A Dark Secret – Chapter 367
"तो चल," मैंने कहा। "पर सुन ले। रास्ते में अगर तूने एक बार भी मेरी बेटी की तरफ़ आँख उठाई, तो तेरा नाम तेरे पास कभी नहीं आएगा।"
काजल ने रिया की तरफ़ देखा। रिया ने उससे नज़र नहीं हटाई।
"मैं तेरी बेटी से डरती हूँ," काजल ने कहा। "कभी नहीं डरी किसी से। पहली बार।"
"तो ठीक है," मैंने कहा। "चल।"
पड़ाव गली तक का रास्ता पंद्रह मिनट का था, पर मैंने गाड़ी धीमी रखी। सुनीता चौहान का नाम बोलने के लिए तैयारी चाहिए थी — सिर्फ़ मन की नहीं। काग़ज़ की नहीं। कानों की।
रामदीन का फोन आया।
"मीरा," उसकी आवाज़ भारी थी। "मैं स्टोर में बैठा हूँ। काजल के पास जो काग़ज़ तूने देखा — भैरों वाला — वह सच है। मैंने उसे पढ़ा है। रजिस्टर ने रिया का नाम अपने आप पूरा किया।"
"तुझे कैसे पता?"
"क्योंकि मेरे हाथ की रेखा बदल गई है," रामदीन ने कहा। "आज रात शौचालय के पीछे वाली दीवार पर रिया का नाम उभरा मिला — पूरा। मैंने उसे पोंछा, फिर उभरा। वह अब रखवाला है।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"मीरा? सुन रही है?"
"सुन रही हूँ," मैंने कहा।
"टेप वाली बात सच है," रामदीन ने कहा। "रखवाले को अपना नाम मिटाना पड़ेगा। यह मैं चालीस साल पहले भी जानता था। पर जब सुधा का नाम मिटा, तब मैंने टेप में यह पंक्ति सुनी और सोचा — काश मैं रखवाला होता। मैं अपना नाम मिटा देता। पर तब मेरा नाम रजिस्टर में था ही नहीं।"
"तो अब क्या?"
"अब तू रास्ता निकाल," रामदीन ने कहा। "तू वहाँ है जहाँ मैं चालीस साल पहले था। और तेरे पास रिया है। इसलिए तू रुकेगी नहीं।"
"मुझे सुनीता की आवाज़ चाहिए," मैंने कहा।
"तो कान खुले रख। और एक बात — काजल को अपने साथ ले गई, तो टीन का टुकड़ा उसे मत छूने दे। वह काग़ज़ भी गवाही वाला है। जिसके हाथ में आए, वह बोलेगा तो उसी की आवाज़ लगेगी।"
"समझ गई।"
फोन कटा।
पड़ाव गली का मोड़ आया। नीम का पेड़ अब भी वहीं था — पुराना, झुका हुआ, जड़ों में पत्थर जमे हुए। गली में एक बत्ती जल रही थी, दूसरी बुझी हुई। मैंने गाड़ी रोकी। भैरों और काजल पीछे आकर रुके।
मैंने नीम के नीचे देखा। टीन का टुकड़ा वहीं पड़ा था — ज़ंग लगा, कोना मुड़ा हुआ। नीचे काग़ज़ नहीं था। माँ की लिखाई वाला काग़ज़ हम पहले ही उठा चुके थे।
"अब क्या?" रिया ने पूछा।
"सुन," मैंने कहा। "आवाज़ सुन।"
रिया ने आँखें बंद कीं।
"टीन," उसने धीरे कहा। "टीन बज रहा है। जैसे कोई छत पर… छत पर टीन—"
"कौन बजा रहा है?"
"कोई नहीं।" रिया की आवाज़ बदली। "हवा। हवा से टीन बज रहा है। वह बाहर नहीं है, माँ। वह घर के अंदर है। बाहर से आवाज़ आ रही है, पर वह अंदर है।"
"कौन सा घर?"
रिया ने आँखें खोलीं। "यहीं। इसी गली में। पर गली में घर नहीं हैं।"
वह सही कह रही थी। पड़ाव गली अब सिर्फ़ चारदीवारी और पीछे की तरफ़ बनी नई कॉलोनी के पीछे वाली खाली ज़मीन थी। मिट्टी, टूटी ईंटें, कुछ झाड़ियाँ। पुराने मकान कब के टूट चुके थे।
"फिर घर कहाँ है?" काजल ने कहा।
"नीचे," सुधा ने कहा। वह गाड़ी से उतर आई थी, पत्थर की तरफ़ चल रही थी। "पड़ाव गली के मकान उस वक़्त ज़मीन के अंदर बनाए गए थे। पानी नीचे था, इसलिए ऊपर बनाया। जब नई कॉलोनी बनी, उन्होंने ऊपर वाले मकान तोड़े, नीचे वाले रहने दिए। ऊपर से ज़मीन भर दी। कुछ मकान अब भी नीचे हैं।"
"तो सुनीता उनमें से एक में है," मैंने कहा।
"हाँ।"
मैंने चारों तरफ़ देखा। ज़मीन कहाँ खोदी जाए, यह पता करने का कोई तरीक़ा नहीं था।
तभी रिया बोली — "माँ, यहाँ आ।"
वह गली के आख़िर में चली गई थी। वहाँ मिट्टी में एक गोल सा निशान था — गड्ढा, जिसमें ज़ंग लगा लोहे का ढक्कन दबा था। रिया ने उसे हाथ लगाया, और ढक्कन का किनारा हिला।
"हम इसे खोल नहीं सकते," मैंने कहा। "भारी होगा।"
"मैं खोल सकती हूँ," सुधा ने कहा। "मेरा नाम काग़ज़ पर नहीं है। मेरा हाथ वज़न नहीं उठाता, पर ढक्कन वह नहीं जो वज़न से बंद है।"
वह ढक्कन के पास झुकी, हाथ रखा। ढक्कन से स्याही की महक उठी, तेज़, गाढ़ी।
फिर ढक्कन अंदर की तरफ़ खुल गया — बिना आवाज़।
अंदर अँधेरा था। सीढ़ियाँ नहीं थीं। बस एक सुराख़, और नीचे मिट्टी की सतह थी जो ढक्कन से कुछ फुट नीचे थी।
"उतरना पड़ेगा," सुधा ने कहा। "पर सुन मीरा — नाम बोलने के लिए सिर्फ़ नाम काफ़ी नहीं। तेरे पास उसकी गली, उसकी आवाज़, और उसका चेहरा — तीनों चाहिए। इन तीनों के बिना बोलेगी तो नाम फिर मिट जाएगा, जैसे पिछली बार।"
"चेहरा?" मैंने पूछा। "मैंने सुनीता को कभी देखा ही नहीं।"
"देखा है," सुधा ने कहा। "अस्पताल की पुरानी फाइल में उसकी तस्वीर थी। जो तूने नहीं देखी, वह कोई और देखेगा।" उसने काजल की तरफ़ देखा।
काजल ने मुँह फेरा। "मुझे सुनीता याद नहीं।"
"याद नहीं, पर जानती है," सुधा ने कहा। "तूने उसे रजिस्टर में लिखवाया था। तेरी लिखाई का निशान उस पर है।"
काजल ने ग़ुस्से से देखा।
"तुम मुझसे सब करवाओगी," उसने कहा।
"हाँ," सुधा ने कहा।
मैं पहले उतरी। रिया मेरे पीछे। सुधा ऊपर रुकी, फिर नीचे आई — उसके पैर मिट्टी पर पड़ते थे, पर निशान नहीं छोड़ते थे।
नीचे एक कमरा था। चारदीवारी ईंट की, छत टीन की, और कोने में एक चारपाई। चारपाई पर एक औरत बैठी थी — सफ़ेद बाल, झुकी हुई कमर, हाथ में टीन का टुकड़ा। वह उसे बजा रही थी, बहुत धीरे, जैसे सोते बच्चे को सुलाने के लिए।
वह रुकी। सिर उठाया।
"तू फिर आई," उसने कहा। "मैंने कहा था, मत आ। हर बार तू आती है, और हर बार मैं एक दिन और भूल जाती हूँ।"
मैंने देखा — उसकी आँखों के नीचे काले घेरे, होंठ सूखे। उसने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैं उसे पहले से जानती हूँ।
"मैं पहली बार आई हूँ," मैंने कहा।
वह हँसी — छोटी हँसी, जिसमें दाँत नज़र आए। "तू हर बार यही कहती है। फिर तू मेरा नाम बोलती है, कुछ देर सब ठीक रहता है, फिर मैं भूल जाती हूँ।"
"कितने दिन से?"
"किसको याद है?" उसने कहा। "जब से काजल के दादा का रजिस्टर आया था। उस वक़्त यह गली ज़िंदा थी।"
काजल नीचे उतरी। उसने सुनीता को देखा और उसका कदम रुक गया।
"तू," सुनीता ने कहा। "तू तो बड़ी हो गई। काजल। हरनाम की लड़की।"
काजल ने कुछ नहीं कहा।
"तू मेरी सास थी," सुनीता ने कहा। "नहीं?"
"क्या?" काजल ने पूछा।
"तूने मेरा नाम लिखवाया था," सुनीता ने कहा। "मेरे बेटे के साथ शादी तय हुई थी। तेरे पास आई थी। तूने कहा था — रजिस्टर में नाम लिखवाना पड़ेगा।"
काजल का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"मैंने नहीं—"
"तूने लिखवाया," सुनीता ने कहा। "तेरे दादा ने बोला था। तू बस बोली थी — अच्छा है, इससे घर मिल जाएगा।"
कुछ पल कमरे में टीन की आवाज़ भी बंद हो गई।
सुधा ने आगे आकर कहा, "सुनीता चौहान — पड़ाव गली — टीन के टुकड़े जैसी आवाज़।"
सुनीता ने सुधा को देखा। उसकी आँखें फैलीं।
"तू भी," उसने कहा। "तू भी यहीं रहती है?"
"मैं नीचे हूँ," सुधा ने कहा। "हवेली के।"
सुनीता का हाथ रुका।
मैंने काजल की तरफ़ देखा। "तूने उसे लिखवाया था?"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। फिर रिया की तरफ़। फिर ज़मीन की तरफ़।
"मैं उस वक़्त अठारह की थी," उसने कहा। "दादा जी ने बोला था। मैंने सवाल नहीं पूछा।"
"तुझे पता था कि उसका नाम मिटेगा?"
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