A Dark Secret – Chapter 378
“तू बस रास्ता बता,” मैंने कहा। “याद करने की ज़रूरत नहीं। बस जिस जगह ले जाए तेरे पैर, मुझे ले चल। मैं तेरे साथ जाऊँगी। और तुझे कोई और नहीं छूने वाला।”
“मैं भी जाऊँगी,” रिया ने कहा।
“रिया—”
“मैं रखवाला हूँ,” उसने मेरी आवाज़ काट दी। “अगर पत्थर पर नाम खुदा है तो उसे पढ़ने के लिए रखवाले का हाथ चाहिए। तुम्हें नहीं पता कि पत्थर क्या कहेगा।”
मैंने उसे देखा। उसकी आँखों में वही ज़िद थी जो माँ की आँखों में थी — मुझे यह अब तक समझ आ चुका था।
“ठीक है,” मैंने कहा। “पर तेरे पीछे मैं रहूँगी। और गलती से भी उस पत्थर को छूने से पहले रुक जाना।”
हम बाहर निकले। चौकीदार बाहर बैठा था — वह भीतर आया नहीं था, बस बाहर गाड़ी के पास खड़ा हमारा इंतज़ार कर रहा था। मुझे देखकर वह उठा।
“मीरा,” उसने कहा। उसकी आवाज़ में कुछ था जो पहले नहीं था — वह जल्दी में था। “एक बात मुझे अभी याद आई। तूने पूछा था कि तेरी माँ ने डिब्बे में क्या बदला था।”
“हाँ?”
“डिब्बे में सिर्फ़ नाम नहीं रखा था।” उसने मेरी कलाई पकड़ी। “मैंने देखा था — उस रात तेरी माँ ने क़ब्र के पास कुछ गाड़ा था। डिब्बा नहीं, कुछ और। कुछ छोटा। मैंने पूछा था तो उसने कहा था कि इसे कोई नहीं खोदेगा, क्योंकि यह दिखता नहीं।”
“क्या गाड़ा था?”
“मुझे नहीं पता।” उसकी आँखें चमकी। “पर मुझे जगह याद है। सुधा की क़ब्र से तीन क़दम दूर, उस पुरानी क़ब्र के पास जिस पर नाम ही नहीं लिखा।”
हम फिर कब्रिस्तान लौटे। इस बार सुबह के चार बज रहे थे और पूरब में हल्की सी लकीर दिख रही थी। चौकीदार हमें सीधे उस बिना नाम की क़ब्र तक ले गया। वहाँ ज़मीन थोड़ी उभरी हुई थी, जैसे किसी ने जल्दी में मिट्टी डाली हो और उसे ठीक से न बराबर किया हो।
“यहाँ,” चौकीदार ने कहा। “यहाँ कुछ गड़ा है। मैं तब से इस जगह से बचता आया हूँ, क्योंकि मुझे लगता था कि कुछ अनहोनी होगी। पर अब लगता है, यही वह जगह है जिसका इंतज़ार चालीस साल से हो रहा था।”
हम सब झुके। भैरों की मज़बूत कलाई ने छोटी खुरपी से मिट्टी खोदनी शुरू की, और मैंने हाथों से मिट्टी हटाई। दो फुट के अंदर ही कुछ ठोस चीज़ मिली — पीतल की टकराहट वाली आवाज़।
डिब्बा छोटा था, मुट्ठी भर मिट्टी के नीचे छिपा हुआ। भैरों ने उसे बाहर निकाला। उसका ढक्कन जंग खा रहा था।
“खोलो,” सुधा ने कहा। वह मेरे पीछे खड़ी थी।
ढक्कन खुला। अंदर सूखी घास थी, और उस घास के बीच एक काग़ज़ का टुकड़ा — वही पीला काग़ज़, जिस पर स्याही से कुछ लिखा था। मैंने उसे उठाया। उस पर सिर्फ़ एक शब्द था — “बाबू” — और नीचे, थोड़ा और मिटा हुआ, एक अधूरा अक्षर। पहला काग़ज़ जो क़ब्र से मिला था, वह इससे जुड़ गया। दोनों टुकड़े एक साथ रखने पर नाम का पहला हिस्सा साफ़ हो गया — “बाबू हर” — पर बाक़ी “नाम सिंह” नहीं था, जैसे किसी ने इसे जान-बूझकर तोड़ा हो।
“यह पूरा नहीं है,” भैरों ने कहा।
“क्योंकि पूरा हवेली की नींव में है,” सुधा ने कहा। “जो दो हिस्सों में बाँटा गया, उसे जोड़ने के लिए दोनों जगहों पर हाथ रखना पड़ेगा।”
सुधा ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आवाज़ अब धीमी थी। “मीरा, एक बात। मुझे यह काग़ज़ देखकर कुछ और याद आ रहा है। बाबू हरनाम ने नाम दो हिस्सों में नहीं, तीन हिस्सों में तोड़ा था। तीसरा हिस्सा हवेली की उस अलमारी में है जो अभी मनोहर ने खोली है।”
उसकी आवाज़ में कुछ काँपा। “और मनोहर को यह पता नहीं था।”
मैंने तेज़ी से सोचा। मनोहर ने जो काग़ज़ जलाए थे, वे नाम के नहीं थे, बल्कि हवेली के बही-खाते थे — जिससे साबित हो कि वह नाम की खोज में था, पर उसे उसका पूरा रास्ता नहीं पता था।
“तो अलमारी का तीसरा हिस्सा किसी और के पास है?” मैंने पूछा।
“नहीं,” सुधा ने कहा। “अलमारी का तीसरा हिस्सा उसी जगह है जहाँ वह पहले था। मनोहर ने अलमारी खोली, पर उसे वह काग़ज़ नहीं मिला। क्योंकि वह काग़ज़ मनोहर की नहीं, तुम्हारी माँ की रखी हुई चीज़ों में था।”
मेरे हाथ रुक गए।
“मेरी माँ?”
“सुशीला ने उसे अलमारी से निकालकर अपने पास रख लिया था।” सुधा ने मेरी आँखों में देखा। “अब सवाल यह है कि वह काग़ज़ कहाँ है।”
“माँ की चीज़ें मेरे पास हैं,” मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी हो गई। “संदूक में। चिट्ठियाँ, मकान का काग़ज़, गोली… पर एक तीसरा काग़ज़?
“वह तीसरी चिट्ठी के साथ हो सकता है,” रिया ने कहा। “जो माँ की संदूक में थी।”
“घर चलो,” मैंने कहा।
हम गाड़ी की तरफ़ मुड़े कि चौकीदार ने हमें रोका। “बेटी, इतनी जल्दी में क्यों? मेरे पास भी एक चीज़ है। मैं इसे चालीस साल से अपनी जेब में लिए घूम रहा था और अब देने का मौक़ा आया है।”
उसने जेब से एक फोटो निकाली। पुरानी, मुड़ी हुई, किनारों से फटी हुई — काले-सफ़ेद फोटो, जिसमें दो औरतें खड़ी थीं। एक लंबी, कमर पर हाथ — माँ। मैंने उन्हें तुरंत पहचान लिया, वही सख़्त चेहरा, वही आँखें। दूसरी, उनसे थोड़ी छोटी, सिर पर दुपट्टा, हाथ में कुछ पकड़े — सुधा। दोनों मुस्कुरा रही थीं, वह मुस्कान जो किसी से कुछ छुपाने वाली हो।
“पीछे कुछ लिखा है,” चौकीदार ने कहा। “मैं पढ़ नहीं सकता। तू पढ़ ले।”
मैंने फोटो पलटी। पीछे, धुँधली स्याही में, साफ़ अक्षरों में एक लाइन लिखी थी — “एक नाम बचाने के लिए एक नाम खोना पड़ता है।”
मैंने वह लाइन पढ़ी। रिया ने मेरे कंधे के ऊपर से देखा। सुनीता ने भी देखा। और सुधा, जो अब तक सबसे सख़्त चेहरे से खड़ी थी, अचानक ऐसे रुकी जैसे उसने कोई दरवाज़ा खोल दिया हो।
“यह मेरी लिखाई है,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार टूटी। “यह… यह लाइन सुशीला ने नहीं लिखी। यह मैंने लिखी थी। चालीस साल पहले। उस रात, जब मैंने तेरी माँ को पहली बार पीतल गली में देखा।”
मैंने उसकी आँखें देखीं। “तो इसका मतलब क्या है?”
वह रुकी। उसके हाथ काँप रहे थे और वह फोटो की तरफ़ देख रही थी, जैसे वह उस रात को देख रही हो। “इसका मतलब है कि यह लाइन मैंने उस वक़्त लिखी थी जब सुशीला ने कहा था कि वह अपना नाम रजिस्टर में लिखवाने वाली है। और मैंने… मैंने उसे रोकने के लिए यह लिखी थी। पर मुझे याद नहीं है कि मैंने यह क्यों लिखी।”
वह मेरी तरफ़ देखने लगी। “मीरा, अगर मैंने यह लिखा है, तो मुझे वह कारण याद होना चाहिए। पर वह मेरे दिमाग़ से मिट गया है। स्याही मेरी लिखाई साफ़ रखती है, पर याद नहीं रखती।”
“तो फिर वह कौन सा नाम था?” रिया ने पूछा। “जो बचाने के लिए एक नाम खोना पड़ा?”
सुधा ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मुझे पहले कभी नहीं मिला — शर्म और हिम्मत, दोनों एक साथ।
“वह नाम मेरा था,” उसने कहा, और आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुश्किल से सुनाई दी। “और तेरी माँ ने उसे बचाने के लिए अपना नाम नहीं, बल्कि अपनी बेटी का नाम लिखवाया। तेरा नाम। तू उस दिन से उस सौदे का हिस्सा है, मीरा। सिर्फ़ काग़ज़ पर नहीं, खून में।”
मैं चुपचाप खड़ी रही। पीछे से काजल की आवाज़ आई, जो अब हवेली की सीढ़ी से उतरकर कब्रिस्तान तक चली आई थी। “मीरा,” उसने कहा। “मुझे अब याद आ रहा है कि नींव का पत्थर कहाँ है। पीछे के कुएँ की सीढ़ियों के नीचे, तीसरी सीढ़ी के ठीक बाईं तरफ़। पर मैं तुम्हें वहाँ ले चलने के लिए अपना नाम नहीं बोलूँगी। मैं तुम्हारे साथ चलूँगी बस। क्योंकि जो औरत अपना नाम भूल रही है, वह रास्ता भी भूल सकती है।”
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno