A Dark Secret – Chapter 373
वह रुकी। फिर आई — धीरे-धीरे, जैसे कमरे में ज़मीन नाज़ुक हो। दरवाज़े पर खड़ी होकर उसने सुनीता को देखा। सुनीता ने ऊपर देखा।
उन दोनों के बीच में जो चीज़ थी, वह चालीस साल से जमी हुई थी — और कमरे में कोई भी उसे नाम से नहीं बुलाना चाहता था।
“मैंने तेरा नाम लिखवाया था,” काजल ने कहा। उसकी आवाज़ लगभग सपाट थी।
“जानती हूँ,” सुनीता ने कहा।
“मैं अठारह की थी। डर गई थी। दादा ने कहा था — जो काग़ज़ पर है, वही शहर में है।”
सुनीता ने कुछ नहीं कहा। उसने शालिनी की पीठ पर हाथ रखा और बस वैसे ही बैठी रही।
काजल ने कहा, “तू मुझे गाली दे। कुछ तो दे।”
“नहीं दूँगी,” सुनीता ने कहा। “तूने मेरा नाम लिखा। पर चालीस साल मेरी बेटी को शालिनी कहकर बुलाने वाला भी कोई चाहिए था। तेरा दादा मर गया, तेरा कारोबार चलता रहा, और मेरी बेटी के स्कूल की हाज़िरी में से मेरा नाम मिटता रहा। तू माफ़ी माँगने आई है या हिसाब?”
काजल ने अपना पर्स पकड़ा — कसकर। फिर उसने कहा, “मेरा नाम भी उतर रहा है। मैं अभी सिर्फ़ ‘क’ हूँ।”
कमरे में चुप्पी छा गई। सुनीता ने उसकी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ बदला।
“तो अब तू जान गई,” सुनीता ने कहा, “कि रजिस्टर किसी का नहीं होता।”
काजल ने कुछ कहना चाहा, पर रुक गई। वह मुड़ी और बाहर चली गई। दरवाज़े पर भैरों उसकी तरफ़ देख रहा था; काजल ने उसे देखा नहीं।
वह जाते-जाते रुकी और मेरी तरफ़ मुड़ी।
“तारपीन का डिब्बा कब्रिस्तान के रास्ते की पीली दीवार के पास, मेरे दादा के कमरे में है।” उसने रुककर कहा — “चाबी मेरे पास है। पर वहाँ जाने से पहले सोच लेना। जो लिखा जाएगा, वह पढ़ा भी जाएगा।”
वह गाड़ी में बैठी। इंजन चला, और वह वहीं रुकी रही — जाती नहीं, पर घर से दूर।
सुनीता ने शालिनी के बाल सहलाए और मेरी तरफ़ देखा।
“कब्रिस्तान जाना है,” वह बोली। “मुझे साथ ले चल। मेरी क़ब्र है वहाँ — या जो उसकी जगह खड़ा है। उसे मैंने चालीस साल नहीं देखा।”
“तू ठीक है?”
“नहीं,” उसने कहा, सीधे। “पर कब्रिस्तान जाने से पहले मुझे अपने हाथ से एक काम करना है।”
वह उठी और रसोई में गई। वहाँ से एक छोटा डिब्बा लाई — लाल ढक्कन वाला, पुराना, किनारों से टेढ़ा। उसने उसे खोला — अंदर सिलाई का सामान था, धागे के रील, दो बटन, और एक छोटी सी थैली।
“यह मेरी माँ का था,” उसने कहा। “जब मैं छोटी थी, माँ ने इसमें मेरा नाम काढ़ा था। सालों पहले धागा निकल गया।” उसने थैली खोली और उसमें से एक काग़ज़ निकाला — मुड़ा हुआ, पीला पड़ा। “यह अस्पताल की रसीद है। मेरी माँ ने पिछले साल डॉक्टर को दिखाया था — तब मेरा नाम काग़ज़ पर था।”
काग़ज़ पर नाम आधा मिटा हुआ था — “सुनीता” का “सु” साफ़ था, “नीता” धुँधला। नीचे उसकी माँ का हस्ताक्षर था — “सुनीता चौहान की माँ।”
“यह ले,” उसने मुझे दिया। “अगर कल मैं भूलने लगूँ, तो यह दिखाना। मेरी माँ का हाथ है इसमें। जब तक यह काग़ज़ है, मैं किसी को याद रहूँगी।”
मैंने उसे लिया। उसका किनारा ठंडा था — उसी तरह ठंडा जैसे हवेली का रजिस्टर।
रिया उठी। उसने रजिस्टर बगल में दबाया और शालिनी से कहा, “चल। तू भी चलेगी।”
“मैं?” शालिनी ने सुनीता की तरफ़ देखा।
सुनीता ने गर्दन हिलाई। “चल। तेरी माँ की क़ब्र है वहाँ।”
हम बाहर निकले। सुबह की रोशनी अब पूरी तरह खुल चुकी थी और गली की दीवारों पर पीली परछाइयाँ पड़ रही थीं। भैरों ने एम्बुलेंस का पिछला दरवाज़ा खोला। काजल की गाड़ी आगे आकर रुकी और उसने खिड़की नीचे की।
“मैं आगे चलूँगी,” उसने कहा। “कब्रिस्तान का रास्ता जानती हूँ।”
“तू पीछे आ,” मैंने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि अगर तेरा नाम उतर रहा है और तू पहले पहुँची,” मैंने कहा, “तो रजिस्टर सोचेगा कि तू वहाँ जान-बूझकर गई है। और वह कुछ माँगेगा। तू पीछे चल — जितनी दूर रह सके, उतना ठीक।”
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसका चेहरा एक पल के लिए खुला — जैसे किसी ने खिड़की खोल दी हो, और फिर बंद कर दी।
“ठीक है,” उसने कहा, और गाड़ी पीछे ले ली।
एम्बुलेंस में हम सब बैठे — मैं ड्राइवर की सीट पर, भैरों मेरे बगल में, और पीछे सुधा, सुनीता, शालिनी और रिया। रिया कब्रिस्तान जाते वक़्त रजिस्टर को दोनों हाथों से पकड़े हुए थी और उसकी आँखें बंद थीं — जैसे वह कुछ सुन रही हो।
सुनीता ने शालिनी का हाथ पकड़ा और मेरी तरफ़ देखा।
“बता,” उसने कहा। “कब्रिस्तान में क्या करना है?”
“सुधा की क़ब्र के नीचे एक पीतल का डिब्बा है,” मैंने कहा। “उस पर बाबू हरनाम का पहला नाम लिखा है। वह नाम बोलना है — पूरा, नाम-गली-आवाज़ और चेहरे के साथ।”
“किसकी आवाज़?”
मैंने सुधा की तरफ़ देखा। सुधा ने कहा, “मेरी। वह मेरी क़ब्र है। मैं चालीस साल वहाँ दबी रही। अगर कोई उसे खोलेगा, तो वह मेरी ही आवाज़ सुनेगा।”
सुनीता ने कहा, “और अगर डिब्बा वहाँ नहीं मिला?”
“तो वह स्याही के पदचिह्नों के पास होगा,” मैंने कहा। “जो कोई भी उन्हें बना रहा है, वह हमसे पहले पहुँच चुका है।”
भैरों ने पहली बार बीच में घुसकर कहा, “वह भैरों नहीं है। मैं यहीं हूँ। मैंने तीन दिन से हवेली के बाहर पैर नहीं रखे।” वह रुका। “मैं सिर्फ़ एक बार उस रास्ते से गुजरा था जब तेरी बेटी का नाम उतरा था — ग्यारहवीं गली। उसके बाद मुझे वहाँ जाने की हिम्मत नहीं हुई।”
“तो स्याही के पदचिह्न किसने बनाए?” रिया ने पूछा। वह पीछे से आवाज़ आई — साफ़, बिना डर के।
भैरों ने पीछे मुड़कर देखा। “कोई ऐसा जो मेरी शक्ल में है,” उसने कहा। “या कोई जो मेरी शक्ल बना सकता है।”
सुधा ने कहा, “रजिस्टर अपने हिसाब से हाथ नहीं बनाता। वह तो हमारा हाथ इस्तेमाल करता है। पर वह भैरों की शक्ल बना ले — यह नया है।”
“या भैरों की शक्ल में कोई चल रहा है,” मैंने कहा। “और वह कोई है जिसे हम देख नहीं पा रहे।”
एम्बुलेंस कब्रिस्तान की पीली दीवार के पास आई और मैंने गाड़ी धीमी कर दी। दीवार पर स्याही के वे चार पदचिह्न अब भी थे — पर अब पाँच थे। मैंने रोका।
“एक और बढ़ गया,” भैरों ने कहा।
मैंने पीछे रिया की तरफ़ देखा। वह रजिस्टर खोल रही थी — पन्ने पलट रही थी। उसका चेहरा उतरता जा रहा था।
“क्या?” मैंने पूछा।
“माँ,” रिया ने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी थी, “सुनीता का नाम पूरा है — ठीक है। पर उसके नीचे जो लिखा है, वह नया है।”
“क्या लिखा है?”
वह पन्ना उठाकर मेरी तरफ़ लाई। सुनीता चौहान वाली लाइन के नीचे, ताज़ी स्याही से, छोटे अक्षरों में लिखा था —
“इसके बदले में रखवाला एक नाम खोएगा।”
मैंने रजिटर पकड़कर रिया की तरफ़ देखा। रिया ने मेरी आँखों में देखा और कहा, “मेरा नहीं। नाम मेरा नहीं माँगा।”
“तो किसका?”
रिया ने उसी पन्ने पर उँगली रखी और नीचे की तरफ़ सरकाई। एक और लाइन थी — और वह सुनीता के नाम के बाईं तरफ़, किनारे पर, छोटे अक्षरों में, जैसे हाशिए पर —
“जो सबसे पास है, वही जाएगा।”
मैंने सुनीता की तरफ़ देखा। वह मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसके चेहरे पर वह सख़्ती अब नहीं थी जो कुछ देर पहले थी — अब कुछ और था, जैसे कोई चीज़ उसके अंदर गिन रही हो।
“तू बोल,” मैंने कहा। “क्या चाहती है?”
सुनीता ने शालिनी का हाथ पकड़ा। “अगर मेरा नाम पूरा होने की कीमत मुझे चुकानी है,” वह बोली, “तो पहले मेरी बेटी का नाम पूरा कर। उसका नाम अभी अधूरा है। फिर मुझे चुका।”
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