A Dark Secret – Chapter 369
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रिया ने कहा था — "वह छोटी है, मेरे जितनी। और वह मुस्कुरा रही है।" मैंने गाड़ी वहीं रोक दी, हवेली से आधी गली आगे।
"दोबारा देख।"
रिया ने खिड़की से गर्दन निकाली। पीछे हवेली की बत्तियाँ जल-बुझ रही थीं, जैसे कोई हाथ स्विच पर बार-बार फेरा दे रहा हो।
"अब नहीं," रिया ने कहा। "पर वह मुस्कुरा रही थी, माँ। सच में।"
सुधा पीछे की सीट पर बैठी थी। उसने कुछ देर उस खिड़की को देखा, फिर बोली — "बत्तियाँ भीतर से जल रही हैं। मतलब कोई अंदर है जो उन्हें छू नहीं रहा होगा।"
"काजल?"
"काजल अपनी गाड़ी में बैठी थी।"
मैंने एम्बुलेंस को पीछे मोड़ा। सुनीता ने पीछे से कहा — "मैं नहीं जाऊँगी अंदर। मुझे घर छोड़ दे। अठारह साल से मैं उस हवेली की छाया भी नहीं देखना चाहती।"
"तेरा घर पड़ाव गली में है," मैंने कहा। "वहीं तो तू अठारह साल से बंद थी।"
"नहीं," सुनीता ने कहा। "मेरा घर शांति विहार में था। छोटा मकान, पीली छत। मैं चली जाऊँगी अगर तू पूछे। बस उस हवेली के सामने से निकलना मुझसे नहीं होगा।"
मैंने गाड़ी रोकी, सुनीता को उतारा। रिया भी उतरने लगी।
"तू गाड़ी में बैठ।"
"माँ —"
"मैं अकेली जाऊँगी। तू सुनीता के साथ रुक। दस मिनट।"
रिया ने मुँह बनाया, पर बैठ गई। सुधा उतरी। "मैं चलूँगी साथ। मुझे कोई देख नहीं सकता, पर मैं सुन सकती हूँ।"
हम दोनों हवेली की तरफ़ चले। गली खाली थी। हवेली का मुख्य दरवाज़ा खुला था, आधा। अंदर से स्याही की महक ऐसी आ रही थी जैसे किसी ने पूरी बोतल फर्श पर फेंक दी हो।
मैंने दरवाज़ा धक्का दिया। पहला कमरा। तीन पीढ़ियों की तस्वीरें दीवार पर टेढ़ी-मेढ़ी, कुछ ज़मीन पर गिरी हुई। कोने में तिजोरी खुली थी, उसका दरवाज़ा झूल रहा था। अंदर नक़ली रजिस्टर पड़ा था — फटा, पन्ने बिखरे, कोई पन्ना पैर के नीचे, कोई तिजोरी के किनारे पर।
मैंने झुककर एक पन्ना उठाया। स्याही उभरी हुई थी, गीली, जैसे अभी लिखी गई हो। उस पर एक नाम था — "काजल हरनाम"। पर वह कटा हुआ था, बीच से एक लकीर खिंची हुई।
"यह तो मैंने नहीं किया," काजल की आवाज़ पीछे से आई।
वह दरवाज़े पर खड़ी थी। उसका चेहरा पसीने में था, शर्ट पर स्याही के छींटे। वह अपने हाथ उठाकर दिखाने लगी।
"मैं अभी गाड़ी से उतरी हूँ। यह सब पहले से है।"
"यहाँ कोई और था?"
"मैं क्या जानूँ?" काजल ने कहा। आवाज़ में वह मिठास नहीं थी। थकान थी। "अब इस हवेली में कुछ भी मेरे हुक्म से नहीं होता। तुझे पता है। तूने रजिस्टर ले लिया।"
"मैंने नहीं लिया। रिया के हाथ में अब वह ख़ुद आया।"
काजल ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, फिर बंद कर दिया। उसकी नज़र फर्श पर पड़ी।
"वह क्या है?"
मैंने देखा। फर्श पर पीली स्याही के पदचिह्न थे — नंगे पैरों के निशान, छोटे। बच्चे के पैरों जितने। और वे तिजोरी से शुरू होकर मुड़ते थे, दूसरे कमरे की तरफ़।
"उन्हें मत छूना," सुधा ने कहा। "वह स्याही नहीं है। वह निशान है।"
"किसका?"
"जिसने ख़ुद को रजिस्टर में लिखा हो, ग़लत तरीक़े से।"
काजल ने एक कदम पीछे लिया। "वह तो मर चुका है।"
"कौन?"
"मेरा दादा।"
मैंने काजल की तरफ़ देखा। उसका चेहरा अब साफ़ दिख रहा था, और उस पर वह डर था जो पहले कभी नहीं दिखा था।
"पदचिह्न बच्चे के हैं," मैंने कहा।
"मुझे नहीं पता," काजल ने कहा। "पर मेरे दादा की बात कभी किसी ने नहीं मानी, और वह बच्चों के कद के आदमी थे। नाटे।"
सुधा ने कहा — "चल।"
हम पदचिह्नों के पीछे चले। वे दूसरे कमरे में गए, फिर तीसरे में, फिर उस लंबे कमरे में जहाँ दीवार पर सिर्फ़ एक तस्वीर लटकी थी — बाबू हरनाम सिंह की। वह तस्वीर अब टेढ़ी थी। और उसके नीचे, लकड़ी की मेज़ पर, एक पुराना टेप रिकॉर्डर रखा था — चल रहा था। रील घूम रही थी, हल्की सी आवाज़ कर रही थी — खुर-खुर।
मैंने रिकॉर्डर के पास हाथ बढ़ाया। सुधा ने रोका — "सुन ले पहले।"
आवाज़ आई। पुरानी, रिकॉर्डिंग में घुली हुई, पर साफ़। बाबू हरनाम की आवाज़ थी — मीठी नहीं, हुक्म वाली।
"पहला नियम," आवाज़ बोली। "रखवाला वही जो रजिस्टर में अपना नाम ख़ुद लिखे। दूसरा — रखवाला जो बने, वह अपना नाम मिटाएगा। तीसरा — जो मिटाएगा, उसे कोई याद नहीं रखेगा।"
टेप रुका। फिर खुर-खुर, और आवाज़ फिर आई — "चौथा, और यह सबसे ज़रूरी है। रखवाला चाहे तो किसी और का नाम भी मिटा सकता है। पर वह अपना नहीं बचा सकता।"
काजल की साँस तेज़ हुई। "झूठ कह रहा है," वह बोली। "मैंने कभी अपना नाम नहीं लिखा।"
"तो तू रखवाला नहीं थी," सुधा ने कहा। "तू सिर्फ़ रजिस्टर को पकड़कर बैठी थी। रखवाला तो यह रजिस्टर ख़ुद चुन रहा है — और उसने रिया को चुन लिया।"
टेप फिर अपने आप बजी।
"आख़िरी बात," बाबू हरनाम की आवाज़ आई, और अब वह हल्की हो गई थी, जैसे कोई थककर आख़िरी लाइन बोल रहा हो। "जो रखवाले को इस सौदे से अलग करना चाहे, उसे वह नाम बोलना होगा जो सबसे पुराना है। चालीस साल पुराना। वह पन्ना जो आधा खाली है और आधा लिखा। उसे पूरा बोलने से एक पन्ना ख़ाली होगा।"
टेप रुकी। मैंने रिकॉर्डर बंद कर दिया।
कमरे में सन्नाटा था। नहीं, सन्नाटा नहीं था — बाहर से हवा आ रही थी खुले दरवाज़े से और काग़ज़ों को हिला रही थी। कुछ सरसराता रहा था।
काजल ने धीरे से कहा — "वह पन्ना… वह मेरे दादा की बेटी का है। सुधा का।"
सुधा ने कहा — "हाँ। मेरा।"
मैंने रिया की तरफ़ देखा जो अब भी गाड़ी में थी और अंदर आने के लिए बेचैन थी। और मुझे समझ आया कि टेप का मतलब क्या है। रजिस्टर में सुधा का नाम आधा है — "सुधा" लिखा है, "हरनाम" नहीं। अगर मैं उसका पूरा नाम बोल दूँ — नाम, गली, आवाज़ — तो वह पन्ना ख़ाली हो जाएगा। और अगर वह पन्ना ख़ाली हुआ, तो रजिस्टर का वह हिस्सा जो रखवाले को बाँधता है, ढीला पड़ेगा।
"रामदीन ने यह नहीं बताया," मैंने कहा।
"रामदीन को नहीं पता," सुधा ने कहा। "वह टेप मैंने सुनी थी — चालीस साल पहले, एक बार। बाबू हरनाम ने मुझे ही सुनाई थी, जब मैंने रजिस्टर छिपाया था। वह जानता था कि मैं सबसे पहले वही नाम बोलूँगी जो उसे सबसे ज़्यादा डराता था — अपना नाम।"
"फिर तूने क्यों नहीं बोला?"
"क्योंकि मुझे अपनी गली याद नहीं थी," सुधा ने कहा। "वह मिट गई थी। मेरी आवाज़ याद नहीं थी। बीस साल तक मैं अपनी ही आवाज़ नहीं सुन पाई। सिर्फ़ नाम याद था।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें अब साफ़ थीं — माँ की आँखें। मैंने पहली बार ध्यान दिया कि उसकी आवाज़ में एक हल्की-सी खुरदराहट है, ठीक वैसी जैसी माँ की आवाज़ में थी जब वह सुबह-सुबह मुझे उठाती थी।
"मुझे तेरी आवाज़ पता है," मैंने कहा।
"कैसे?"
"क्योंकि वह माँ जैसी है।"
सुधा कुछ देर चुप रही। काजल ने बीच में कहा — "तो अब क्या? रजिस्टर तो अब रिया के पास है।"
"रजिस्टर रिया के पास है, पर पन्ना वही है," सुधा ने कहा। "अगर मेरा नाम पूरा बोला गया, तो रखवाले की जंज़ीर में एक कड़ी टूटेगी। और अगर रिया ने ख़ुद को रखवाला लिखा है, तो उसे छोड़ना आसान हो जाएगा।"
"आसान। मतलब?"
"मतलब — रजिस्टर उसे छोड़ सकता है। बिना उसे मिटाए।"
काजल ने तेज़ी से कहा — "यह मुमकिन नहीं। रखवाला जो बनता है, वह जाता नहीं।"
"तू गई थी?" सुधा ने पूछा।
काजल चुप हो गई।
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