A Dark Secret – Chapter 375
“तुझे कैसे पता?”
“चालीस साल में मैंने यह लिखाई हज़ार बार देखी है। हर नाम, हर तारीख़ — यही आदमी लिखता था। काजल ख़ुद नहीं लिखती। वह बोलती है, मनोहर लिखता है। हमेशा से।”
काजल पीछे की सीट पर बैठी थी। उसका चेहरा उतरा हुआ था, आँखों के नीचे पसीना था। यह वही काजल नहीं थी जो मुझे तुलसी चौक पर मीठी बोली में मिली थी। यह औरत का आधा नाम रजिस्टर से उतर रहा था और वह अब भी बचने की कोशिश कर रही थी।
मैंने काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ाया।
“यह तेरा काम है?”
उसने देखा। और उसका हाथ काँपा।
“यह मेरा नहीं है,” वह बोली, आवाज़ तेज़ हो गई। “तू समझती क्या है? मैं मनोहर को दो दिन से देख भी नहीं रही। वह गायब है। कल रात से फोन बंद है, घर पर नहीं, हवेली में नहीं। मैंने भैरों को भेजा —”
“तो यह लिखने वाला कौन था?” मैंने काग़ज़ पकड़कर दिखाया। “यह उसकी लिखाई है। तू ख़ुद कहती है मनोहर ही नाम लिखता है।”
काजल ने भैरों की तरफ़ देखा। भैरों गाड़ी के बाहर खड़ा था, उसने कुछ नहीं कहा।
“मीरा,” काजल ने धीमे से कहा, “मनोहर ने कल रात हवेली में कुछ काग़ज़ जलाए थे। भैरों ने देखा।”
मैंने भैरों की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया। बस एक बार।
“कौन से काग़ज़?” मैंने पूछा।
“पता नहीं,” काजल ने कहा। “मैंने पूछा तो बोला — पुराने, जिनका कोई काम नहीं। पर वह डरा हुआ था। मनोहर को मैंने चालीस साल में इतना डरा हुआ नहीं देखा।”
“और अब वह गायब है,” सुधा ने कहा। उसकी आवाज़ में वह ठंडक लौट आई थी जो कुछ देर पहले खो गई थी। “क्योंकि जो उसने जलाया, वह उसके हाथ में नहीं था। जो उसे चला रहा है, वह काग़ज़ों के बाहर है।”
रिया ने पीछे से सिर उठाया।
“मैं उसे ढूँढ सकती हूँ,” उसने कहा।
“नहीं।”
“माँ, मैं उसकी आवाज़ सुन सकती हूँ। जब कब्रिस्तान में वह भागा, मैंने सुना — उसके क़दमों में स्याही की महक नहीं थी। धूल थी। वह असली आदमी है। मनोहर है।”
“तू अभी कुछ नहीं ढूँढेगी,” मैंने कहा। मेरी आवाज़ कड़ी निकली, मुझे भी लगा। “पहले कब्रिस्तान। पहले वह डिब्बा।”
मैंने एम्बुलेंस आगे बढ़ाई। गेट के अंदर रोशनी बहुत कम थी, सिर्फ़ एक ट्यूबलाइट, जो दूर चौकीदार के कमरे में जल रही थी।
सुनीता ने पीछे से कहा, “मनोहर के पास एक पुरानी अलमारी की चाबी है। वह उसी अलमारी में रखता था जो काग़ज़ आज किसी को नहीं दिखाने चाहिए। अस्पताल के पुराने रिकॉर्ड, हवेली के बही-खाते, सब। मैंने वह अलमारी एक बार खुली देखी थी — जब मैं अठारह की थी और काजल ने मुझे हवेली बुलाया था।”
काजल ने पीछे से कुछ कहना चाहा, पर सुनीता ने उसे रोक दिया।
“तू चुप रह,” सुनीता ने कहा। “तूने मेरा नाम अठारह साल की उम्र में लिखवाया था, आज तुझे अपना ही नाम याद नहीं रहा। तेरे हिसाब बंद हो गए। अब मेरी बात सुन।”
काजल चुप हो गई।
मैंने कहा, “कब्रिस्तान के बाद मनोहर। पहले वह डिब्बा। अगर वह मनोहर था, तो उसे भी वही चाहिए जो हमें चाहिए — और वह हमसे पहले पहुँच गया। अब उसके पास क्या है, पता नहीं।”
एम्बुलेंस क़ब्रों के बीच वाली कच्ची सड़क पर रुकी। मैंने लाइट बंद की। सिर्फ़ चाँदनी थी और दूर ट्यूबलाइट की पीली लकीर।
सुधा उतरी। उसने एक पल के लिए चारों तरफ़ देखा और फिर सीधे चल पड़ी — जैसे उसे रास्ता याद हो। चालीस साल की गैरहाज़िरी के बाद भी।
“यहाँ,” उसने कहा और रुक गई।
सामने एक क़ब्र थी। छोटी, पत्थर घिसा हुआ, कोई फूल नहीं, कोई चिराग़ नहीं। पत्थर पर नाम पढ़ा ही नहीं जाता था — बस धुँधली लकीरें।
“यह मेरी है,” सुधा ने कहा। “मेरे मरने के बाद किसी ने नाम नहीं लिखवाया, क्योंकि जिसने मिटाया वही ज़िंदा था। और जो मर गया, वह नाम किसे याद रहता?”
“तो यहाँ से क्या निकालना है?” मैंने पूछा।
“डिब्बा,” सुधा ने कहा। “वह पीतल का डिब्बा जो अभी उस आदमी के सामने खुला था। वह मेरी क़ब्र के नीचे ही रखा था। उसने खोला, कुछ लिखा, और सब वापस रखकर भाग गया। मुझे लगता है उसने कुछ निकाला भी है।”
मैंने भैरों को बुलाया। “गाड़ी से फावड़ा ले आ।”
भैरों गया। रिया और शालिनी क़ब्र के दूसरी तरफ़ खड़ी थीं। रिया ने शालिनी का हाथ पकड़ा हुआ था। सुनीता बीच में खड़ी थी, उसकी आँखें क़ब्र पर थीं और होंठ हिल रहे थे — कुछ गिन रही थी, या कुछ याद कर रही थी।
भैरों फावड़ा लेकर आया और खोदने लगा। मिट्टी सूखी थी, पर ऊपर की परत के नीचे नमी थी। तीसरी या चौथी बार में फावड़ा किसी धातु से टकराया।
“रुक,” सुधा ने कहा।
हमने मिट्टी हटाई। पीतल का डिब्बा था — वही, जिसका ढक्कन कुछ देर पहले खुला था। भैरों ने उसे बाहर निकाला और ज़मीन पर रखा। ढक्कन खुला था, अंदर कुछ नहीं था — सिवाय एक चीज़ के। डिब्बे के तले में स्याही से लिखा था — “भूलो मत।” दो शब्द। किसी ने अभी-अभी लिखा था, स्याही गीली थी और उसकी महक आ रही थी — वही गोंद जैसी महक।
“वह इसे खोलकर देख चुका है,” मैंने कहा। “और वह जो निकालकर ले गया, उसकी जगह उसने यह लिख दिया।”
“क्या निकाला?” रिया ने पूछा।
सुधा ने डिब्बा उठाया, उसे पलटा, नीचे देखा।
“बाबू हरनाम का पहला नाम,” उसने कहा। “वह इसी डिब्बे में रखा था — चालीस साल पहले मैंने अपने हाथ से रखा था। किसी ने उसे निकाल लिया।”
मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खिसक गई। वह नाम जिसके बिना सौदा नहीं टूटता, वह अब उस आदमी के पास था जो रजिस्टर के अंदर से बोल रहा था।
“मनोहर,” मैंने कहा। “मनोहर ने निकाला।”
सुधा ने सिर हिलाया। “या जो मनोहर की शक्ल में आया। फ़र्क़ अब पता नहीं चलेगा।”
तभी चौकीदार का कमरा पर ट्यूबलाइट और तेज़ हो गई, और उससे रोशनी हमारी तरफ़ फैल गई। मैंने पलटकर देखा। एक बूढ़ा आदमी आ रहा था, हाथ में लाठी, कंधों पर मोटा कंबल लपेटा हुआ, सिर पर गहरे रंग की टोपी। वह तेज़ी से नहीं चल रहा था, पर सीधा हमारी तरफ़ आ रहा था।
“अरे!” वह चिल्लाया। “कौन है वहाँ? रात को यहाँ कोई नहीं रुकता! सुनते नहीं?”
मैं उसकी तरफ़ बढ़ी। “हम किसी को नहीं…”
“चुप!” उसने लाठी घुमाई। “मैं यहाँ चालीस साल से हूँ। रात को कोई क़ब्र नहीं खोदी जाती। अब निकलो, वरना पुलिस को…”
वह रुका। उसका हाथ हवा में ही रह गया। लाठी की नोक मेरी तरफ़ थी और वह मुझे देख रहा था — मेरा चेहरा, मेरी आँखें, मेरा माथा। उसने आँखें सिकोड़ीं, फिर थोड़ा और करीब आया। कंबल उसके कंधे से खिसक गया।
और फिर उसकी लाठी हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर गई। धड़ाम।
वह पीछे हटा। एक क़दम, दो क़दम। उसका मुँह खुला रह गया और उसकी आँखों में वह डर आ गया जो सिर्फ़ उन आँखों में आता है जिन्होंने कुछ ऐसा देखा हो जो वापस नहीं आना चाहिए था।
“तू…” उसकी आवाज़ फट गई। “तू वही है जो चालीस साल पहले आई थी?”
मैं रुकी।
“क्या कह रहे हो?” मैंने कहा।
“चालीस साल पहले,” वह बोला, और उसकी आवाज़ काँप रही थी, “एक औरत यहाँ आई थी — रात को, ऐसे ही। उसके हाथ में काग़ज़ था और वह इसी क़ब्र के पास खड़ी थी। उसने मुझसे कहा था — ‘मुझे अंदर जाने दो, मैं एक नाम ढूँढने आई हूँ।’ मैंने मना किया था।”
वह मेरी तरफ़ देख रहा था, पर जैसे मेरे पीछे किसी और को देख रहा हो।
“और अगली सुबह,” उसने धीमे से कहा, “वह क़ब्र खुली मिली थी। मैंने किसी को नहीं बताया। चालीस साल से नहीं बताया।”
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