A Dark Secret – Chapter 365
भैरों ने एक पल के लिए रजिस्टर को देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर रजिस्टर को।
और उसने कुछ किया जो उसने कभी नहीं किया था — वह पीछे हट गया, दीवार से टिक गया, और बोला, "मैं नहीं छूऊँगा। मुझे नाम नहीं चाहिए।"
काजल की चीख ऊपर से आई, और उसके साथ काग़ज़ों की आवाज़।
रिया ने कलम उठाई। उसने रजिस्टर पर देखा — आधा "री" और नीचे पूरा नाम।
"मैं अपना पूरा नाम नहीं लिखूँगी," उसने कहा।
मेरा दिल धड़का। "रिया —"
"मैं रजिस्टर के नीचे वाला नाम नहीं मिटाऊँगी। मैं उसके ऊपर लिखूँगी। पूरा, अपने हाथ से। ताकि दोनों हो — रखवाला भी, और मैं भी।"
सुधा ने पलक नहीं झपकी। "हो सकता है। पर जल्दी। स्याही सूख रही है।"
रिया झुकी। कलम रजिस्टर पर टिकी। और उसने लिखा — "रिया जोशी, गली — वही जिसके पीछे आँगन है, आवाज़ — वह जो माँ को 'माँ' कहती है।"
काग़ज़ पर स्याही भागी। रजिस्टर हिला। फिर ठंडा हो गया। रिया उठी और उसके हाथ में रजिस्टर था — पूरा, भारी, और उसके नाम के नीचे सिर्फ़ उसका नाम था, साफ़, अपने हाथ की लिखाई में।
सुधा ने एक लंबी साँस ली। और फिर वह हँसी — इस बार पूरी, आधी राहत, आधी थकान।
"चालीस साल," वह बोली। "चालीस साल में पहली बार मैंने किसी को अपना नाम ख़ुद लिखते देखा।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। "तेरी बेटी ने जो किया, वह मैं नहीं कर पाई। तेरी माँ नहीं कर पाई। पर उसने किया।"
वह दीवार की तरफ़ मुड़ी। "अब मैं जा सकती हूँ।"
"रुक," मैंने कहा। "तूने कहा था — माँ ने आख़िरी बार कुछ लिखा था।"
सुधा रुकी। उसने अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला — मुड़ा हुआ, पीला, फटा। "यह मुझे आठ दिन पहले मिला," उसने कहा। "किसी ने हवेली की खिड़की से फेंका था। मैंने पहले सोचा कि कोई मज़ाक है। पर यह तेरी माँ की लिखाई है।"
मैंने काग़ज़ खोला। उसमें सिर्फ़ एक लाइन थी, काँपते हाथ से —
"मीरा को बताना — नाम अकेला मत बोलना। नाम के साथ चेहरा बोलना। चेहरा याद रखने से नाम नहीं खिंचता।"
मैंने काग़ज़ रिया को दिया। उसने पढ़ा, और उसकी आँखें भर आईं।
तभी ऊपर से काजल की आवाज़ आई — अब चीख नहीं, बस एक टूटी हुई आवाज़, जैसे कोई दीवार से बात कर रहा हो। "भैरों! भैरों, मेरा नाम — मुझे मेरा नाम याद नहीं आ रहा —"
भैरों ने ऊपर देखा। उसके चेहरे पर कुछ बदला।
"मैडम?" वह बोला।
जवाब नहीं आया।
सुधा ने धीरे से कहा, "रजिस्टर ने पहला क़दम उठा लिया। काजल का नाम भी अब उतरने लगा है। जो उसने चालीस साल किया, वही उसके साथ हो रहा है।"
रिया ने रजिस्टर अपनी छाती से लगाया। मैंने उसका हाथ पकड़ा।
"हमें यहाँ से निकलना है," मैंने कहा। "अभी।"
"रुको।" सुधा ने मेरी कलम उठाई — मेरे हाथ से, जहाँ रिया ने रखी थी। "यह तेरी है। मैंने बीस साल पहले तेरी माँ को दी थी। अब तेरी है। इसे कभी मत खोना।"
मैंने कलम ली — ठंडी, भारी, और उस पर सुशीला नाम की महक।
"अब जा," सुधा ने कहा। "मैं पीछे से दरवाज़ा बंद करूँगी। और मीरा — सुनीता चौहान का नाम अभी बाक़ी है। और बारह और नाम हैं जो मिट चुके हैं। याद रखना — रजिस्टर बदल गया है, पर तेरी लड़ाई अभी शुरू हुई है।"
"तू कहाँ जाएगी?" मैंने पूछा।
"जहाँ माँ जाती हैं," सुधा ने कहा, और वह आँखों से ओझल हो गई।
हम सीढ़ियाँ चढ़े। एम्बुलेंस में बैठे। रिया की गोद में रजिस्टर था, और दोनों हाथों से उसे पकड़े हुए थी, जैसे कोई गिरने से बचा रहा हो।
गाड़ी चलाई। शहर के बाहर के रास्ते पर, गली की बत्तियाँ पीछे छूट रही थीं।
रिया ने रजिस्टर खोला। पहला पन्ना — सुशीला जोशी, तारीख़ आज। दूसरा — रिया जोशी। तीसरा — सुधा हरनाम, कटा हुआ, मिटता हुआ।
और चौथा — खाली।
"माँ," रिया बोली, "इसमें एक और पन्ना है।"
"क्या?"
"खाली नहीं है।" उसने रजिस्टर मेरी तरफ़ घुमाया। "देख।"
मैंने सड़क किनारे गाड़ी रोकी। देखा।
पन्ने पर, हल्की स्याही से, एक नाम उभर रहा था — अधूरा। पहला अक्षर "सु"। और उसके नीचे, किसी पुराने हाथ से —
"सुनीता चौहान — पड़ाव गली — टीन के टुकड़े जैसी आवाज़।"
मैंने रजिस्टर बंद किया।
"अभी नहीं," मैंने कहा। "आज रात नहीं। पहले सुनीता की आवाज़ ढूँढनी है।"
रिया ने मेरी तरफ़ देखा। "कल?"
"कल," मैंने कहा। "और उसके बाद भी। जब तक नाम ख़त्म नहीं होते।"
मैंने गाड़ी आगे बढ़ाई। पीछे हवेली की बत्तियाँ जल-बुझ रही थीं, और गली में एक पतली सफ़ेद परछाई खड़ी देख रही थी — पर वह सिर्फ़ धुआँ था, बस धुआँ।
रिया को नींद आने लगी। उसने रजिस्टर अपनी गोद में रखा और मेरी तरफ़ झुककर कहा, "माँ, तूने कहा था — रजिस्टर डर से चलता है।"
"हाँ।"
"तो अब वह किससे डरेगा?"
मैंने सड़क देखी। सड़क सीधी थी, खाली, और सुबह की पहली रोशनी दूर से उभर रही थी।
"हमसे," मैंने कहा।
रिया हँसी — छोटी सी, थकी सी — और उसका सिर मेरे कंधे पर आ गया।
जब वह सो गई, मैंने एक हाथ से गाड़ी चलाई और दूसरे से रजिस्टर खोला। सुनीता के नाम के नीचे, अब एक लाइन और उभर आई थी — किसी और लिखाई में, पुरानी, फटी स्याही में —
"जिसने यह पढ़ा, उसी ने उसे फिर से ज़िंदा किया।"
मैंने रजिस्टर बंद किया। और मुस्कुराई — पहली बार कई हफ़्तों में, बिना डर के।
क्योंकि अब पीछे मुड़ने का सवाल नहीं था।
॥
भैरों कमरे में खड़ा था। स्याही की महक उसके कपड़ों से भी आ रही थी, मानो वह हवेली में ही सोया हो।
"रात आठ बजे," उसने कहा। "रजिस्टर में रिया का नाम अपने आप पूरा हो गया। किसी ने लिखा नहीं। रजिस्टर ने ख़ुद लिखा।"
मैंने रिया का हाथ और ज़ोर से पकड़ा।
"झूठ," मैंने कहा। "काजल ने तुझे भेजा है। वह जो चाहे बुलवा ले।"
भैरों ने कुछ नहीं कहा। उसने जेब से एक काग़ज़ निकाला — तह किया हुआ, कोना फटा हुआ। खोलकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
मैंने लिया।
सफ़ेद काग़ज़ पर, काली स्याही में, दो लाइनें थीं। ऊपर — "रिया जोशी, ग्यारह साल।" नीचे — तारीख़ आज की, और सबसे नीचे, अलग लिखाई में, एक शब्द — "रखवाला।"
मेरे हाथ काँपे नहीं। आवाज़ काँपी नहीं। बस पेट में कुछ ठंडा सा उतर गया।
"यह काग़ज़ कहाँ से आया?" मैंने पूछा।
"रजिस्टर के नीचे से," भैरों ने कहा। "आज शाम। मैडम ने मुझे दिया।"
"काजल ने?"
"मैडम ने कहा — इसे मीरा को देना। और कहना, कि अब भी वक़्त है।"
"किस बात का वक़्त?"
भैरों ने जवाब नहीं दिया। वह दरवाज़े की तरफ़ देखने लगा।
तभी पीछे से आवाज़ आई।
"यह सच है।"
मैं पलटी। सुधा खड़ी थी — कमरे के कोने में, जहाँ अभी अँधेरा था। उसका चेहरा अब भी उतना ही धुँधला था, पर आवाज़ साफ़ थी।
"रजिस्टर ने अपना फ़ैसला कर लिया," सुधा ने कहा। "मैंने सोचा था कि रिया के हाथ में आने के बाद वह रुक जाएगा। नहीं रुका। उसने अपना रास्ता ख़ुद चुन लिया।"
रिया ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर नहीं था — बस एक सवाल था जो वह पूछ नहीं रही थी।
मैंने उसे गले लगा लिया। उसका सिर मेरे सीने पर टिका, और उसकी साँसें मेरी वर्दी पर गरम पड़ रही थीं।
फिर मैं भैरों की तरफ़ मुड़ी।
"काजल कहाँ है?"
"तुलसी चौक पर।"
"अभी?"
"अभी। वह इंतज़ार कर रही है।"
"तो चल।"
भैरों के चेहरे पर हैरानी आई। "आप आएँगी?"
"तूने सुना नहीं? कहा न — अभी।"
सुधा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी नहीं थीं। गरम थीं, किसी के हाथ जैसी।
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