A Dark Secret380 / 536

A Dark Secret – Chapter 380

6 min read November 6, 2026

“मुझे पता है,” काजल ने कहा, पर उसकी आवाज़ में वह भरोसा नहीं था।

एम्बुलेंस में सब चढ़े। रिया पीछे बैठी, शालिनी के पास। सुनीता ड्राइवर के पीछे वाली सीट पर। सुधा और काजल पीछे, एक-दूसरे के सामने। चौकीदार ने अपनी लाठी खिड़की से अंदर डाल ली, जैसे वह भी कुछ पकड़कर रखना चाहता हो। भैरों कहीं दिखा नहीं — कब्रिस्तान के पीछे की गली में खड़ा था, गाड़ी की बत्ती से दूर, और मैंने उसकी तरफ़ देखा, पर वह नहीं हिला।

मैंने गाड़ी स्टार्ट की। इंजन दो बार काँपा, फिर चालू हुआ। मैंने गियर डाला और कब्रिस्तान की उस टूटी सड़क से गाड़ी निकाली, जो पुराने बाज़ार की तरफ़ जाती है।

पीछे से काजल ने कहा, “रास्ता छोड़ दे। पुराने बाज़ार से होकर जाना है। बड़ी सड़क बंद होगी, वहाँ रात को मरम्मत चलती है।”

“तूने रास्ता याद रखा?” सुधा ने पूछा।

“कुछ चीज़ें अभी याद हैं,” काजल ने कहा। “अभी।”

मैंने गाड़ी मोड़ी और टूटी सड़क से गाड़ी उछलती हुई आगे बढ़ी। रिया की तस्वीर डैशबोर्ड पर चिपकी थी, वही पुरानी तस्वीर, जिसमें वह सात साल की है और मुस्कुरा रही है। मैंने उसे देखकर मन में कहा कि तू ठीक है। बस ठीक है।

पीछे सुधा ने कहा, “मीरा, मुझे तुझे एक बात बतानी है। वह काग़ज़, जो तेरी माँ ने संदूक में रखा था, वह भी अधूरा है। उसमें तीसरा हिस्सा नहीं है।”

“क्या मतलब?”

“मैंने चालीस साल पहले उसे तीन हिस्सों में तोड़ते देखा था। पहला हिस्सा काग़ज़ पर, दूसरा मिट्टी में, तीसरा हवेली के अंदर से निकला और तेरी माँ ने अपने पास रख लिया। पर सुशीला ने वह तीसरा हिस्सा हमेशा के लिए सुरक्षित रखने के लिए एक और चीज़ बनाई थी।”

“कौन सी चीज़?”

“एक टीन का डिब्बा। तारपीन का। वह हवेली के उस कमरे में है जहाँ कोई नहीं जाता। उस कमरे में जो सीढ़ियों से नीचे जाता है, पर उसके दरवाज़े पर ताला नहीं है। तेरी माँ ने वह डिब्बा वहाँ रखा था, और उसके ऊपर कुछ और रख दिया था — चिट्ठियाँ, कपड़े।”

“तो हमें पहले वह डिब्बा चाहिए,” मैंने कहा। “नींव के पत्थर से पहले?”

“नहीं,” काजल ने पीछे से कहा। “पहले नींव का पत्थर। उसके नीचे वह जगह है जहाँ असली रजिस्टर का पहला पन्ना दबा है। मैंने उसे चालीस साल पहले देखा था, अपने दादा के साथ। उस पहले पन्ने पर सिर्फ़ एक नाम है — दादा का पहला नाम। अगर हम उसे उठा लें, तो बाक़ी सब हिल जाएगा।”

“लेकिन मनोहर ने डिब्बा चुरा लिया,” रिया ने कहा। “उसमें जो था, वह निकल गया।”

“उसने पहला हिस्सा चुराया,” सुधा ने कहा। “पर वह पहला हिस्सा तीन में से एक था। अगर उसने उसे मिला दिया तो?”

“तो वह पूरा नाम बोल सकता है,” मैंने कहा। “और वह क्या करेगा?”

“वह काजल के हाथ में रजिस्टर पहुँचाना चाहता है,” सुधा ने कहा। “वह चाहता है कि रखवाला उसे मिल जाए, ताकि वह काजल के लिए उसे इस्तेमाल करे। मनोहर चालीस साल से काजल के पीछे-पीछे चल रहा है। वह काजल के बिना कुछ नहीं है။”

काजल ने कुछ नहीं कहा।

तभी मेरी नज़र सड़क के किनारे पर पड़ी। एक बत्ती जल रही थी — पीली, हिलती हुई। मैंने गाड़ी धीमी की। वह चाय का ठेला था, हवेली की गली के मोड़ पर, जिसके बारे में भैरों ने कभी बताया था कि वह बीस साल से वहीं लगता है और कभी हवेली के अंदर नहीं गया।

ठेले वाला बैठा था, पर चाय नहीं बना रहा था। वह अपनी केतली को पोंछ रहा था, बिना किसी जल्दी के। मैंने गाड़ी रोकी और खिड़की से सिर निकाला।

“भाई, हवेली का गेट खुला है?”

उसने पोंछना बंद किया और मेरी तरफ़ देखा। “आज खुला है। कल भी खुला था। तीन दिन से खुला है।”

“कोई अंदर गया?”

“बहुत लोग गए,” उसने कहा। “पर बाहर कोई नहीं आया।”

“मतलब?”

उसने केतली रखी और गाड़ी की बत्ती में अपनी आँखें सिकोड़कर देखा। “मतलब जो अंदर गया, वह बाहर नहीं आया। तीन दिन में कोई नहीं। हाँ, एक बूढ़ा आया था, आज सुबह — चड्ढा जी के साथ कोई आदमी था, सफ़ेद बाल वाला, भूरी जैकेट। वह अंदर गया और फिर निकला, अपना सिर पकड़े हुए। मैंने पूछा कि क्या हुआ, तो उसने कहा, ‘मेरा नाम क्या है?’”

मेरा हाथ स्टेयरिंग पर जम गया। “वह कहाँ गया?”

“वह बस अड्डे की तरफ़ चला गया।”

मैंने पीछे मुड़कर सुधा को देखा। सुधा का चेहरा सख़्त हो गया था। “रामदीन,” उसने कहा। “वह हवेली में गया था, अकेले।”

“हमें पहले उसे ढूँढ़ना होगा,” रिया ने कहा।

“नहीं,” मैंने कहा। “हमें पहले नींव का पत्थर चाहिए। अगर रामदीन अपना नाम खो रहा है, तो वह भी उसी रजिस्टर की वजह से है। और अगर हम पहला पन्ना उठा लें, तो शायद उसका नाम भी लौट आए।”

मैंने गाड़ी आगे बढ़ाई। हवेली की गली में घुसते ही पता चल गया कि चाय वाला सच कह रहा था। गेट खुला था। दरवाज़े की दोनों पल्ले अंदर की तरफ़ खुली थीं, और उन पर धूल जमी थी, जैसे कोई उन्हें छूकर गया हो।

मैंने गाड़ी हवेली के सामने रोकी। सब उतरे। सुनीता ने शालिनी को अपने पीछे खड़ा किया। चौकीदार लाठी टेकते हुए आगे बढ़ा। भैरों कहीं से निकलकर हमारे पीछे आ गया था, पर उसका चेहरा वैसा ही था जैसे कुछ न हुआ हो।

हम अंदर गए। पहला कमरा वही था, पर तस्वीरें बदल गई थीं। तीन पीढ़ियों की तस्वीरें नहीं थीं — सिर्फ़ एक तस्वीर टँगी थी, बाबू हरनाम की, और वह भी टेढ़ी लटक रही थी।

“यह अभी बदला है,” सुधा ने कहा। “मैंने इन तस्वीरों को चालीस साल में कभी नहीं बदलते देखा।”

“मतलब रजिस्टर कोई और चीज़ बदल रहा है,” मैंने कहा। “तस्वीरें भी नाम हैं, किसी की पहचान हैं।”

हम कमरे से निकले और पीछे की तरफ़ बढ़े। आँगन पार करके वह कुआँ आया, जिसकी सीढ़ियाँ नीचे जाती थीं। काजल आगे बढ़ी।

“तीसरी सीढ़ी,” उसने कहा। “बाईं तरफ़।”

मैं उसके पीछे-पीछे नीचे उतरी। सीढ़ियाँ उसी तरह थीं — पत्थर की, ठंडी, ऊपर से नीचे तक। पहली, दूसरी, तीसरी। मैंने बाईं तरफ़ हाथ बढ़ाया। वहाँ पत्थर की दीवार पर एक हिस्सा अलग दिख रहा था, जैसे उसे काटकर रखा गया हो। मैंने उसे धक्का दिया। वह हिल गया।

“यह ईंट है,” मैंने कहा। “खुल रही है।”

“खींच,” काजल ने कहा।

मैंने ईंट बाहर निकाली। उसके पीछे एक गड्ढा था, और उस गड्ढे में कुछ लिपटा हुआ रखा था। मैंने उसे बाहर निकाला — एक छोटा पीतल का डिब्बा, बहुत पुराना, जिस पर हरी परत चढ़ी थी।

“यह वही डिब्बा है,” सुधा ने सीढ़ियों से झाँककर कहा। “मैंने इसे अपने हाथों से रखते देखा था।”

मैंने डिब्बा खोला। अंदर एक काग़ज़ था, मुड़ा हुआ, पीला। और उसके नीचे एक और चीज़ थी — एक छोटा, चपटा, पीतल का टुकड़ा, जिस पर कुछ खुदा था।

मैंने उसे निकाला और बत्ती में देखा। उस पर एक नाम खुदा था।

“बाबू,” मैंने पढ़ा। “सिर्फ़ बाबू।”

“तो पहला हिस्सा यही है,” रिया ने कहा। “बाबू हर — काग़ज़ पर।”

“नहीं,” सुधा ने कहा। “यह दूसरा हिस्सा है। काग़ज़ वह पहला हिस्सा है जो मनोहर चुरा ले गया। यह पीतल की गोली दूसरा हिस्सा है — ‘हर’। और तीसरा — ‘नाम सिंह’ — वह अभी भी तेरी माँ के संदूक में है।”

“तो मेरे पास दो हिस्से हैं,” मैंने कहा। “एक काग़ज़ पर, एक गोली पर। और तीसरा घर में।”

मैंने उस मुड़े काग़ज़ को खोला। उस पर सुशीला की लिखाई में एक लाइन थी, और नीचे एक तारीख़। लाइन थी — “तेरा नाम अगर कभी भटके, तो इसे याद रखना।”

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