A Dark Secret – Chapter 368
"नहीं।" काजल ने सिर उठाया। "मुझे किसी ने नहीं बताया। मैंने सोचा—"
"तूने सोचा कुछ नहीं," सुधा ने कहा। "तूने बस दादा जी की बात मानी। चालीस साल यही किया।"
काजल कुछ नहीं बोली।
मैंने सुनीता की तरफ़ देखा। उसने टीन का टुकड़ा चारपाई पर रख दिया।
"मेरा पूरा नाम बोल," उसने कहा। "मुझे अपना घर जाना है।"
मैंने काग़ज़ याद किया। "सुनीता चौहान। पड़ाव गली। टीन के टुकड़े जैसी आवाज़।"
मेरी आवाज़ में कोई ज़ोर नहीं था। कमरे में कुछ नहीं हुआ।
"फिर बोल," सुनीता ने कहा। "अबकी बार सोचकर।"
मैंने रिया की तरफ़ देखा। उसने आँखें बंद कर लीं और सुनीता की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
"माँ," उसने कहा। "उसका चेहरा देख।"
मैंने सुनीता की तरफ़ देखा। सफ़ेद बाल, झुकी कमर, टीन का टुकड़ा। पर कुछ और भी था — कमरे की दीवार पर, ईंटों के बीच, एक तस्वीर टँगी थी जो अभी तक मैंने नहीं देखी थी। छोटी, फटी तस्वीर — एक औरत जवान, साड़ी पहने, हाथ में टीन का टुकड़ा, मुस्कुराती हुई। वही सुनीता थी, तीस साल पहले की।
मैंने एक और बार बोला —
"सुनीता चौहान। पड़ाव गली। टीन के टुकड़े जैसी आवाज़।"
और इस बार मैंने उसका चेहरा याद रखा — वह जवान चेहरा तस्वीर वाला।
स्याही की महक कमरे में भर गई। सुनीता के होंठ हिले।
"सुनीता," उसने कहा, जैसे अपना नाम पहली बार सुन रही हो। "सुनीता चौहान।"
उसने आँखें ऊपर कीं। देखा। मेरी तरफ़।
"मुझे याद है," उसने कहा। "मेरा एक बेटा है। वह पुणे में रहता है। मेरा एक घर है। वह इसी गली में था।"
काजल ने मुँह फेर लिया।
कमरे की दीवार पर, ईंटों पर, स्याही उभरी — "सुनीता चौहान।" और उसके नीचे तारीख़, पुरानी, कटी हुई, जो अब भर रही थी।
"हो गया," सुधा ने धीरे कहा।
मैंने काजल की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर उस वक़्त कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — दर्द।
"काजल," मैंने कहा।
वह मेरी तरफ़ मुड़ी। "क्या?"
"तेरा नाम। तेरा पूरा नाम। बोल।"
वह खड़ी रही। ज़मीन देखी।
"मुझे याद है," उसने कहा, धीमी आवाज़ में। "काजल हरनाम। मैं हरनाम हवेली में रहती हूँ।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"पर…" उसने आँखें मलीं। "पर मुझे याद नहीं आता कि मेरी माँ कैसी दिखती थी। यह मैं भूल रही हूँ।"
सुधा ने कुछ कहा नहीं।
मैंने सुनीता की तरफ़ देखा। वह चारपाई से उठ रही थी, धीरे-धीरे, जैसे सालों बाद पहली बार खड़ी हो रही हो।
"मेरा घर," उसने कहा। "क्या वह अभी भी है?"
ना। यह मत बताना। उसका घर तोड़ा जा चुका है। मैं रुकी।
"हम तुझे ऊपर ले चलते हैं," मैंने कहा।
"पहले घर।"
"ऊपर जाकर देख लेना।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू मुझसे झूठ बोल रही है।"
"हाँ," मैंने कहा।
वह हँसी। फिर बोली, "अच्छा किया। झूठ बोलने वाले ही ज़िंदा रखते हैं।"
हम ऊपर आए। नीम के नीचे खड़े रहे। सुनीता ने गली देखी — टूटी ईंटें, झाड़ियाँ, खाली ज़मीन। उसने आँखें बंद नहीं कीं। देखती रही।
काजल कुछ दूर खड़ी थी, अकेली।
रिया उसके पास गई। मैंने रोका नहीं।
रिया ने कुछ कहा — मुझे नहीं सुनाई दिया। काजल ने मुँह फेरा, फिर रिया की तरफ़ देखा। फिर उसने अपना हाथ बढ़ाया, और रिया ने उसे पकड़ लिया।
मेरे कान में सुधा की आवाज़ आई — "तेरी बेटी तुझसे बहादुर है।"
"पता है," मैंने कहा।
फिर मैंने नोटबुक जेब से निकाली और भैरों से कहा, "तू अंदर जा। ढक्कन बंद कर। और सुन — काजल से कह दे कि वह अपनी गाड़ी से हवेली लौटे। मैं अब उसके साथ नहीं जा रही।"
भैरों ने कुछ कहा नहीं। वह गया।
मैंने नोटबुक खोली। सुनीता चौहान के नाम के नीचे — जो अब पूरा उभर आया था — एक लाइन और जुड़ गई थी। "आठवाँ नाम — बाक़ी चार।"
मैंने सोचा — आठ नाम हो गए? मैंने सिर्फ़ एक बोला था। फिर समझी — हवेली में काजल का नाम भी तो उतरना शुरू हुआ था, और वह अब नोटबुक में दर्ज हो गया था।
मैंने पन्ना पलटा।
आख़िरी पन्ने पर, नई स्याही में, एक और लाइन उभर रही थी — बहुत हल्की, जैसे अभी सूख नहीं रही —
"जो नाम तू आज बोलेगी, वह तुझे कल बोलेगा।"
मैंने नोटबुक बंद की।
गाड़ी की तरफ़ बढ़ी। रिया और सुनीता पीछे आए।
सुधा ने रास्ता रोका। "मीरा।"
"हाँ।"
"सुनीता का नाम पूरा हुआ। पर याद रख — रजिस्टर ने तुझे कुछ दिया नहीं है आज रात। उसने सिर्फ़ थोड़ा रुककर देखा है। वह तेरी बेटी का है, और वह उसे छोड़ेगा नहीं।"
"पता है।"
"फिर भी जा रही है?"
"हाँ।"
"क्यों?"
मैंने सुधा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा अब भी धुँधला था, पर आँखों के आसपास कुछ साफ़ हो रहा था — माँ जैसा। मेरी माँ जैसा।
"क्योंकि तूने पूछा," मैंने कहा। "मेरा पूरा नाम सुधा जोशी है — मैं तेरी माँ की सगी बहन हूँ।"
सुधा रुकी। आँखें नम नहीं हुईं। बस कुछ बदला।
"बीस साल बाद," उसने कहा। "यह नाम पहली बार किसी ने बोला।"
"अब बोलूँगी," मैंने कहा। "हर रोज़। जब तक नाम साथ रहे।"
सुधा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ गरम थीं। फिर उसने रिया का सिर छुआ।
"अब आगे बढ़," उसने कहा। "अगला नाम बाक़ी है।"
मैंने गाड़ी स्टार्ट की। सुनीता पीछे बैठी थी, मेरी वर्दी को हाथ लगाकर दुबारा-दुबारा देख रही थी। रिया उसके पास बैठी थी। मैंने पीछे देखा — काजल अपनी गाड़ी में बैठ रही थी, और उसका चेहरा अँधेरे में छिप रहा था।
मैंने गाड़ी आगे बढ़ाई।
नोटबुक डैशबोर्ड पर रखी थी। उसका पन्ना खुला रह गया था।
मैंने रिया की तरफ़ देखा — वह सुनीता की तरफ़ झुककर कुछ पूछ रही थी।
मैंने एक हाथ से नोटबुक उठाई और उसे बंद किया। मेरी नज़र आख़िरी लाइन पर पड़ी, स्याही में, जो अब सूख रही थी —
"चार नाम बाक़ी हैं। और चौथा तेरा है, मीरा जोशी।"
मैंने नोटबुक सीट पर रख दी और खिड़की खोल दी। बाहर की हवा आई, ठंडी नहीं। रात अब भी रात थी, पर सुबह की महक कहीं दूर से आ रही थी।
सुनीता ने अचानक कहा — "मीरा।"
"हाँ?"
"तूने मेरा नाम बोला। अब मैं तेरा बोलूँगी?"
"क्या मतलब?"
"जो नाम तू आज बोलेगी, वह तुझे कल बोलेगा," सुनीता ने कहा, जैसे यह कोई पुरानी कहावत हो। "यह काग़ज़ पर लिखा है। और मैंने इसे पहले भी सुना है — चालीस साल पहले। जब मेरा नाम लिखवाया गया था।"
मैंने गाड़ी धीमी की।
"किसने कहा था?"
"उस औरत ने," सुनीता ने कहा। "जो हवेली के नीचे रहती है। सरोज।"
मैंने रिया की तरफ़ देखा। रिया ने मेरी तरफ़ देखा।
"माँ," रिया ने कहा। "चौथा नाम तेरा है। अगर तूने मेरा नाम बचाया, तो चौथा नाम क्यों नहीं बचा सकती?"
मैंने गाड़ी फिर से स्टार्ट की।
"चल," मैंने कहा। "पहले सरोज से मिलते हैं। वह हमें वह बताएगी जो रामदीन ने नहीं बताया।"
गाड़ी मुड़ी, और पीछे हवेली की बत्तियाँ फिर दिखीं — इस बार कुछ जल रही थीं, कुछ बुझी हुई। और उनके बीच, एक खिड़की में, एक परछाई खड़ी थी — काजल की नहीं, किसी और की। जिसका चेहरा मैंने अभी देखा नहीं था।
रिया ने खिड़की से बाहर देखा और धीरे बोली — "माँ, वहाँ कोई है।"
"कौन?"
"मुझे नहीं पता," रिया ने कहा। "पर वह हाथ हिला रही है।"
मैंने देखा — पर खिड़की खाली थी।
रिया ने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा।
"वह छोटी है," रिया ने कहा। "मेरे जितनी। और वह मुस्कुरा रही है।"
मेरे हाथ स्टीयरिंग पर जम गए।
कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई थी। वह अभी शुरू हो रही थी — और इस बार, पहला नाम जो बोला जाएगा, वह मेरा होगा।
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