A Dark Secret374 / 536

A Dark Secret – Chapter 374

7 min read November 6, 2026

भैरों ने एम्बुलेंस रोकी और बाहर देखा।

“मैडम,” उसने कहा, “वह रहा।”

मैंने बाहर देखा — पेड़ों की कतार के साथ, कब्रिस्तान की दीवार के पास, कोई खड़ा था। लंबा नहीं, बल्कि सामान्य, और उसके हाथ में कुछ था जो स्याही की तरह चमक रहा था — या शायद सुबह की रोशनी में सिर्फ़ पीतल।

वह मुड़ा, और हमारी तरफ़, पर यह नहीं देखा। वह कब्रिस्तान की दीवार के साथ-साथ चलने लगा।

रिया ने अचानक कहा, “माँ, वह मेरा नाम बोल रहा है।”

मैंने रिया की तरफ़ देखा। उसकी आँखें उस आदमी पर थीं।

“कैसे पता?”

“सुन रही हूँ,” वह बोली, “धीरे-धीरे — जैसे कोई दूर से बुला रहा हो। रिया जोशी। रिया जोशी।”

वह आदमी दीवार के साथ चलकर एक मोड़ पर मुड़ा और पेड़ों के पीछे गायब हो गया — और जैसे ही वह गया, रिया ने रजिस्टर को दोनों हाथों से थाम लिया और उसका चेहरा फीका पड़ गया।

“अंदर कुछ हिला है,” उसने कहा।

“क्या?”

“मेरा नाम,” रिया ने कहा। “मेरा नाम भी डगमगा रहा है। वह मेरा नाम बोल रहा है माँ, और अगर उसने मेरा पूरा नाम, गली और आवाज़ सही से बोल दिया —”

“तो?”

“तो वह मुझे बुला सकता है,” रिया ने कहा। “जिसके पास रजिस्टर है, वह भी बोल सकता है। पर जो बोलेगा, वह खींच भी सकता है।”

काजल की गाड़ी पीछे आकर रुकी। वह खिड़की से झाँकी।

“क्या हुआ?”

मैंने कहा, “जो भैरों की शक्ल में था, वह रिया का नाम बोल रहा है।”

काजल ने एक पल सोचा, फिर बोली, “तो हमें पहले उस तक पहुँचना है। तेरे हाथ में रजिस्टर है, तेरी बेटी रखवाला है — अगर वह पहले सही से बोल देगा, तो पलटी मार जाएगी।”

“तू कैसे जानती है?”

काजल ने कहा, “क्योंकि मैंने यही सब किया है, मीरा। चालीस साल। मैं जानती हूँ यह कैसे काम करता है। जो नाम बोलने वाले के पास रजिस्टर नहीं है, वह बोल नहीं सकता। पर…” उसने रुककर कहा, “…अगर रिया का रजिस्टर उसके सामने न हो, तो वह सिर्फ़ बोलेगा, खींच नहीं पाएगा। रजिस्टर को रिया के हाथ से दूर करो। बस।”

रिया ने कहा, “नहीं।”

“रिया —”

“अगर मैं रजिस्टर छोड़ूँगी,” रिया ने कहा, “तो वह मुझे खींच लेगा। मैंने सुना है, माँ — उसकी आवाज़ में मेरा नाम है। वह बस मुझे देख रहा है। जैसे कोई मुझे बुला रहा हो।”

सुधा ने कहा, “वह रुको। सब रुको।” उसने रिया की तरफ़ देखा। “रिया, तूने कभी रजिस्टर के अंदर की आवाज़ सुनी है?”

रिया ने सिर हिलाया।

“तो अब सुन,” सुधा ने कहा। “आँख बंद कर। रजिस्टर को देख मत। सिर्फ़ सुन। वह क्या बोल रहा है?”

रिया ने आँखें बंद कीं। उसके होंठ हिले — धीरे-धीरे, जैसे कोई लिख रहा हो। फिर उसने आँखें खोलीं और कहा, “वह मेरा नाम नहीं बोल रहा।”

“क्या कह रहा है?”

“वह बोल रहा है — ‘रखवाला, अपना नाम बता।’” रिया ने कहा। “और फिर — ‘रखवाला, अपना नाम छोड़ दे।’”

सुधा ने कहा, “वह रजिस्टर नहीं है। वह कोई और है जो रजिस्टर के नाम से बोल रहा है।” उसने बाहर की तरफ़ देखा। “और मुझे लगता है वह हमें कब्रिस्तान बुला रहा है। हमें पहले उस तक नहीं जाना है। पहले रिया को रजिस्टर में अपना नाम ख़ुद — अपने हाथ से — दोबारा लिखना होगा। ताकि कोई उसे हिला न सके।”

मैंने पीछे देखा। सुनीता ने शालिनी का हाथ अब भी पकड़ा था और उसकी आँखें रिया पर थीं।

“लिख,” सुनीता ने कहा। “अभी लिख।”

रिया ने रजिस्टर खोला। मैंने उसे कलम दी — वही पीतल की कलम जो सुधा ने मुझे दी थी। रिया ने पन्ना पलटा, अपनी जगह ढूँढी, और अपना नाम लिखने लगी — पर उसका हाथ काँप रहा था।

“मैं नहीं कर पा रही,” उसने कहा।

“कर,” मैंने कहा। “मैं तेरे पास हूँ।”

उसने एक लंबी साँस ली और लिख दिया — “रिया जोशी।” नीचे अपने हाथ से उसने लिखा — “गली नौ, सरोज नगर।” और फिर एक छोटी सी तारीख़। कलम की नोक काग़ज़ पर से हटी।

पन्ने पर स्याही गहरी हुई — और फिर रिया ने कहा, “अब आवाज़। मेरी आवाज़ मेरे साथ ही है।”

वह रुकी। उसने कहा, “मैं रिया जोशी हूँ। मेरी माँ मीरा जोशी है। मैं गली नौ में रहती हूँ। और मैं किसी से नहीं डरती।”

कुछ देर कुछ नहीं हुआ। फिर एम्बुलेंस की छत पर कुछ टपका — एक बूँद, दो बूँद — और खिड़की के शीशे पर स्याही की एक पतली लकीर उभरी, जो धीरे-धीरे मिट गई।

सुधा ने कहा, “अब वह जानता है कि रिया अपना नाम जानती है। वह अब सीधे नहीं आएगा। वह अब कोई और तरीका ढूँढेगा।”

“कौन?” मैंने कहा।

“वह जिसने हमें कब्रिस्तान बुलाया,” सुधा ने कहा। “और जो भैरों की शक्ल में नहीं था — वह भैरों की शक्ल में था, पर मैंने देखा।”

“क्या देखा?”

“उसके हाथ में कलम थी।” सुधा ने कहा, और उसकी आवाज़ भारी हो गई। “जो चलते वक़्त काग़ज़ पर लिख रहा था — बिना रुके। मैंने चालीस साल में यह सिर्फ़ एक आदमी को करते देखा है।”

कमरे में सुनीता ने कहा, “बाबू हरनाम।”

सुधा ने सिर हिलाया। “वह मरा नहीं, मीरा। वह रजिस्टर के अंदर है। और अब वह रिया को बुला रहा है।”

एम्बुलेंस की बत्ती जल उठी — अपने आप, जैसे किसी ने सीधे तार छू दिया हो। और बत्ती की पीली रोशनी में दीवार के साथ-साथ अब सिर्फ़ चार पदचिह्न नहीं थे — बल्कि उनके बीच में बहुत छोटे पदचिह्न थे, बच्चे के, और वे सीधे कब्रिस्तान के दरवाज़े की तरफ़ जा रहे थे।

रिया ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, “माँ, अब मुझे पता है उसकी आवाज़ कैसी है। मैं उसे पहचान लूँगी।”

मैंने एम्बुलेंस आगे बढ़ाई। कब्रिस्तान का लोहे का गेट खुला था — और भीतर, पुरानी क़ब्रों के बीच, धुँधली रोशनी में कोई बैठा था, और उसके सामने ज़मीन पर पीतल का डिब्बा रखा था जिसका ढक्कन खुला था।

सुनीता ने धीरे से कहा, “वह मेरी क़ब्र नहीं है। वह सुधा की है। और वह जो वहाँ बैठा है, वह मेरा नाम लिख रहा है।”

॥

मैंने एम्बुलेंस का दरवाज़ा धक्का देकर खोला। पीछे से सुनीता की आवाज़ आई — “अकेले मत जा।”

पर मैं उतर चुकी थी। कब्रिस्तान का लोहे का गेट खुला था, और भीतर उस धुँधली रोशनी में जो बैठा था, वह मेरी तरफ़ नहीं देख रहा था। वह अपने सामने रखे पीतल के डिब्बे पर झुका था और कुछ लिख रहा था। कलम की नोक काग़ज़ पर चलने की आवाज़ इतनी दूर से भी आ रही थी, जैसे कोई मेरे कान के पास लिख रहा हो।

मैंने सुधा को इशारा किया कि रुके। रिया को भी। भैरों गाड़ी के पास खड़ा था, उसका हाथ दरवाज़े पर था।

पर जैसे ही मैंने तीन क़दम रखे, वह बैठा हुआ उठ गया। एक झटके में। और भागा — क़ब्रों के बीच से, पुराने पत्थरों को छूते हुए, बिना आवाज़। मैंने दौड़ने की कोशिश की, पर वह पलक झपकते ही चारदीवारी के उस पार था, जहाँ बत्ती नहीं थी।

मैं रुकी। साँस फूल रही थी।

वहाँ, जहाँ वह बैठा था, ज़मीन पर पीतल का डिब्बा खुला पड़ा था। और उसके पास एक काग़ज़। बस एक।

मैंने उसे उठाया। पुराना काग़ज़, किनारों से मुड़ा हुआ, और उस पर स्याही से लिखा था — “रिया जोशी, हरनाम हवेली।”

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। मैंने काग़ज़ पलटा। पीछे कुछ नहीं था। बस यही एक लाइन। और लिखावट — मैं उसे पहचानती थी। यह काजल की लिखावट नहीं थी। यह उस आदमी की थी जो हवेली में हर काग़ज़ पर तारीख़ और नाम लिखता था।

मैं एम्बुलेंस में लौटी।

सुधा ने काग़ज़ मेरे हाथ से लिया और देखा। उसका चेहरा बदला।

“यह मनोहर की लिखाई है,” उसने कहा।

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