A Dark Secret – Chapter 364
"पर मरने से पहले," मैंने कहा, "वह कुछ कहना चाहती थी। अस्पताल में। बोल नहीं पा रही थी। बस होंठ हिल रहे थे। मैंने पूछा — माँ, क्या कह रही हो। वह रुक गई। मुड़ गई। दीवार की तरफ़ देखने लगी।"
कमरे में चुप्पी छा गई। ऊपर से बत्तियों की खड़खड़ाहट आ रही थी।
"दीवार की तरफ़," सुधा ने धीरे से दोहराया। "वह नाम लिखना चाहती थी। उसी वक़्त भी।"
"अब क्या फ़ायदा," मैंने कहा।
"फ़ायदा है।" सुधा ने मेरा हाथ छोड़ा। "मेरे पास कुछ है। असली रजिस्टर — जो सरोज के पास है, वह नक़ल है। असली यहीं है। मेरे पत्थर के नीचे।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा, अँधेरे में भी।
"चालीस साल से मैं उसे छू नहीं पाई," सुधा ने कहा। "एक बार भी नहीं। क्योंकि मेरा नाम आधा है, और रजिस्टर आधे नाम वाले को नहीं छूने देता।"
"तो फिर वह कैसे —"
"रिया," सुधा ने कहा। "रिया का नाम भी आधा है। रजिस्टर में लिखा है, पर पूरा नहीं बना। न माँ ने पूरा किया, न रजिस्टर कर पाया। इसलिए वही उसे छू सकती है।"
सीढ़ियों पर पैरों की आवाज़ आई। रिया उतर रही थी।
"रुक!" मैं चिल्लाई। "तू नीचे मत आ।"
वह रुकी — दो सीढ़ी ऊपर, मेरे सामने, अँधेरे में उसका चेहरा सिर्फ़ रोशनी की पतली लकीर में।
"माँ, गली से दो आदमी आए हैं। एक मोटा है।"
"भैरों," मैंने कहा।
"तेरे पीछे शायद मनोहर भी," सुधा ने कहा। "काजल अंदर फँसी है, तो उसके कुत्ते छुट्टे घूम रहे होंगे।"
"अंदर आने में कितना वक़्त है?" मैंने पूछा।
पर सुधा ने जवाब नहीं दिया। वह मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसकी आँखों में जो जगा, वह डर नहीं था।
"मीरा," वह बोली, "मैं चालीस साल से इस कमरे में हूँ। जब तक मेरा नाम आधा था, मैं बाहर नहीं जा सकती थी। अब तूने नाम पूरा किया — मैं जा सकती हूँ। पर जाने का एक ही रास्ता है। रजिस्टर को अपने हाथ में लेना। और वह तभी होगा जब कोई उसे छू ले और उस पर अपना पूरा नाम लिख दे — पूरा, ख़ुद, अपने हाथ से।"
"तो लिखेगी कौन?" मैंने पूछा, जानते हुए भी।
सुधा ने रिया की तरफ़ देखा।
"नहीं," मैंने कहा। मेरी आवाज़ तेज़ थी। "मेरी बेटी कोई काग़ज़ नहीं।"
"माँ —"
"चुप रह, रिया।"
"मैं चुप नहीं रहूँगी।" रिया सीढ़ी से उतर आई। अब वह मेरे बराबर थी, दीवार से टिकी हुई। "मैंने तेरे सपने देखे हैं। तू रोज़ उठकर देखती है कि हाथ पर स्याही है या नहीं। तूने सोचा मुझे पता नहीं? मैं सुनती हूँ — माँ, मैं नाम सुनती हूँ। सुनीता अभी भी उस घर में बंद है और मुझे सुन रही है। मैं क्या करूँ — कान बंद कर लूँ?"
"तू बारह साल की है।"
"तू तीस की है और तू भी डर रही है।"
मैंने उसका कंधा पकड़ा। उसकी कलाई पर पट्टी बँधी थी — वही स्याही का निशान, जो अब हथेली तक गया है, पट्टी के नीचे से दिख रहा था, काला और फैलता हुआ।
सुधा ने कहा, "अगर रिया रजिस्टर छूकर अपना पूरा नाम लिख देती है, तो वह रखवाला बन जाएगी — हाँ — पर आज़ाद भी रहेगी। इसीलिए नहीं कि उसे रखवाला चुनना पड़ेगा। इसीलिए कि वह ख़ुद चुनेगी। रजिस्टर ख़ुद नाम चुराता है। पर जो अपना नाम ख़ुद लिखता है — उसका नाम उसका रहता है।"
"और रजिस्टर?" मैंने पूछा।
"वह मेरे हाथ में आ जाएगा। और मैं उसे साथ ले जाऊँगी — वहाँ, जहाँ से कोई नहीं लौटता।"
"तू इतनी आसानी से मान रही है? तुझे क्या मिलेगा?"
सुधा हँसी — पहली बार। छोटी, फटी हुई हँसी। "मीरा, मैं चालीस साल से एक पत्थर के नीचे हूँ। मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस चाहिए कि जब मैं जाऊँ, कोई इसे उठाने वाला पीछे न छूटे।"
रिया ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर नहीं था। जो था, वह मैं पहचानती हूँ — सवाल। वह सवाल जो माँ के पास जवाब न हो तब भी पूछा जाता है।
"माँ," वह बोली, "यह मेरा फ़ैसला है। मुझे ख़ुद लेने दे।"
मैंने उसका हाथ नहीं छोड़ा। मैंने देखा — उसका चेहरा कितना छोटा है। बारह साल। बारह साल का चेहरा। मेरे हाथ में पीतल की कलम थी, और वह अब भी गरम थी, जैसे सुधा की उँगलियाँ।
"तेरे पास मेरा पूरा नाम है?" मैंने पूछा। "बता।"
रिया ने झट से कहा — "मीरा जोशी। सरोज नगर की वह कोठी जिसके पीछे आँगन है और आँगन में एम्बुलेंस खड़ी रहती है। आवाज़ — वह जो रामदीन को चाचा कहती है और ड्यूटी में कभी नहीं हँसती।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा। "तो तू भी मेरा नाम ऐसे ही रखना। हर रोज़। हर सुबह। जब तक मैं ज़िंदा हूँ।"
"माँ —"
"मैं मना नहीं कर रही," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँपी, "मैं शर्त लगा रही हूँ।"
रिया ने देखा। फिर वह मेरे पास आई और मेरे हाथ से कलम ले ली।
"कहाँ है?" उसने सुधा से पूछा।
सुधा ने अपनी जगह से हटकर पत्थर की तरफ़ इशारा किया। "यहाँ। पर जल्दी। स्याही सूखने से पहले।"
रिया झुकी। जैसे ही उसके हाथ ने पत्थर छुआ, कमरे में एक झटका आया — ज़मीन नहीं, हवा हिली — और उसकी कलाई पर पट्टी के नीचे स्याही चमकी, फिर वह फैली, फिर सिकुड़ गई।
"मिल गया," रिया ने कहा। उसने पीतल की कलम उठाई — पर रुकी।
"अब क्या?" मैंने पूछा।
"अब," सुधा ने कहा, "उस पर नाम लिख। अपना पूरा नाम। और गली। और आवाज़ — उसकी नहीं — अपनी।"
रिया ने सीधे मेरी तरफ़ देखा। "माँ, मैं लिख रही हूँ।"
मेरी साँस रुकी। पर मैंने सिर हिलाया। एक बार। हाँ।
रिया झुकी। कलम रजिस्टर पर टिकी।
उसी वक़्त ऊपर से भारी पैरों की आवाज़ आई। दरवाज़ा खुला। रोशनी अंदर आई — पीली, तेज़, और उसमें एक आदमी का बड़ा आकार खड़ा था।
भैरों।
वह सीढ़ियों पर नहीं रुका। वह सीधा उतरा, और उसकी साँस फूल रही थी। उसने एक पल रिया को देखा, फिर रजिस्टर को, फिर मेरी तरफ़।
"मैडम कह रही हैं —" उसने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार इतनी साफ़ थी, "देर हो गई। अब रखवाला चुना जा चुका है।"
कमरे में सब रुक गए।
मेरी नज़र रिया पर गई। रिया की नज़र रजिस्टर पर।
काग़ज़ के ऊपर, स्याही की नई लकीर अभी आधी थी — "री"।
और उसके नीचे, किसी और लिखाई में, जो कलम ने नहीं, किसी और ने लिखी थी, एक पूरा नाम उभर रहा था।
नाम था — रिया जोशी।
पूरा।
मैंने सुधा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद था।
"यह नहीं होना था," वह फुसफुसाई। "रजिस्टर ने पहले ही लिख दिया।"
भैरों ने एक क़दम आगे बढ़ा। उसकी आवाज़ में अब पहले जैसी सख़्ती नहीं थी — कुछ और था, जो डर जैसा दिखता था। "मैडम ने कहा, अब रखवाला बदल गया। अब रिया मैडम की जगह बैठेगी हवेली में। आज रात से।"
"चालीस साल की रखवाली," सुधा ने कहा, "और बारह साल की बच्ची?"
भैरों ने उसकी तरफ़ देखा। "मैं हुक्म मानता हूँ। हुक्म नहीं लिखता।"
रिया ने कलम नीचे रख दी। उसके हाथ नहीं काँप रहे थे। वह सीधी खड़ी थी।
"माँ," वह बोली, "रजिस्टर ने मेरा नाम लिख दिया है। पर मैंने नहीं लिखा।"
"तो?"
"तो इसका मतलब क्या है?"
सुधा ने कहा, "मतलब यह कि अब रजिस्टर ने तुझे चुन लिया है। बिना तेरी मर्ज़ी के। और जो रजिस्टर चुनता है, उसे कोई नहीं पलट सकता — सिवाय उसके जो अपना नाम ख़ुद लिखे।"
"पर मैंने लिखना शुरू किया था," रिया ने कहा। "आधा 'री' मेरा है।"
"तो पूरा कर," सुधा ने कहा।
उसी वक़्त हवेली के ऊपर से आवाज़ आई — एक औरत की, दूर से, पर साफ़। काजल की।
"भैरों! उसे मत लिखने देना! कुछ भी कर — वह काग़ज़ फाड़ दे!"
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