A Dark Secret – Chapter 366
"मैं साथ चलूँगी," उसने कहा।
"तू तो अभी गई थी।"
"मैं कहीं नहीं गई थी," सुधा ने कहा। "मैं बस तेरी आँखों से छिप गई थी। अभी तक भी मुझे पूरी तरह कोई नहीं देख सकता। पर सुन सकते हैं। जब तक मेरा नाम पूरा है, मैं चल सकती हूँ, बोल सकती हूँ।"
"और तेरा नाम कितने दिन पूरा रहेगा?"
सुधा ने कोई जवाब नहीं दिया। बस बाहर चल दी।
एम्बुलेंस में हम तीन बैठे — मैं, रिया, सुधा पीछे स्ट्रेचर पर। भैरों अपनी गाड़ी से पीछे-पीछे आ रहा था। रात के दो बज रहे थे। सड़कें खाली थीं, बाज़ार बंद था, बस स्टैंड पर एक कुत्ता सो रहा था।
तुलसी चौक पुराने बाज़ार के बीच में है। चारों तरफ़ पुरानी दुकानें, बीच में पीपल का पेड़, और उसके नीचे पत्थर की गोल परिक्रमा। जब मैं छोटी थी, माँ मुझे यहाँ लाती थी। कहती थी — इस पेड़ के नीचे माँगो, पूरी होती है।
कभी नहीं माँगा था। अब सोच रही हूँ, शायद माँगना चाहिए था।
गाड़ी रोकी। चौक पर एक ही बत्ती जल रही थी — चाय के ठेले की। ठेले के पास एक कुर्सी रखी थी, और उस कुर्सी पर काजल हरनाम बैठी थी।
वह काजल नहीं लग रही थी।
बाल बिखरे हुए, पाउडर नहीं, सलवटें साफ़ कपड़ों में भी। हाथ में एक कप चाय, ठंडी हो चुकी। और उसकी गोद में — मेरी नोटबुक।
वही नोटबुक जो हवेली में छूट गई थी। जिसमें बारह नाम लिखे थे।
मैंने गाड़ी का दरवाज़ा खोला और नीचे उतरी। रिया मेरे पीछे आई। सुधा गाड़ी में ही बैठी रही — पर उसकी आवाज़ मेरे कान के पास आई, धीमी — "सामने मत खड़ी हो। काजल के पास अब कुछ नहीं बचा, और जिसके पास कुछ न बचे, वह सबसे ज़्यादा ख़तरनाक होता है।"
काजल ने सिर उठाया।
"मीरा," उसने कहा। आवाज़ रूखी थी। मीठी नहीं।
"मेरी नोटबुक वापस कर।"
"मैंने उठाई नहीं थी," काजल ने कहा। "यह मेरे पास आई। जब मैं ऊपर के कमरे में गई, यह मेज़ पर रखी थी। मैंने नहीं रखी थी।"
"तो किसने रखी?"
"यही तो समझने की कोशिश कर रही हूँ।" काजल ने चाय का कप नीचे रखा। "रजिस्टर से जो काग़ज़ निकलते हैं, वे ख़ुद अपनी जगह चुन लेते हैं। तेरी नोटबुक अब उससे जुड़ चुकी है। यह उसकी सूची बन गई है।"
मैंने हाथ बढ़ाया। "दे।"
"पहले एक बात सुन।"
"मैं तेरी बातें नहीं—"
"मेरा नाम आधा हो गया है," काजल ने कहा।
मैं रुक गई।
"कल रात से," वह बोली। "मैं अपनी फाइल में अपना नाम पढ़ती हूँ तो पहला आधा दिखता है, दूसरा धुँधला। मैंने मनोहर को बुलाया — वह भी नहीं पहचान पाया कि मैं कौन हूँ। उसने दो बार पूछा, 'आप किस साहब की तरफ़ से आई हैं?'"
वह हँसी। सूखी हँसी।
"चालीस साल मैंने यह रजिस्टर संभाला। और अब वह मुझे संभाल रहा है।"
"तो तूने मुझे क्यों बुलाया?" मैंने पूछा।
काजल ने नोटबुक उठाई और मेरी तरफ़ बढ़ाई। मैंने ले ली।
"क्योंकि मैं डर गई हूँ," उसने कहा। "पहली बार। यह डर अब मुझसे नहीं छिप रहा।"
मैंने नोटबुक खोली। बारह नाम वैसे ही थे — रामदीन की लिखाई में, पेंसिल से, और मेरी लिखाई में नीचे जोड़े गए। पर सबसे नीचे, नई स्याही में, एक नाम और उभरा हुआ था।
"सुधा।"
पूरा नाम नहीं था। बस दो अक्षर, और आगे जगह खाली।
मैंने काजल की तरफ़ देखा।
"तूने यह लिखा?"
"मैंने कहा न — कुछ नहीं लिखा।"
"तो किसने—"
"रजिस्टर," सुधा की आवाज़ आई, गाड़ी से। "यह सूची है। जो नाम मिटते हैं, वे यहाँ चढ़ जाते हैं। मेरा नाम मिटा — आधा। इसलिए यहाँ आधा आया।"
काजल ने सुधा की तरफ़ देखा। पहली बार उसके चेहरे पर कुछ और उभरा — पहचान।
"सुधा?" उसकी आवाज़ धीमी हुई। "सुधा हरनाम? मेरी बुआ?"
"तेरी बुआ," सुधा ने कहा। "और तेरे दादा ने मेरा नाम मिटा दिया था। ख़ुद। अपने हाथ से। तू उस वक़्त छोटी थी, शायद याद भी न हो।"
काजल कुर्सी से उठ खड़ी हुई। पत्थर की परिक्रमा तक पीछे हटी।
"मुझे याद है," उसने कहा। "एक औरत थी जो आती थी, मिठाई लाती थी। वह जब जाती, दादा जी का चेहरा बदल जाता।"
"वह मैं थी," सुधा ने कहा।
काजल ने मुँह फेर लिया। हाथ काँप रहे थे।
मैंने काग़ज़ भैरों से वापस लिया — रिया के नाम वाला काग़ज़ — और काजल की तरफ़ बढ़ाया।
"यह क्या है?"
"जो दिख रहा है," काजल ने कहा। "रजिस्टर ने रिया को रखवाला चुन लिया। इस रात, इसी वक़्त। मैंने नहीं चुना। भैरों ने नहीं चुना। रजिस्टर ने ख़ुद चुना।"
"ऐसा कैसे हो सकता है? रिया ने तो अपना नाम ख़ुद लिखा था—"
"और यही ग़लती थी," काजल ने कहा। "मैंने डरकर तुझसे कहा था कि अपना नाम ख़ुद लिखने से कोई नहीं खींच सकता। सच है। पर उसी नाम पर रजिस्टर का हक़ भी हो गया। जो अपना नाम ख़ुद लिखता है, वह ख़ुद को रजिस्टर को दे देता है।"
रिया ने मेरी कमीज़ पकड़ ली।
"माँ?"
"कुछ नहीं होगा," मैंने कहा। पर मेरी आवाज़ में ज़ोर नहीं था।
"कुछ नहीं होगा," काजल ने मेरी नक़ल में कहा। "सुनो, मीरा। मैंने अपने दादा की टेप सुनी है। वही टेप जो हवेली के पीछे वाले कमरे में रखी थी। मैंने पहली बार पूरी सुनी।"
"कब?"
"आज रात। जब मेरा नाम आधा होने लगा।" काज़ल ने मेरी तरफ़ देखा। "बाबू हरनाम ने टेप में कहा है कि सौदा तोड़ने का सिर्फ़ एक तरीक़ा है। रखवाले को ख़ुद अपना नाम मिटाना होगा।"
पीपल के पत्ते हिले। हवा नहीं थी, फिर भी पत्ते हिले। मैंने वह नहीं सोचा। मैंने बस कहा —
"नहीं।"
"मीरा—"
"नहीं। रिया का नाम नहीं मिटेगा।"
काजल मेरी तरफ़ एक क़दम बढ़ी। "तो फिर औरत का नाम मिटेगा। औरत का। रजिस्टर तेरा नाम भी माँगेगा। आज नहीं, पर माँगेगा। उसने मेरा माँगना शुरू कर दिया है।"
"तूने मेरा नाम नहीं माँगा था," मैंने कहा। "मैंने तेरे नाम नहीं लिखवाया था। यह सौदा मैंने किया ही नहीं था।"
"इसीलिए तो," काजल ने कहा, आवाज़ अब भी धीमी, पर तेज़। "तुझे कुछ नहीं देना पड़ा। तेरी माँ ने तेरा नाम बीस साल पहले लिख दिया था। मैंने नहीं लिखवाया। तेरी माँ ने लिखवाया। अब रजिस्टर तुझसे वसूल करेगा।"
"तो वसूल करे।" मैंने कहा। "पर रिया का नहीं।"
रिया ने मेरा हाथ छोड़ा। वह मेरे सामने आई, काजल के सामने।
"मेरा नाम तुम्हारे रजिस्टर में है," रिया ने कहा। "तो मेरी बात सुनो। मैंने अपना नाम अपने हाथ से लिखा था। अब मैं उसे अपने हाथ से बचाऊँगी भी।"
काजल ने उसकी तरफ़ देखा। कुछ पल चुप रही।
फिर वह हँसी — पहला असली मज़ाक भरा हुआ उसकी हँसी में। "तेरी बेटी तुझसे ज़्यादा समझती है।"
मैंने काजल के हाथ से नोटबुक खींच ली।
"यह मेरी है।"
"अब रजिस्टर की है।"
"तो तेरा भी कुछ नहीं रहा।" मैंने नोटबुक जेब में डाली। "सुन काजल — तूने कहा कि तू डर गई है। तो एक काम कर। मेरे साथ आ।"
"कहाँ?"
"सुनीता चौहान से मिलने। उसका नाम मिटा हुआ है। उसका पूरा नाम, गली, आवाज़ — रजिस्टर से निकल चुका है। अगर तू आएगी, तो तेरे हाथ में अभी भी रजिस्टर का हिस्सा है। तेरे बोलने से आधी ताक़त जुड़ जाएगी।"
काजल ने सुधा की तरफ़ देखा।
"वह जो भी कहे," सुधा ने कहा, आवाज़ अब भी ठंडी। "मैं तेरे साथ नहीं बैठूँगी। तेरे दादा ने मेरा नाम मिटाया। तूने चालीस साल उनका रास्ता नहीं छोड़ा। पर तूने अपनी बुआ का नाम एक बार नहीं पूछा।"
काजल का गला हिला। कुछ बोलने से पहले ही रुक गई।
फिर उसने कहा — "मैं इसलिए नहीं आ रही कि मैं अच्छी हूँ। मैं इसलिए आ रही हूँ कि मेरा नाम चला गया है। और मुझे वापस चाहिए।"
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