A Dark Secret – Chapter 377
पीली बत्ती वाली खिड़की में जो खड़ा था, उसने हमें देखकर बत्ती बुझा दी। मैंने गाड़ी का दरवाज़ा खोला और बाहर कूदी। भैरों मेरे पीछे-पीछे आया, और रिया रजिस्टर को दोनों हाथों से सीने से लगाए मेरे पीछे चल पड़ी। काजल गाड़ी में ही बैठी रह गई — पीछे की खिड़की से उसका चेहरा दिख रहा था, जैसे घुप्प अँधेरे में कोई बुझा हुआ दीया।
हवेली का गेट खुला था। भीतर का आँगन खाली था, पर स्याही की महक इतनी तेज़ थी कि रिया ने अपनी नाक कपड़े से दबा ली। फर्श पर ताज़े पैरों के निशान थे — बड़े, भारी, किसी मोटे आदमी के। भैरों ने निशान देखे और उसका जबड़ा कस गया।
“यह मेरे नहीं हैं,” उसने कहा, बिना देखे। “मैंने तो जूते भी नहीं पहने आज।”
सीढ़ी पर चढ़ते वक़्त मुझे अपनी साँस बहुत तेज़ सुनाई दे रही थी। पहली मंज़िल का दरवाज़ा आधा खुला था और उसके अंदर से हल्की मिट्टी जैसी बदबू आ रही थी — नम काग़ज़, जला हुआ काग़ज़, और वही गोंद वाली स्याही।
कमरे में कोई नहीं था। खिड़की खुली थी और उसके नीचे गिरी हुई लालटेन पड़ी थी जिसकी बत्ती अभी बुझी थी। कमरे के बीच में उसकी अलमारी खुली पड़ी थी — लोहे की, हरे रंग की, जिसके दोनों दरवाज़े ऐसे उखड़े थे जैसे ज़ोर लगाकर खींचे गए हों। भीतर के पन्ने बिखरे थे — बही-खाते, रसीदें, पुरानी फाइलें।
“वह भाग गया,” रिया ने कहा। “खिड़की से।”
“नहीं,” मैंने कहा और नीचे झुका। फर्श पर स्याही की एक बूँद थी, फिर दूसरी, फिर तीसरी — और वे कमरे के पार ले जा रही थीं, खिड़की की तरफ़ नहीं, बल्कि दीवार के उस कोने की तरफ़ जहाँ एक पुराना पर्दा लटक रहा था।
मैंने पर्दा हटाया। पीछे एक छोटा दरवाज़ा था, जिसका कुंडा अब भी घूम रहा था।
“यह दरवाज़ा कहाँ जाता है?” मैंने भैरों से पूछा।
भैरों पहली बार घबराया दिखा। “यह… यह तो बंद ही रहता था। चालीस साल से बंद। यह सीधे नीचे के उस कमरे में जाता है जहाँ सुधा रहती थी।”
हम सीढ़ियों से उतरने लगे। तंग, पत्थर की सीढ़ियाँ, जिन पर काई जमी थी। जैसे-जैसे नीचे जा रहे थे, स्याही की महक गाढ़ी होती जा रही थी। रिया की साँस मेरे कान के पास चल रही थी।
नीचे का कमरा अब भी वैसा ही था — पत्थर का फर्श, एक कोने में सुधा की चारपाई, और बीच में वह वेदी जैसी जगह जहाँ पहले रजिस्टर रखा था। पर अब वहाँ कुछ और था। एक कुर्सी, और उस कुर्सी पर मनोहर बैठा था।
वह ऐसे बैठा था जैसे कोई बूढ़ा थककर बैठा हो। फाइलें उसके पैरों के पास बिखरी थीं। हाथ में पीतल का डिब्बा था, और उसके दूसरे हाथ में एक छोटी स्याही की दवात, जिससे धुआँ उठ रहा था।
“मनोहर।” मेरी आवाज़ कमरे में गूँजी।
उसने सिर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं और उसके होठों पर एक नाम था जो वह बार-बार बुदबुदा रहा था, पर सुनाई नहीं दे रहा था।
“मैंने जला दिया,” उसने कहा। “जो काग़ज़ मुझे मिला था… जला दिया। पर यह डिब्बा… यह डिब्बा जलता नहीं।”
“डिब्बे में क्या है?” मैंने कहा और एक क़दम आगे बढ़ी।
“कुछ नहीं।” उसने हँसने की कोशिश की। “इसमें कोई नाम लिखवाने की जगह नहीं मिली। सिर्फ़ एक काग़ज़ का टुकड़ा है, जिस पर लिखा है… बाबू। बस बाबू। न पूरा नाम, न तारीख़।”
सुधा कमरे में आई। सीढ़ियों से नहीं, बल्कि उस दीवार में से जहाँ पहले बत्ती जलती थी — वह दीवार अब स्याही में लिपटी थी और उस पर उसका नाम उभर आया था। वह मनोहर के सामने खड़ी हो गई।
“बाबू,” उसने कहा, और आवाज़ काँप रही थी। “तुझे नहीं पता कि तू क्या खेल खेल रहा है।”
“मुझे पता है।” मनोहर उठा। उसका शरीर भारी था और उस कुर्सी से वह धीरे उठा, जैसे कोई बोझ उठा रहा हो। “मैंने सब पढ़ा है। तेरी बही, तेरे काग़ज़, तेरी छोटी-छोटी लिखाइयाँ। तूने चालीस साल यहाँ रहकर मुझे बहुत कुछ सिखाया है, सुधा।”
“तूने बाबू हरनाम का पहला नाम कहाँ छिपाया?” मैंने पूछा।
“किसी ने नहीं छिपाया,” वह हँसा। “यह डिब्बा खाली है। और जब तक उसमें नाम नहीं, यह काग़ज़ बस एक काग़ज़ है।”
“तो फिर तू यहाँ क्यों आया?” सुधा ने कहा, और उसकी आवाज़ में उतनी ही सख़्ती लौट आई थी जितनी पहले थी। “अगर डिब्बा खाली है तो तू यहाँ क्यों बैठा है, चोरी-छिपे, आधी रात को, जलती दवात लेकर?”
मनोहर रुका। उसकी उँगलियाँ डिब्बे पर कस गईं, और उसी पल उसे पता चला कि वह पकड़ा गया है।
“क्योंकि उसे पता है,” सुधा ने मेरी तरफ़ देखा। “कि बाबू हरनाम का पहला नाम इस डिब्बे में नहीं, हवेली की नींव में है। और वह उसे वहाँ तक जाने नहीं देना चाहता।”
मनोहर ने दवात उठाई। भैरों दो क़दम में उसके पास पहुँचा, पर मनोहर ने दवात कुर्सी पर पटक दी और स्याही फूटकर बिखर गई — काले रंग की, जो फर्श पर फैलती चली गई और जिन निशानों को छूती, वे निशान तुरंत उभर कर अपने आप मिट जाते।
“रुको!” रिया चिल्लाई।
वह सीधी मनोहर के पास गई। उसके हाथ में रजिस्टर था और उसकी उँगली रजिस्टर के आख़िरी पन्ने पर थी। “मैं रखवाला हूँ,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ मेरी अपनी आवाज़ से ज़्यादा मज़बूत लगी। “तुम्हें रजिस्टर छूने का हक़ नहीं है।”
मनोहर ने रजिस्टर देखा, और उसकी आँखें पहली बार रिया पर टिकीं, और कुछ ऐसा बदला उनमें जो मैंने पहले कभी नहीं देखा। वह डर गया — रजिस्टर से नहीं, रिया की उस छोटी उँगली से जो स्याही से सनी थी।
वह पीछे हटा। एक क़दम, फिर दूसरा, और पत्थर की दीवार के पास पहुँच गया। और तभी उसकी आवाज़ बदली — भारी, झरझरी, चालीस साल पुरानी। “तू इसे छू नहीं पाएगी। क्योंकि तेरा नाम भी इसमें है। जो अपना नाम छूता है, वह जलता है।”
रिया ने अपनी उँगली नहीं हटाई। “तो जलने दे,” उसने कहा। “हम नहीं रुकेंगे।”
और उसी वक़्त मनोहर के पैरों के नीचे फर्श से एक तेज़ आवाज़ आई — कुछ टूट रहा था, कोई चीज़ जो चालीस साल से वहीं छिपी थी। मनोहर नीचे देखने ही वाला था कि भैरों ने उसका हाथ पकड़ लिया और दवात उसकी मुट्ठी से छूटकर फर्श पर गिर गई।
डिब्बा मनोहर के हाथ से छूटा। वह फर्श पर गिरा, खुला, और उसके अंदर से एक काग़ज़ का टुकड़ा निकलकर फिसल गया — बिल्कुल वही कटा हुआ काग़ज़ जिस पर सिर्फ़ “बाबू” लिखा था।
मैंने उसे उठाया। स्याही से लिखा था, थोड़ा फैला हुआ, पर साफ़ पढ़ा जा सकता था। नीचे तारीख़ भी थी — चालीस साल पुरानी।
“यह टुकड़ा है,” सुधा ने कहा और मेरे हाथ में देखा। “आधा नाम यहाँ है। बाक़ी हवेली की नींव के पत्थर पर है। बाबू ने खुद अपना नाम दो हिस्सों में तोड़कर गाड़ा था। ऊपर वाला हिस्सा सुधा की क़ब्र में और नीचे वाला हवेली की नींव में। जब तक दोनों नहीं मिलते, नाम पूरा नहीं होता।”
“तो मैं इसे ले जाऊँगी,” मैंने कहा।
“नहीं,” काजल ने कहा।
वह सीढ़ियों पर खड़ी थी। उसका चेहरा अब भी वही था, पर उसकी आवाज़ में कुछ घुल गया था जो पहले नहीं था — डर। “मैं जानती हूँ कि नींव का पत्थर कहाँ है। मैंने बचपन में वह जगह देखी थी, जब दादा मुझे यहाँ लाते थे। पर मुझे अपना नाम याद नहीं है। मैंने सुबह आईने में देखा — मुझे अपना चेहरा याद है, पर जब मैं नाम बोलने की कोशिश करती हूँ, तो मुँह से कुछ और निकलता है। जो मैं भूल रही हूँ, वह मुझे कैसे याद होगा कि पत्थर कहाँ है?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके हाथ काँप रहे थे और उसकी आँखों में पानी था — वही औरत जो मुझे पहली बार हवेली के दरवाज़े पर मीठी बोली बोलकर मिली थी।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno