछा नहीं।
मैं एम्बुलेंस में बैठी। इंजन चालू किया। गाड़ी हवेली की गली से निकली और पुराने बाज़ार की सड़क की तरफ़ बढ़ी। पीछे हवेली की बत्तियाँ मंद पड़ गईं।
मैंने डैशबोर्ड पर रखी रिया की तस्वीर देखी। वह वैसे ही चिपकी थी, जैसे छोड़ी थी। पर जब मैंने गाड़ी पुराने बाज़ार की पहली गली से मोड़ी, तो वह तस्वीर अपने आप उलट गई, जैसे किसी ने उँगली से पलट दी हो।
मैंने गाड़ी रोकी। मैंने तस्वीर उठाई। उसके पीछे, जहाँ मैंने कभी कुछ नहीं लिखा था, वहाँ किसी की लिखाई थी — छोटे, तिरछे अक्षरों में।
“तेरा नंबर आ गया, रिया।”
मेरे हाथ से तस्वीर छूट गई। वह डैशबोर्ड पर गिरी और फिर से पलटकर सीधी हो गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
फोन बजा। रिया का नाम स्क्रीन पर चमका।
“माँ,” रिया की आवाज़ आई, जो डर से भरी थी। “माँ, रजिस्टर का पहला पन्ना अपने आप खुल गया है। और उस पर लिखा है — ‘जो अब तक चुका है, वह अब भुगतान माँगता है।’ और उसके नीचे तीन तारीख़ें हैं। तीसरी तारीख़ आज है।”
मैंने एम्बुलेंस रोकी और पीछे मुड़कर हवेली की तरफ़ देखा। वह गली अब अँधेरे में डूब चुकी थी, और उस अँधेरे में एक छोटी बत्ती जल रही थी — हवेली की पहली मंज़िल की खिड़की पर, वहीं जहाँ रिया खड़ी थी।
मैंने फोन से कहा, “रिया, खिड़की बंद कर। अभी।”
“पर माँ—”
“अभी, रिया। वह बत्ती तेरी नहीं है।”
फोन में सन्नाटा आया। फिर रिया की आवाज़ आई, बहुत धीमी — “माँ, मैंने खिड़की नहीं खोली। वह मेरी तरफ़ से ख़ुद खुल रही है।”
॥
मैंने एम्बुलेंस को वहीं रोक दिया, पुराने बाज़ार की गली के मोड़ पर, जहाँ से हवेली की छत दिखती थी। फोन कान से लगा था और रिया की साँसें सुनाई दे रही थीं।
"रिया, खिड़की से दूर हट। अभी।"
"माँ, वह खुल रही है। धीरे-धीरे। जैसे कोई अंदर से धक्का दे रहा हो।"
"तू पीछे हट, सुधा के पास जा। और फोन मत काट।"
मैंने गाड़ी से उतरकर डैशबोर्ड पर पड़ी तस्वीर उठाई। उसे पलटकर देखा। वही तिरछे अक्षर — "तेरा नंबर आ गया, रिया।" मैंने उसे करीब लाकर देखा। स्याही अभी गीली थी। मेरी उँगली पर लग गई। मैंने सूँघा — वही फँसी हुई मीठी महक।
"रिया, सुन। तेरे पास रजिस्टर है?"
"हाँ।"
"उसका पहला पन्ना देख। बताया था तीन तारीख़ें हैं। पहली दो कौन सी हैं?"
काग़ज़ खिसकने की आवाज़ आई। फिर रिया बोली, "पहली — नौ अप्रैल, दो हज़ार उन्नीस। दूसरी — सत्ताईस जनवरी, दो हज़ार उन्नीस। तीसरी — आज।"
नौ अप्रैल, दो हज़ार उन्नीस। सत्ताईस जनवरी, दो हज़ार उन्नीस। ये तारीख़ें मुझे कहीं मिली थीं। कहाँ? मेरी नोटबुक में। वही नोटबुक जिसमें आठ नाम पूरे हो चुके थे। जिन नामों के आगे यही तारीख़ें लिखी थीं।
"रिया, तू नोटबुक में देख। जो नाम इन तारीख़ों के आगे लिखे हैं, वे बोल।"
फिर काग़ज़ खिसका। "माँ, नौ अप्रैल के आगे लिखा है — रीना नायक। और सत्ताईस जनवरी के आगे… पर माँ, यहाँ तो कुछ भी नहीं लिखा। पूरा खाली है।"
"खाली?"
"हाँ। सिर्फ़ तारीख़ है। नाम नहीं।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। मतलब सत्ताईस जनवरी वाला नाम अभी उठाया नहीं गया। वह अभी रजिस्टर में कहीं है। बस नोटबुक में नहीं।
"सुधा कहाँ है? फोन सुधा को दे।"
कुछ सेकंड बाद सुधा की आवाज़ आई। "बोल।"
"सुधा, अगर रजिस्टर का पहला पन्ना अपने आप खुल रहा है, तो इसका मतलब क्या है?"
"मतलब यह कि रजिस्टर को रखवाले से कुछ चाहिए। और वह डराकर लेना चाहता है।"
"क्या चाहिए?"
"पता नहीं। पर वह रिया से कुछ करवाना चाहता है। तू जल्दी आ। और सुन — अगर खिड़की खुल रही है, तो उस कमरे में कोई और है जिसे रजिस्टर ने बुलाया है। वह मनोहर हो सकता है, और कोई भी।"
मैंने फोन जेब में रखा। इंजन चालू किया। गाड़ी पलटकर हवेली की गली की तरफ़ मोड़ी। तीन मिनट में वहाँ पहुँचनी थी।
पर मैं जैसे ही उस गली के मुँह पर पहुँची, मेरी गाड़ी रोकनी पड़ी। सामने काजल खड़ी थी।
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