A Dark Secret379 / 536

A Dark Secret – Chapter 379

7 min read November 6, 2026

“तो चल,” मैंने कहा। “और जब तुम अपना नाम भूल जाओ, तो मैं तुम्हें तुम्हारा नाम बोलकर याद दिलाऊँगी। हम शहर को उसका नाम लौटाने जा रहे हैं, काजल। अब तुम भी उस नाम की क़तार में हो।”

॥

काजल की आवाज़ कब्रिस्तान की दीवार से टकराकर लौटी — “मैं तुम्हारे साथ चलूँगी बस।” और सुधा ने फोटो को अपनी हथेली पर रखकर देखा, जैसे कोई बहुत पुराना हिसाब जोड़ रही हो।

“रुको,” सुधा ने कहा। उसने आँखें बंद कर लीं और उसके होंठ हिलने लगे, बिना आवाज़ के। एक पल। दो पल। फिर उसने आँखें खोलीं और मेरी तरफ़ देखा।

“मीरा, मुझे कुछ याद आ रहा है। टुकड़ों में। जैसे कोई काँच टूटा हो और मैं उसे जोड़ रही हूँ।”

“बोलो,” मैंने कहा। “जो भी आ रहा है, बोलो।”

वह कब्रिस्तान की चारदीवारी की तरफ़ चलकर गई और उसने दीवार पर हाथ रखा, जैसे सहारा ले रही हो। “चालीस साल पहले, जिस रात तेरी माँ पीतल गली में आई थी, मैं हवेली के नीचे थी। मैं सोलह की थी, या सत्रह की। मुझे उस वक़्त लगता था कि मैं सौदे को समझ गई हूँ। मैंने अपनी माँ से पूछा था कि इससे बचने का रास्ता क्या है।”

“और तुम्हारी माँ ने क्या कहा?” सुनीता ने पूछा।

“मेरी माँ ने कहा था — एक नाम मिटने से पहले अगर दूसरा नाम लिख दो, तो रजिस्टर भटक जाता है। उसकी नज़र अपनी जगह से हट जाती है। कुछ पल के लिए।”

“भटक जाता है?” रिया ने कहा। “मतलब वह उलझ जाता है?”

“उलझता नहीं,” सुधा ने कहा। “वह गिनती खो देता है। जिस पन्ने पर नाम आना है, वह पन्ना हाथ से निकल जाता है। और रजिस्टर को गिनती से चिढ़ है। वह नाम गिनकर चलता है। तारीख़ें गिनकर चलता है। कुछ भी हो जाए, उसकी क़तार टूटनी नहीं चाहिए। पर अगर टूट जाए — तो वह कुछ देर के लिए रुक जाता है, सोचने लगता है।”

“कितनी देर?” मैंने पूछा।

“इतनी देर,” सुधा ने कहा, “कि एक औरत अपना नाम वापस ले सके। यही तो तेरी माँ ने किया था।”

मेरे पैर जमीन पर थे, पर लगा जैसे कुछ खिसक गया। “माँ ने तुम्हारा नाम बचाने के लिए मेरा नाम लिखवाया। यह तुमने अभी कहा।”

“हाँ। उसने मेरा नाम मिटने से पहले अपनी होने वाली बच्ची का नाम — तेरा नाम — रजिस्टर में लिखवा दिया। रजिस्टर की क़तार टूट गई। उसे लगा कि उसने मुझे बचा लिया।”

“तो फिर?” रिया ने पूछा। उसकी आवाज़ में वही सवाल था जो मेरे अंदर भी उठ रहा था। “फिर रजिस्टर ने माँ का नाम क्यों नहीं छोड़ा? माँ आख़िर तक उस सौदे में थी। माँ मरते वक़्त तक डरती रही।”

सुधा ने गहरी साँस ली। उसने फोटो जेब में रखी और अपनी दोनों हथेलियाँ आपस में रगड़ीं। “क्योंकि तेरा नाम उन खाली पन्नों में से एक पर पहले से था, रिया।”

कब्रिस्तान में कुछ देर को सिर्फ़ हवा बोली। मैंने सुधा की तरफ़ देखा। “क्या मतलब पहले से था?”

“तेरी माँ इस शहर में आई थी तब वह इस सौदे से अनजान थी। उसने यहाँ मकान खरीदा था — वही पुरानी कोठी, शहर के बीचोंबीच वाली। जिस ज़मीन पर वह घर बना है, वह ज़मीन भी हरनाम परिवार ने बेची थी। चालीस साल पहले, अपने ही हिसाब से। उस सौदे की किताब में तेरे घर का हिस्सा भी दर्ज था। उसने तेरी माँ का नाम नहीं लिखा था, क्योंकि उस वक़्त तेरी माँ अभी आई नहीं थी। जो नाम आने वाले थे, उनकी जगह खाली छोड़ी गई थी। और उन खाली पन्नों पर क़लम घूमती रहती है, ताकि जो भी उस घर में आए, उसका नाम अपने आप भर जाए।”

“अपने आप?” मेरी आवाज़ सूख रही थी।

“अपने आप। तेरी माँ ने सोचा था कि उसने अपनी बच्ची का नाम डालकर रजिस्टर को धोखा दे दिया। पर रजिस्टर ने उसी नाम को अपना गिन लिया। उसने सोचा कि तू तो पहले से उसकी सूची में थी। तेरी माँ ने जो लिखा, वह उसकी नज़र में दोहराव था। और रजिस्टर दोहराव नहीं भूलता।”

“तो माँ ने अपनी बेटी का नाम बचाने के लिए लिखवाया,” मैंने धीरे से कहा, “ और उसने मुझे उसी चीज़ में धकेल दिया जिससे बचाना चाहती थी।”

सुधा कुछ नहीं बोली। उसका चुप रहना ही जवाब था।

तभी काजल हँसी। वह हँसी कब्रिस्तान में अजीब लगी, जैसे किसी दरवाज़े की किरच। “तो यह पूरा किस्सा यही है? चालीस साल में कोई भी इस सौदे से नहीं बच पाया। तेरी माँ बचने निकली और उल्टे तुझे फँसा गई। और तू — तू भी नहीं बचेगी, मीरा। तेरी माँ ने जो किया, तू वही कर रही है। नाम, नाम, नाम। और रजिस्टर हर नाम के बदले नाम लेता है।”

मैंने उसकी तरफ़ मुड़कर देखा। उसका चेहरा वही था, पर आँखें कुछ और हो गई थीं। “काजल, तू पिछले दो घंटे से हँस क्यों रही है?”

“क्योंकि मैं अपना आधा नाम खोने वाली हूँ,” उसने कहा। “और तुझे देखकर लग रहा है कि तू भी मेरे जैसी हो जाएगी। तब भी तुझे हँसी आएगी।”

“मैं बचने नहीं आई,” मैंने कहा। “मैं तोड़ने आई हूँ। तेरा दादा भी तो यही चाहता था — तोड़ने का तरीक़ा बताया था, अपनी टेप में, इन नियमों के साथ। तूने वह टेप सुनी थी।”

“मेरे दादा ने कभी तोड़ना नहीं चाहा,” काजल ने कहा। “उसने हर पन्ने पर अपनी मुहर लगाई थी। वह बस यह सुनिश्चित करना चाहता था कि रखवाला कभी भाग न सके। टेप उसका जाल था, मीरा। तू उसमें फँस रही है।”

सुधा ने बीच में आकर कहा, “चुप। दोनों चुप।”

हम रुक गए। सुधा ने दीवार की तरफ़ देखा, जहाँ चौकीदार खड़ा था। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था और वह अपनी लाठी से कुछ इशारा कर रहा था, हाथ काँप रहा था।

मैंने पलटकर देखा।

कब्रिस्तान की उस पुरानी, घिसी हुई दीवार पर, जिस पर कुछ नाम पढ़े नहीं जाते, ताज़ी स्याही से एक नाम उभर रहा था। अक्षर अभी गीले थे, जैसे कोई अभी-अभी लिखकर गया हो। चार अक्षर। और वे मेरी माँ का नाम बना रहे थे।

सुशीला जोशी।

रिया ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया। सुनीता ने धीरे से मुँह पर हाथ रख लिया। चौकीदार ने लाठी धरती पर टिका दी, जैसे उसके पैर नहीं संभल रहे हों।

“मैंने कोई नाम नहीं बोला,” मैंने कहा। मेरी आवाज़ खुद मुझे अजीब लगी। “मैंने अभी कुछ नहीं बोला। यह कैसे हो गया?”

सुधा ने दीवार के पास जाकर स्याही को छुआ। उसकी उँगली पर काला लग गया। उसने उसे सूँघा और फिर मेरी तरफ़ मुड़ी। “रजिस्टर खुद बोल रहा है, मीरा। वह तुझे अपनी तरफ़ खींच रहा है। तेरी माँ का नाम दीवार पर लिखकर वह तुझसे कह रहा है — देख, यह नाम मेरे पास है, और यह मेरे पास से जाने वाला नहीं। तू जो कर रही है, उसे रोक दे।”

“वह क्या चाहता है?” रिया ने पूछा। “वह माँ से क्या चाहता है?”

“वह चाहता है कि मैं डर जाऊँ,” मैंने कहा। “वह चाहता है कि मैं यह सोचूँ कि जो नाम मैंने अभी बोला, वह भी वापस चला जाएगा।”

सुधा ने सिर हिलाया। “और अगर तू डर गई, तो तू हवेली की सीढ़ियों तक नहीं पहुँचेगी।”

मैंने स्याही से भरी उँगली अपनी जेब में पोंछी और पलटकर सबकी तरफ़ देखा।

“चलो,” मैंने कहा। “अभी। सबको गाड़ी में। हवेली चलेंगे।”

“अभी?” सुनीता ने कहा। “मीरा, शालिनी मेरे साथ है, वह गाड़ी में है, वह—”

“सबको,” मैंने कहा। “कोई पीछे नहीं। अगर रजिस्टर यहाँ दीवार पर नाम उभार सकता है, तो वह हवेली में भी उभारेगा। और देर की तो वह कोई और नाम उठा लेगा। चलो।”

हम कब्रिस्तान के फाटक की तरफ़ भागे। सुधा ने चलते-चलते काजल का हाथ पकड़ लिया, क्योंकि काजल एक बार ठिठक गई थी, जैसे उसे याद नहीं आ रहा कि वह कहाँ जा रही है। “यह रास्ता है,” सुधा ने उससे कहा। “फाटक की तरफ़। बस बाईं तरफ़।”

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