A Dark Secret – Chapter 371
वह कुछ नहीं बोला। वह डिब्बा सुधा की तरफ़ बढ़ाया दिया। सुधा ने खोला। अंदर एक पुराना चबूतरे का पत्थर था — छोटा, चौकोर — जिस पर खुदा था "पीतल गली"। साथ में एक चिट्ठी थी, जिस पर मेरी माँ की लिखाई थी।
मैंने चिट्ठी खोली। सिर्फ़ दो लाइनें थीं:
"भैरों — जिस दिन तेरी बेटी को तेरा नाम न रहे, उस दिन यह डिब्बा मेरी बेटी को दे देना। मैं जानती हूँ तू मेरा नाम नहीं बोल सकता। इसीलिए तुझे लिखकर दे रही हूँ। — सुशीला"
भैरों ने धीरे से कहा — "मेरी बेटी का नाम तीन साल पहले उतर गया था। मुझे यह सब पता था। मैं काजल मैडम के लिए काम करता रहा क्योंकि मेरे पास और कुछ नहीं था। पर इसे मैं अब तक नहीं ला पाया — डर से कि तेरी माँ की लिखाई पढ़कर मुझे अपनी बेटी का चेहरा याद आएगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं। वह रो नहीं रहा था। बस आँखें लाल थीं।
"भैरों," मैंने कहा। "तेरी बेटी का नाम मुझे बता।"
वह हिल गया। "नहीं —"
"बता। रट ले। नाम, गली, आवाज़।"
"पर —"
"सुधा," मैंने कहा। "उसकी मदद कर।"
सुधा ने भैरों का हाथ पकड़ा और कहा — "सुना, मेरा नाम चालीस साल बाद लौटा है। तेरी बेटी का तीन साल हुआ है। यह वक़्त है। अब बोल।"
भैरों ने काँपती आवाज़ में कहा — "आशा। आशा भैरों। ग्यारहवीं गली, पीछे वाला मकान। आवाज़ — जो हँसती थी तो सारी गली सुनती थी।"
"तो उसे याद रख," मैंने कहा। "और जब लौटे, तो रजिस्टर में लिखवा। हम सबको याद है।"
वह सिर्फ़ सिर हिलाता रहा।
फिर सुधा ने कहा — "अब सुनो, वक़्त कम है। मेरा नाम पूरा हो गया, रजिस्टर का वह पन्ना ख़ाली हो गया होगा। मुझे लगता है रजिस्टर ने इसे महसूस किया है। और वह जवाब देगा। रिया के पास रजिस्टर है — उसे छिपाना होगा।"
"कहाँ?"
"वहीं जहाँ मैंने चालीस साल पहले छिपाया था। पर वह जगह अब रजिस्टर की नज़र में है। चड्ढा जी को हटाना होगा। उसकी फाइलें अब भी उस कमरे में हैं जो रजिस्टर के सबसे क़रीब है।"
"कौन सा कमरा?"
"अस्पताल का वह पुराना स्टोर। तीसरी मंज़िल। जहाँ से रामदीन ने मुझे निकाला था। और अब वहीं रजिस्टर को दफ़नाना होगा — आख़िरी बार।"
"तो चलते हैं।"
हम ऊपर आए। रिया अब भी बाहर खड़ी थी, पर उसने मेरी आवाज़ सुनी तो दौड़कर आई।
"माँ!"
मैंने उसे गले लगाया। फिर अलग करके कहा — "रजिस्टर दिखा।"
उसने अपनी जेब से निकाला। वह छोटा, पतला, भूरा था। खोला तो पन्ने पलटने लगे। हमने देखा — वह पन्ना जिस पर "सुधा" लिखा था, अब साफ़ खाली था। बिल्कुल साफ़। जैसे कभी कुछ लिखा ही न हो।
काजल ने देखा और उसका चेहरा बदल गया।
"मेरा नाम?" उसने पूछा। "मेरा पन्ना?"
मैंने पन्ने पलटे। काजल का नाम अब भी वहीं था, पर और कटा हुआ। पहले आधा था, अब सिर्फ़ पहला अक्षर बचा था — "क"।
काजल ने देखा और पीछे हट गई।
"मैं पूरी उतर रही हूँ," उसने कहा। "मुझे याद नहीं आ रहा मेरा नाम क्या था।"
"काजल," मैंने कहा।
"क्या?"
"तेरा नाम काजल है। याद रख।"
उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ देर के लिए कोई भाव आया — फिर चला गया।
"रिया," मैंने कहा। "अंदर। अभी। हवेली में। हमें तेरा नाम बचाना है।"
रिया ने सीधे मेरी आँखों में देखा।
"माँ," उसने कहा। "मेरा नाम तू मिटाना नहीं। मुझे रखवाला बने रहने देना।"
"नहीं।"
"सुन।" उसने मेरा हाथ पकड़ा। "अगर मैं रखवाला नहीं रहूँगी, तो रजिस्टर मेरा नाम उठा लेगा — कोई नहीं जानता कब। पर अगर मैं रखवाला रहूँगी, तो मैं रजिस्टर को अपनी तरफ़ रख सकती हूँ। और मैं तुझे नाम बोलने का वक़्त दे सकती हूँ।"
"यह ख़तरनाक है।"
"पता है।"
मैंने कुछ देर उसे देखा। वह बारह साल की थी और उसकी आँखों में वह चीज़ थी जो मेरी माँ की आँखों में थी — जल्दबाज़ी, और ज़िद।
"मैं सोचूँगी —"
"ना," रिया ने कहा। "अभी सोच। वक़्त नहीं है।"
सुधा ने कहा — "वह सही कह रही है। रजिस्टर अब कमज़ोर है। मेरा पन्ना ख़ाली हुआ है। अगर हम दो और नाम बोल दें — दो ऐसे जो सबसे पुराने हैं — तो रजिस्टर एक पूरा हिस्सा खो देगा। पीतल गली का हिस्सा। और तब रिया का नाम उस हिस्से से आज़ाद हो जाएगा।"
"दो नाम?" मैंने पूछा। "कौन से?"
"एक सुनीता चौहान का — वह बोल चुकी है। दूसरा — मेरा। और तीसरा वह जो सबसे गहरा है।" उसने रुककर कहा — "तेरी माँ का।"
मैं रुक गई।
"माँ का नाम रजिस्टर में है। मैंने ख़ुद लिखा था, बारह नामों वाली रात।"
"हाँ। पर तूने उसे अकेला बोला था। तेरी माँ का पूरा नाम — सुशीला जोशी — अभी अधूरा है। उसका चेहरा नहीं बोला गया। अगर तू उसे पूरे नाम-गली-आवाज़-चेहरे से बोलेगी… तो रजिस्टर का सबसे पुराना पन्ना ख़ाली हो जाएगा।"
"कौन सा?"
"वह जिस पर बाबू हरनाम ने सबसे पहला नाम लिखा था।"
मैंने सुधा की तरफ़ देखा। "तू जानती है वह नाम क्या है?"
सुधा ने अपना हाथ बढ़ाया और मेरी नोटबुक उठाई। पन्ने पलटे। आख़िरी पन्ने पर उँगली रखी।
"यहाँ," उसने कहा। "जहाँ लिखा है — 'चौथा तेरा है, मीरा जोशी।'"
"यह तो मेरा है।"
"हाँ," सुधा ने कहा। "पर तेरे नाम के नीचे एक खाली जगह है। उस पर एक नाम उभरना चाहिए था। और वह उभरा नहीं। क्योंकि वह नाम कभी लिखा नहीं गया — पहला नाम। बाबू हरनाम ने अपना पहला नाम कभी किसी को नहीं बताया।"
काजल ने पीछे से कहा — "वह अपना नाम कभी नहीं बोलते थे। हम बच्चों को भी नहीं।"
"तो इसे कैसे पता चलेगा?"
"कब्रिस्तान में," सुधा ने कहा। "उस क़ब्र के नीचे जिस पर मेरा नाम लिखा है — तेरी माँ ने उसे अपने हाथों से बनवाया था। वहाँ एक पीतल का डिब्बा है, और उसमें पहला नाम लिखा है — बाबू हरनाम का।"
मैंने रिया की तरफ़ देखा। उसने गर्दन हिलाई — "जानती थी।"
काजल ने तेज़ी से कहा — "वह क़ब्र बनवाई गई थी? सुशीला ने?"
"हाँ," सुधा ने कहा। "मेरी बहन ने। मेरे लिए। और मैं चालीस साल उसके नीचे दबी रही।"
कमरे में स्याही की महक अब तेज़ हो गई थी। दीवार पर बाबू हरनाम की तस्वीर फिर झूलने लगी। इस बार सीधी नहीं हुई।
मैंने रिया का हाथ कसकर पकड़ा।
"ठीक है," मैंने कहा। "अब कब्रिस्तान। पर पहले — काजल।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तेरी गाड़ी। हमें छतरी चाहिए और कोई भी चीज़ जो स्याही रोक सके।"
काजल ने कहा — "अंदर चल। मेरे दादा के कमरे में तारपीन का डिब्बा रखा है।"
"कैसे जानती है?"
"क्योंकि वह मैंने ही छिपाया था।"
सुधा ने मुस्कुराकर कहा — "चल। अब रोशनी।"
हम हवेली से निकले। आसमान सुबह की तरफ़ खुल रहा था। एम्बुलेंस की बत्ती जल रही थी, पीली, और उसी में दिख रहा था कि सड़क पर किसी ने अभी-अभी स्याही के चार पदचिह्न बनाए हैं — और वे सीधे कब्रिस्तान की तरफ़ जाते हैं।
रिया ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ा।
"माँ," उसने कहा, "अगर वह पहला नाम बोल दिया… तो क्या सब ख़त्म?"
"नहीं," मैंने कहा। "तब शुरू होगा।"
कब्रिस्तान की तरफ़ जाती सड़क पर हम चले, और पीछे काजल की गाड़ी धीमी रफ़्तार से आ रही थी — उसका चेहरा अँधेरे में था, पर उसके हाथ स्टीयरिंग पर काँप रहे थे। भैरों हमारे साथ था, एम्बुलेंस में, पीछे बैठा। उसने कुछ नहीं कहा था, पर मैंने देखा — उसके होंठ हिल रहे थे। वह अपनी बेटी का नाम दोहरा रहा था।
और मैं अपनी माँ का नाम जप रही थी — तीन बार, चुपचाप।
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