A Dark Secret – Chapter 376
सुधा मेरे पीछे से आगे आई। उसने चौकीदार को देखा।
“चाचा,” वह बोली, “तू मुझे पहचानता है?”
चौकीदार ने उसकी तरफ़ देखा और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने कंबल अपने मुँह पर खींच लिया, जैसे कोई ठंडी हवा आई हो।
“तू…” वह फुसफुसाया। “तू तो मर गई थी।”
“हाँ,” सुधा ने कहा। “पर मेरा नाम कभी नहीं मरा। और आज वह वापस आया है।”
चौकीदार ने एक लंबी साँस ली। फिर उसने झुककर अपनी लाठी उठाई — धीरे से, जैसे वह अब हथियार नहीं थी। उसने चारों तरफ़ देखा, जैसे किसी और को देख रहा हो, और फिर मेरे करीब आया।
“बेटी,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब बिलकुल बदली हुई थी, “मैं तुझे कुछ दिखाता हूँ।”
वह हमें अपने कमरे की तरफ़ ले चला। कमरा छोटा था — एक खटिया, एक अलमारी, एक स्टोव, दीवार पर लटकता पुराना कैलेंडर जिसकी तारीख़ किसी ने बदली ही नहीं थी। उसने अलमारी खोली और उसके नीचे से एक लोहे का डिब्बा निकाला, जंग लगा हुआ।
“इस कमरे में जो भी रात को आया,” उसने कहा, “उसकी एक चीज़ मैंने रख ली। पहले डर से, फिर आदत से।” उसने डिब्बा खोला। “यह चालीस साल पहले उस औरत की रह गई थी।”
उसने अंदर से एक चीज़ निकाली — छोटी, पीतल की, चपटी। एक गोली। और उस पर खुदा हुआ था — “सुशीला”।
मेरे हाथ अपने आप आगे बढ़ गए।
“यह मेरी माँ की है,” मैंने कहा, और मेरी आवाज़ मेरी नहीं लगी।
“तो वह औरत तेरी माँ थी?” चौकीदार ने पूछा। “वह यहाँ एक नाम ढूँढने आई थी। उसने कहा था कि उसकी बेटी को बचाना है।”
सुधा ने पीछे से कहा, “वह सुशीला थी। मेरी सहेली। वह मुझे बचाने आई थी — और आधा नाम बोलकर रुक गई थी।”
चौकीदार ने सुधा की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
“तो अब तू आई है,” उसने कहा। “चालीस साल बाद। वही काम पूरा करने।”
मैंने गोली अपनी हथेली में ली। वह ठंडी थी, पर उस पर उँगली फेरते ही कुछ गरमाहट आ गई — जैसे किसी ने अभी-अभी उसे छोड़ा हो।
“चाचा,” मैंने कहा, “जो आदमी अभी यहाँ से भागा — उसे तूने देखा?”
चौकीदार ने सिर हिलाया। “देखा। वह काग़ज़ लिख रहा था। कलम से। चलते-चलते भी लिख रहा था। ऐसा मैंने सिर्फ़ एक आदमी को करते देखा है, चालीस साल पहले।”
“कौन?”
“बाबू हरनाम,” उसने कहा। “वह जब हवेली से निकलता था, तो चलते-चलते काग़ज़ पर लिखता रहता था। कभी रुकता नहीं था। कहता था — ‘जो नाम लिखा नहीं, वह हुआ नहीं।’”
रिया ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
“माँ,” उसने कहा, “वह जो भागा, वह बाबू हरनाम था?”
“या उसकी कलम,” सुधा ने कहा। “कलम चलाती है तो हाथ भी वही दिखता है।”
मैंने डिब्बे की तरफ़ देखा, फिर चौकीदार की तरफ़।
“एक बात और पूछनी है,” मैंने कहा। “चालीस साल पहले जब मेरी माँ यहाँ आई थी — उसने क़ब्र खोदी थी?”
चौकीदार ने धीमे से कहा, “उसने खोदी नहीं थी। उसने सिर्फ़ पत्थर हटाया था और डिब्बा निकाला था। फिर वह कुछ बोली — मुझे समझ नहीं आया — और डिब्बा वापस रखकर चली गई। पर वह जाते वक़्त रो रही थी।”
“क्यों?” रिया ने पूछा।
“क्योंकि,” सुधा ने कहा, और उसकी आवाज़ भारी थी, “उसने देखा होगा कि डिब्बे में बाबू हरनाम का नाम नहीं, कुछ और लिखा है।”
मैंने डिब्बा उठाया और उसके तले को ठीक से देखा। “भूलो मत” के नीचे, बहुत हल्की, खुरची हुई लकीरें थीं — जैसे कोई नाम मिटाया गया हो और उसके ऊपर नया नाम लिखा गया हो।
“यहाँ कुछ मिटाया गया है,” मैंने कहा।
सुधा ने डिब्बा अपने हाथ में लिया और उसे रोशनी में पकड़ा। उसकी आँखें सिकुड़ीं।
“माँ ने यह लिखा था,” वह बोली। “सुशीला ने। उसने पुराना नाम मिटाया और नया लिखा।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “तेरी माँ ने यहाँ कुछ किया था, मीरा। उसने सिर्फ़ भागने की कोशिश नहीं की थी — उसने कुछ बदला था।”
मैंने डिब्बा अपने पास रखा।
“तो अब वह साफ़ नहीं है,” मैंने कहा। “असली नाम क्या था, यह पता नहीं। पर एक बात पक्की है — हमें मनोहर को ढूँढना है। उसके पास चाबी है, और उसने डिब्बे से कुछ निकाला है। अगर वह जो निकाला वह बाबू हरनाम का नाम है, तो वह सबसे ख़तरनाक आदमी है इस शहर में।”
“या सबसे डरा हुआ,” सुधा ने कहा। “क्योंकि जो उसे चला रहा है, वह उसके हाथ से नाम लेकर क्या करेगा, मनोहर को भी पता नहीं।”
चौकीदार ने हमें रोका जब हम जाने लगे।
“बेटी,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ था जो पहले नहीं था, “वह औरत — तेरी माँ — उसने जाते वक़्त मुझसे कहा था कि अगर कोई और आए इस काम से, तो उसे बताना कि डिब्बे में जो था, वह अब उसके पास नहीं है।”
मैं रुकी। “क्या मतलब?”
“मतलब यह कि उसने कुछ निकालकर अपने साथ ले जाने की कोशिश की थी।” उसने मेरी आँखों में देखा। “और मुझे लगता है वह सफल नहीं हुई। क्योंकि डिब्बे में कुछ तो वापस रखा गया था।”
मैंने गोली अपनी जेब में रखी। “चाचा, एक आख़िरी बात। तूने यह सब चालीस साल किसी को क्यों नहीं बताया?”
वह हँसा — एक छोटी, सूखी हँसी।
“किसे बताता?” उसने कहा। “जिसे बताता, वह अगले महीने भूल जाता। मैंने एक बार एक इंस्पेक्टर को बताया था — वह तीन महीने बाद मुझे पहचानने से इनकार कर गया। उसने कहा कि वह मुझे कभी मिला ही नहीं।”
मैंने उसका हाथ थामा। उसकी हथेली खुरदरी थी, कंपकंपाती हुई।
“अब कोई भूलने वाला नहीं है,” मैंने कहा। “अब हम नाम लौटा रहे हैं।”
हम बाहर निकले। एम्बुलेंस में बैठते वक़्त भैरों ने कहा, “मैडम, मनोहर के घर चलें?”
“नहीं,” मैंने कहा। “पहले वह अलमारी। जिसकी चाबी उसके पास है।”
“पर चाबी तो उसके पास है,” रिया ने कहा।
“हाँ,” मैंने कहा। “पर अलमारी हवेली में है। और हवेली के ताले अब हमारे पास हैं।”
सुधा ने मेरी तरफ़ देखा और पहली बार उसके चेहरे पर कुछ और था — मुस्कान नहीं, पर वह सख़्ती जो अब टूट रही थी।
“एक बात याद रखना,” उसने कहा। “हवेली में जो अलमारी है, वह काजल की नहीं, मनोहर की है। और मनोहर की रखी चीज़ों में एक काग़ज़ ऐसा भी है जिस पर सिर्फ़ एक नाम लिखा है — सुशीला जोशी।”
मैंने एम्बुलेंस स्टार्ट की। सुबह के तीन बजे थे और शहर सो रहा था — बस हमारी गाड़ी और उसकी बत्ती, और उस बत्ती के नीचे सुनीता का चेहरा, जो अब साफ़ था, और रिया का हाथ, जो रजिस्टर पर था।
पीछे बैठी काजल ने अचानक कहा, “मीरा।”
“क्या?”
“अगर मनोहर ने वह नाम जला दिया हो तो?”
मैंने आगे देखा। सड़क खाली थी, और दूर हवेली की पीली दीवारें चाँदनी में और पीली लग रही थीं।
“तो हम नाम जलने नहीं देंगे,” मैंने कहा। “क्योंकि जो नाम आग में जलता है, वह राख में रहता है। और राख भी एक नाम है।”
भैरों ने पीछे से धीरे से कहा, “आशा।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“मेरी बेटी का नाम,” उसने कहा, आँखें सड़क पर। “तीन साल पहले उतर गया। आज रात मुझे लगा कि मैं उसकी आवाज़ सुन रहा हूँ।”
“तू सुन रहा है,” सुधा ने कहा। “बस उसे बोलना बाक़ी है।”
एम्बुलेंस हवेली की गली में घुसी। सामने गेट खुला था, और भीतर अंधेरा था। पर पहली मंज़िल की खिड़की पर एक पीली बत्ती जल रही थी — जो अभी तक कभी नहीं जली थी।
मैंने गाड़ी रोकी और देखा। खिड़की पर कोई खड़ा था, और उसके हाथ में कुछ था जो चमक रहा था — पीतल जैसा।
रिया ने धीमे से कहा, “माँ, वह मनोहर है। और उसके हाथ में डिब्बा है।”
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