A Dark Secret – Chapter 372
सुनीता ने अचानक पीछे से हाथ बढ़ाकर मेरी कुर्सी की पीठ थाम ली। एम्बुलेंस लगभग चालीस की रफ़्तार से कब्रिस्तान की सड़क की तरफ़ जा रही थी और वह इतनी ज़ोर से पीछे से आई कि एक पल को मुझे लगा कि वह धीरे-धीरे बोल रही है।
“मत ले जाओ मुझे वहाँ। पहले घर।”
मैंने पीछे देखा — उसका चेहरा अब पूरा था। सुनीता चौहान, जिसे चालीस साल से किसी ने नाम से नहीं बुलाया था, अब एम्बुलेंस में बैठी थी, सफ़ेद साड़ी की लटें उलझी हुई, आँखें सूखी पर हाथ काँप रहे थे। उसके होंठ हिल रहे थे — कुछ गिन रही थी वह, खुद से।
“तुम्हारा घर शांति विहार में है,” मैंने कहा।
“गली सात। मकान का नंबर पच्चीस। और मेरी बेटी…”
वह रुकी। उसने रिया की तरफ़ देखा जो पीछे बैठी थी, रजिस्टर उसकी गोद में, दोनों हाथ ऊपर से दबाए हुए।
“मेरी बेटी का नाम शालिनी है। वह रिया की दोस्त है। दो महीने से वह घर में अकेली होगी — मेरी माँ उसके पास रहने आती थी पर…” वह रुकी। “मेरी माँ पिछले साल ठंड में गई थी। तो वह अकेली ही होगी।”
मैंने ब्रेक धीरे दबाया। एम्बुलेंस धीमी हुई।
“तूने पहले क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि मुझे ख़ुद नहीं याद था,” सुनीता ने कहा, और उसकी आवाज़ में वह सख़्ती नहीं थी जो पहले थी — अब कुछ टूटा हुआ था। “चालीस साल से मुझे सिर्फ़ यह याद था कि मेरा कोई नाम नहीं है। बेटी की बात सोचते ही सिर में दर्द होता था। अभी तुमने नाम बोला, और सब लौट आया।” उसने अपनी कलाई देखी, जैसे उस पर भी कुछ लिखा हो। “मैंने दो महीने पहले उससे आख़िरी बार बात की थी — या शायद नहीं की। मुझे याद नहीं। बस इतना याद है कि वह रो रही थी और मैं रसोई में खड़ी थी और मेरे हाथ से कुछ गिर गया।”
पीछे सुधा ने कहा, “कप।”
“क्या?”
“तेरे हाथ से कप गिरा था,” सुधा ने कहा। “मुझे याद है। मैं हवेली के नीचे थी और मुझे भी उस दिन कुछ टूटने की आवाज़ आई थी — जैसे कहीं कोई कप गिरा हो।” उसने सुनीता की तरफ़ देखा। “नेक्स के दिन तेरा नाम रजिस्टर में उठ गया।”
एम्बुलेंस में कुछ देर चुप्पी रही। भैरों ने पीछे से कहा, “मैडम, कब्रिस्तान की सड़क आ रही है। मोड़ लूँ?”
“नहीं,” मैंने कहा। “बाएँ से शांति विहार।”
काजल की गाड़ी पीछे थी — दूर, पर उसकी हेडलाइट दिख रही थी। मैंने देखा कि वह गाड़ी भी मेरे साथ मुड़ी। शीशे के पीछे उसका चेहरा अभी भी अँधेरे में था, पर मुझे पता था वह क्या सोच रही है — उसका नाम अब सिर्फ़ ‘क’ रह गया था और वह किसी को यह नहीं दिखाना चाहती थी कि वह डर रही है।
शांति विहार की सड़कें सुबह के वक़्त खाली थीं। नई कॉलोनी, आधे मकान बने, आधे बंद — किसी के आँगन में सूखी रस्सी पर कपड़े लटके थे तो किसी के दरवाज़े पर ताला। गली सात की तरफ़ मुड़ते ही मुझे कुछ अजीब लगा — यहाँ की हवा में वही स्याही की गंध थी जो हवेली में थी, पर हल्की, जैसे किसी ने शाम को यहाँ आकर चारों तरफ़ छिड़क दिया हो।
मकान नंबर पच्चीस। छोटा, पीले रंग का, मकान के बाहर बरामदे में एक सूखा पौधा, और दीवार पर जहाँ नाम-पट्टा होना चाहिए था वहाँ चार कीलें थीं और उनके नीचे प्लास्टर का हल्का गड्ढा — जैसे कोई पट्टा उखाड़ा गया हो। गेट अंदर से बंद नहीं था। एक झटके से खुल गया।
सुनीता ने पहले कदम रखा। उसके पैर लड़खड़ाए, पर वह गिरी नहीं। वह सीधी अंदर गई, और हम सब पीछे।
अंदर का कमरा अँधेरा था — परदे खींचे हुए थे, और एक कोने में चटाई पर एक लड़की बैठी थी। उसके घुटनों से लिपटा हुआ एक कंबल था, सामने फ़र्श पर कॉपी-किताबें बिखरी थीं, और उसके हाथ में पेंसिल थी जिससे वह किसी काग़ज़ पर कुछ लिख रही थी।
वह उठी नहीं। उसने सिर्फ़ ऊपर देखा।
“माँ?”
सुनीता एक पल के लिए रुकी। फिर वह घुटनों के बल बैठ गई और उसने शालिनी को दोनों हाथों से खींचकर अपने से चिपका लिया। शालिनी ने पहले तो कुछ नहीं किया — जैसे समझ नहीं आ रहा हो कि क्या हो रहा है। फिर उसके हाथ धीरे-धीरे ऊपर उठे, और उसने अपनी माँ की पीठ पकड़ ली, और जो आवाज़ उसने निकाली वह बच्चों जैसी थी — बहुत सीधी, बिना शब्दों की।
मैं दरवाज़े पर खड़ी रही। पीछे रिया भी रुक गई। भैरों बाहर ही रुका — मैंने उसे बरामदे में खड़े देखा, पीछे मुड़ा हुआ, जैसे उसे अंदर आना ठीक न लगा हो। काजल गाड़ी में बैठी थी, इंजन बंद करके, और खिड़की से बाहर देख रही थी — पर उसकी नज़र हम पर नहीं, दीवार पर टँगी किसी चीज़ पर थी।
“तू अकेली थी?” सुनीता ने शालिनी का चेहरा अपने हाथों में लेकर पूछा।
शालिनी ने सिर हिलाया। “पापा कहते थे माँ काम पर गई है। फिर पापा भी चले गए। वे कहते थे बाहर मत जाना, किसी से मत बोलना — लोग भूल जाते हैं।”
“कौन कहता था?”
“पापा।” शालिनी ने कहा। “वे कहते थे कि माँ का नाम काग़ज़ों में नहीं है, इसलिए मुझे अपना नाम भी नहीं बोलना। दो हफ़्ते पहले वे भी चले गए — कहीं काम पर। तब से मैं अकेली हूँ।”
मैंने शालिनी के हाथ में पकड़ा काग़ज़ देखा। उस पर स्याही से बार-बार एक ही नाम लिखा था — “शालिनी नायक। शालिनी नायक। शालिनी नायक।” पूरा पन्ना भर गया था और नीचे की तरफ़ लिखावट बिगड़ती जा रही थी, जैसे हाथ थक गया हो।
रिया आगे आई। उसने शालिनी के बगल में घुटने टेके और कहा, “मैं तेरा नाम जानती हूँ।”
शालिनी ने उसकी तरफ़ देखा। “क्या?”
“शालिनी नायक। गली सात। मकान पच्चीस।” रिया ने कहा, बिना रुके। “मैंने तेरा नाम क्लास-रजिस्टर में मिटा हुआ देखा था, तब भी जानती थी।”
शालिनी की आँखें भर आईं। “तू मुझे याद रखती है?”
“मैं तेरा टिफ़िन भी रखती हूँ,” रिया ने कहा — और उसकी आवाज़ में वही सूखा-सा मज़ाक था जो मुझसे आता है। “सूखी रोटी और अचार। तेरी माँ के हाथ का अचार।”
शालिनी हँसी — छोटी सी हँसी, जैसे किसी ने लंबे समय बाद खींची हो। वह हँसी सुनकर सुनीता ने आँखें बंद कर लीं, जैसे कोई चीज़ अंदर जा रही हो।
सुधा ने धीरे से मेरी कोहनी छुई और मुझे बाहर बरामदे में ले आई। भैरों वहीं खड़ा था — बरामदे की दीवार पर टिका, हाथ जेब में।
“क्या?” मैंने पूछा।
सुधा ने धीरे से कहा, “एक नाम लौटाने का हिसाब होता है। रजिस्टर कुछ माँगेगा।”
“क्या माँगेगा?”
“मुझे नहीं पता,” उसने कहा। “चालीस साल में मैंने किसी को नाम लौटाते नहीं देखा। पर मैंने रजिस्टर को ‘लेते’ देखा है। वह चुपचाप नहीं देता। जब सुनीता का नाम तूने बोला, तो कुछ न कुछ हिला होगा।”
मैंने रिया की तरफ़ देखा — वह अंदर शालिनी के बगल में बैठी थी, रजिस्टर उसकी गोद में। सुधा ने मेरी नज़र पकड़ ली।
“उसके हाथ में है,” सुधा ने कहा। “वह जान जाएगी, मीरा। रखवाला ही जानता है कि रजिस्टर कब माँगता है।”
“वह बारह साल की है।”
“सुधा की उम्र चालीस साल रुकी रही,” सुधा ने कहा, और उसकी आवाज़ में अब वही तीखापन नहीं था — सिर्फ़ थकान। “उम्र में बारह साल भी बहुत होते हैं, मीरा।”
मैं अंदर लौटी। शालिनी अब सुनीता के कंधे से लगी बैठी थी और रिया उसी के कान में कुछ कह रही थी — धीरे, जैसे कोई बहुत पुरानी बात हो। मैंने काजल की तरफ़ देखा — वह गाड़ी से उतर आई थी और बरामदे के कोने पर खड़ी थी, हाथ में पर्स। वह अंदर नहीं आई।
“काजल,” मैंने कहा।
“मुझे कुछ नहीं पूछना,” उसने कहा।
“तू अंदर आ।”
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