A Dark Secret370 / 536

A Dark Secret – Chapter 370

7 min read November 6, 2026

"मैं नहीं गई," सुधा ने कहा। "मैंने अपना नाम ख़ुद नहीं लिखा था। मुझे लिखवाया गया था — मेरे पिता ने। इसीलिए मैं आधी बची। और इसीलिए रजिस्टर मुझे अब तक पूरा नहीं खा पाया। जो अपना नाम ख़ुद लिखता है, वह अधूरा नहीं रहता। वह पूरा जाता है। या पूरा बचता है। रिया ने ख़ुद लिखा है — इसीलिए उसके पास एक रास्ता है।"

मैंने गाड़ी की तरफ़ देखा। रिया खिड़की से मुझे देख रही थी। मैंने उसे हाथ हिलाया कि रुके।

"तो मुझे क्या करना है?"

सुधा ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। "मेरी गली पूछ।"

"कौन सी गली?"

"वही जहाँ से मुझे रजिस्टर में लिखवाया गया था। पीतल गली। हवेली के पीछे वाली गली — जो अब पीतल गली नहीं कहलाती।"

"वह तो बंद पड़ी है, मैं देख चुकी हूँ।"

"गली बंद नहीं है। मकान बंद हैं। गली अब भी वहीं है — हवेली की पीछे की दीवार से शुरू होकर नीम के पेड़ तक। उसका पत्थर चबूतरे के नीचे दबा है, उस पर नाम खुदा है। मैंने वह पत्थर चालीस साल पहले अपने हाथों से दबाया था।"

"और आवाज़?" मैंने पूछा। "मुझे तेरी आवाज़ तब तक पक्की चाहिए जब तक मैं बोलूँ।"

सुधा ने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। गरम था। "मेरी आवाज़ वह है जो तूने सुनी थी जब वह मुझे नाम से बुलाती थी — तेरी माँ। सुशीला। मैं हूँ वही।"

मैंने कुछ देर उसे देखा। फिर मैंने अपनी नोटबुक निकाली। डैशबोर्ड से उठाई थी। पीतल की कलम जेब में थी, स्याही की पुड़िया भी।

"बोल। पूरा बता। नाम, गली, आवाज़।"

सुधा ने कहा — "सुधा हरनाम। पीतल गली, मकान नंबर पाँच। आवाज़ — वह जो तेरी माँ की थी, जब वह गुस्से में होती थी।"

मैंने लिखा।

"नहीं," सुधा ने कहा। "आवाज़ कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो तू लिख दे। उसे याद रखना पड़ता है। एक बार बोलकर सुनाऊँ?"

"हाँ।"

सुधा ने मेरी तरफ़ मुँह किया और बोली — "मीरा। पानी रख दिया है?"

मेरे हाथ रुक गए। मेरी माँ यही कहती थी। हर सुबह। रसोई से, गुस्से में। हर बार। "मीरा, पानी रख दिया है?" और मैं हर बार कहती थी, "रख दिया है माँ।" और वह हर बार नहीं सुनती थी, चिल्लाती रहती थी।

नोटबुक में मेरी कलम रुक गई।

"आवाज़ पकड़ी?" सुधा ने पूछा।

"पकड़ी।"

"फिर बोल।"

मैंने बाहर देखा। आसमान हल्का होने लगा था — सुबह नहीं, बस रात के किनारे पर महीन लकीर। हवेली की बत्तियाँ अब भी जल-बुझ रही थीं। काजल दरवाज़े के पास खड़ी थी, हाथ बाँधे, चेहरा उतरा हुआ।

सुधा ने कहा — "तीन बार। बीच में रुकना मत। और अपना चेहरा याद रखना। माँ कहती थी — नाम के साथ चेहरा बोलना। मैं तेरे सामने खड़ी हूँ, मेरा चेहरा देख और बोल।"

मैंने पहली बार कहा, पूरी आवाज़ में, काँपते हुए भी, साफ़ —

"सुधा हरनाम। पीतल गली, मकान नंबर पाँच।"

कमरे में स्याही की महक तेज़ हुई। काजल का हाथ दरवाज़े की चौखट पर जम गया।

दूसरी बार — "सुधा हरनाम। पीतल गली, मकान नंबर पाँच।"

दीवार पर बाबू हरनाम की तस्वीर झूलने लगी। फिर अचानक सीधी हो गई।

तीसरी बार — "सुधा हरनाम। पीतल गली, मकान नंबर पाँच।"

सुधा के शरीर से एक झुरझुरी गुज़री — सिर से पैर तक। ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके अंदर से कोई पर्दा हटा दिया हो। उसकी आँखें, जो अब तक धुँधली थीं, अचानक साफ़ दिखीं — भूरी, बड़ी, माँ की तरह। उसके होंठ हिले और आवाज़ निकली, और वह आवाज़ अब खुरदरी नहीं थी। साफ़ थी। बिल्कुल साफ़।

"मैं हल्की लग रही हूँ," उसने कहा। "बीस साल में पहली बार।"

काजल ने धीरे से कहा — "उसकी आवाज़… उसकी आवाज़ बदल गई।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। मैंने कहा — "यही असली थी।"

तभी हवेली में एक तेज़ आवाज़ आई — धड़ाम। ऐसा जैसे ऊपर की मंज़िल से कोई भारी चीज़ गिरी हो। छत से प्लास्टर का एक टुकड़ा फर्श पर आ गिरा।

हम सब सीढ़ी की तरफ़ भागे। ऊपर की मंज़िल पर वह कमरा था जहाँ केवल एक पलंग और एक पुरानी अलमारी थी। दरवाज़ा खुला था।

अंदर घुसी। पलंग पर पुरानी चादर पड़ी थी, उलटी-पुलटी। अलमारी का दरवाज़ा खुला, अंदर कुछ नहीं। और फर्श के बीच में, एक पीतल का छोटा घड़ा पड़ा था — फूटा हुआ। उसके अंदर से स्याही फैल रही थी, काली।

"यह घड़ा मेरे दादा का था," काजल ने कहा, आवाज़ धीमी। "वह इसी में स्याही रखते थे। अपनी कलम के लिए।"

"यह अभी तक यहाँ क्यों था?"

"क्योंकि मैंने इसे कभी छुआ नहीं।"

मैंने उस घड़े को देखा। उसके किनारे पर एक निशान था — छोटी उँगली का, स्याही में डूबा हुआ। बच्चे का।

"काजल," मैंने कहा। "हवेली में कोई और रहता है?"

"नहीं।"

"कमरे गिन — कितने हैं?"

"मुझे पता है। नौ हैं। दो नीचे, तीन बीच में, दो ऊपर, दो पीछे।"

"और पीछे की तरफ़ — जहाँ कुआँ है — वहाँ ताले लगे थे?"

काजल ने कुछ सोचा। "लगे थे। पर एक ताला अलग है। लोहे वाला। उसकी चाबी मेरे पास नहीं।"

सुधा ने कहा — "वह ताला बाबू हरनाम ने लगाया था। उसके पीछे एक दरवाज़ा है, जो कुएँ की सीढ़ियों तक जाता है। उसके आगे वह कमरा है जहाँ रजिस्टर चालीस साल रखा था।"

"तो यह स्याही उधर से आई है?" मैंने पूछा। "ऊपर छत तक?"

"नहीं," सुधा ने कहा। "यह घड़ा यहाँ पहले से नहीं था। इसे कोई ऊपर लाया है। आज।"

काजल ने एक कदम पीछे लिया। "मैं किसी को नहीं बताया। मैं तो ख़ुद अभी आई हूँ।"

"तू आई कैसे?"

"गाड़ी से। भैरों से कहा था कि तू आए तो बता दे।"

"भैरों कहाँ है?"

काजल ने नीचे की तरफ़ देखा। "नीचे था।"

मैं सीढ़ियों से भागी। नीचे का कमरा खाली था — बस तिजोरी खुली, रजिस्टर के पन्ने बिखरे। भैरों नहीं था।

"भैरों!" मैंने आवाज़ दी।

कोई जवाब नहीं।

"वह गया नहीं होगा," काजल ने ऊपर से कहा। "उसकी गाड़ी बाहर खड़ी है।"

मैंने बाहर जाकर देखा। गाड़ी खड़ी थी, दरवाज़ा खुला, चाबी अंदर। भैरों नहीं।

फिर मुझे कुछ दिखा। हवेली की दीवार पर, स्याही से, गीला निशान — एक बड़ा-सा हाथ का पंजा, और उसके नीचे लिखा हुआ: "रखवाले का नाम अब भी तेरे पास है।"

मैं उस लिखाई को देखती रही। रिया की आवाज़ दिमाग़ में गूँजी — "मेरा नाम तू मिटा।"

मैंने गाड़ी की तरफ़ देखा। रिया उतरकर हवेली की तरफ़ आ रही थी। मैंने हाथ उठाकर उसे रोका।

"रुक!"

वह रुकी। सुनीता भी उसके पीछे थी।

"अंदर मत आ।"

"पर माँ —"

"मेरी बात मान।"

वह रुकी, पर उसका चेहरा कह रहा था कि वह रुकेगी नहीं।

सुधा ने मेरे पास आकर कहा — "भैरों अंदर है। मुझे उसकी आवाज़ आ रही है। नीचे। बहुत नीचे।"

"पीछे की तरफ़?"

"हाँ।"

हम वापस अंदर गए, पीछे के रास्ते से। सुधा कह रही थी — "अब मेरा नाम पूरा है, मैं इस हवेली में कहीं भी जा सकती हूँ। और मैं अंदर से ताले खोल सकती हूँ, अगर मैंने उन्हें कभी बंद किया हो।"

पीछे लोहे का छोटा दरवाज़ा था। सुधा ने अपना हाथ उस पर रखा, और ताला अपने आप खुल गया — जैसे उसने हाँ कह दी हो।

अंदर से ठंडी हवा आई और स्याही की महक — यह अलग थी, कुछ मीठी, पुरानी गोंद जैसी। यह महक मैं जानती थी।

नीचे सीढ़ियाँ जाती थीं। हम उतरे। बीच में जगह-जगह पर स्याही के छींटे थे। आख़िर में एक कमरा — चौड़ा, पत्थर का। बीच में पानी, कुएँ के किनारे।

और कुएँ के किनारे पर भैरों बैठा था। सिर झुका, हाथ में कुछ पकड़े।

"भैरों!"

उसने सिर उठाया। उसके चेहरे पर कोई निशान नहीं था। हाथ में एक टीन का छोटा डिब्बा था।

"तुमने यह क्यों किया?" मैंने पूछा।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho