A Dark Secret – Chapter 363
मेरा पेट ठंडा हो गया।
"तू मेरी बेटी का नाम लेना चाहती है।"
"मैं किसी का नाम नहीं लेती।" सुधा ने काग़ज़ों की तरफ़ इशारा किया। "ये सब मुझे दिए गए हैं। लोग आते हैं, अपना नाम बोलते हैं, और मुझे दे जाते हैं। मैंने किसी से छीना नहीं। मैं तो बस —" उसने कलम अपनी छाती पर रखी — "लेती हूँ। जो गिरता है, वह उठा लेती हूँ।"
"मेरी बेटी कुछ नहीं गिराएगी।"
"तो फिर तू क्यों आई?"
यह सवाल कमरे में लटक गया। मैंने सोचा — मैं क्यों आई थी? क्योंकि रजिस्टर में नाम उभरा था। क्योंकि माँ ने कभी यह बात नहीं बताई। क्योंकि मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था।
"मैं इसलिए आई," मैंने कहा, "कि मेरी माँ ने तुझे आधा नाम दिया था। और मैं वह आधा पूरा करूँगी।"
सुधा हँसी। इस बार हँसी में टूटन नहीं थी — कुछ और था। हैरानी।
"तेरी माँ से भी यही उम्मीद थी।"
"मैं अपनी माँ नहीं हूँ।" मैंने रसीद निकाली। "वह रोज़ आती थी, रोज़ कोशिश करती थी, और रोज़ हार जाती थी। मैं रोज़ नहीं आऊँगी। मैं आज रात ख़त्म करूँगी।"
"कैसे?"
"तू बता।"
सुधा ने मेरी तरफ़ देखा। फिर काग़ज़ों के ढेर में से एक नीला काग़ज़ उठाया। फाड़ा हुआ, चिपका हुआ, फिर से फाड़ा हुआ।
"तेरी माँ ने यह लिखा था," उसने कहा। "अपनी आख़िरी रात से पहले। उसने लिखा — 'नाम अकेला नहीं बोलना। नाम के साथ चेहरा बोलना।'" सुधा ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "मैंने उसे चेहरा बोलना नहीं सिखाया था। उसने ख़ुद सोचा था। और शायद इसीलिए वह आधा नाम तक पहुँच पाई।"
"चेहरा किसका?"
"अपना।" सुधा की आवाज़ धीमी हुई। "नाम बोलने वाले का चेहरा। क्योंकि नाम किसी का भी हो, उसे बोलने वाला कोई होता है। अगर तू मेरा नाम बोलते वक़्त अपना चेहरा याद रखेगी — अपनी आँखें, अपना माथा, अपनी आवाज़ — तो नाम तुझमें से नहीं खिंचेगा। वह मेरे पास से निकलेगा, और ख़त्म हो जाएगा।"
"और अगर मैं अपना चेहरा भूल गई?"
सुधा ने कुछ नहीं कहा। बस काग़ज़ों की तरफ़ देखा।
मैंने साँस ली। "मुझे आईने की ज़रूरत है।"
सुधा ने अपनी जेब से एक छोटा आईना निकाला — पीतल का, किनारों से टूटा हुआ, पर साफ़।
"यह मेरा है," उसने कहा। "मैं इसे चालीस साल से नहीं देखा।"
मैंने आईना लिया। उसमें अपना चेहरा देखा। थका हुआ, आँखों के नीचे काला, बाल बिखरे हुए। पर मेरा था।
"अब बोल," सुधा ने कहा।
मैंने आईने में देखा। अपना चेहरा देखा। और बोली —
"सुधा हरनाम। सरोज नगर की वह हवेली जिसके पीछे सीढ़ियाँ हैं। आवाज़ — वह जो काग़ज़ों पर लिखती है।"
मेरी ज़ुबान पर "सु" आया, जैसे पहले। फिर रुक गई।
पर इस बार सुधा ने कुछ किया। उसने अपनी कलम उठाई और मेरे होंठों के सामने हवा में लिखा — जैसे किसी अदृश्य काग़ज़ पर। और मैंने महसूस किया कि मेरी ज़ुबान हिल रही है, मेरी मर्ज़ी से नहीं।
"धा," मैंने कहा।
मेरी आवाज़ फटी हुई थी। पर वह आई।
सुधा की आँखें फैल गईं।
"फिर," वह बोली, और इस बार उसकी आवाज़ में हड़बड़ी थी।
"हर —"
"हाँ।"
"ना —"
"हाँ।"
"म।"
कमरे में स्याही की महक अचानक हल्की हो गई। सुधा ने कलम नीचे रख दी। उसके हाथ काँप रहे थे।
"तूने —" वह रुकी। "तूने पूरा बोल दिया।"
मैंने आईने में देखा। मेरा चेहरा वही था। मैंने अपना नाम जाँचा — मीरा जोशी। सरोज नगर। थकी आवाज़। सब कुछ जहाँ था, वहीं था।
"अब क्या?" मैंने पूछा।
सुधा ने काग़ज़ों के ढेर की तरफ़ देखा। एक पत्ता हिला — अपने आप। फिर दूसरा। जैसे हवा में कोई पन्ने उलट रहा हो।
"रजिस्टर को पता चल गया," सुधा ने कहा। "उसने सुना कि उसका नाम किसी ने पूरा बोला।" वह खड़ी हुई — पहली बार। उसकी कमर झुकी हुई थी, पर वह खड़ी थी। "अब वह तुझे ढूँढेगा।"
"मुझे?"
"नाम बोलने वाले को।" सुधा ने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया। "तूने मेरा नाम पूरा किया। अब रजिस्टर को तेरा नाम चाहिए — बदले में।"
ऊपर से रिया की आवाज़ आई। इस बार साफ़।
"माँ! ऊपर कोई आ रहा है — गली से! बत्तियाँ बुझ रही हैं!"
मैंने सुधा की तरफ़ देखा। "तूने कहा था — दो रास्ते हैं।"
"तीसरा भी है।" सुधा ने अपनी कलम उठाई और मेरी तरफ़ बढ़ाई। "तू यह ले। और रजिस्टर में अपना नाम ख़ुद लिख। जो अपना नाम ख़ुद लिखता है, उसे कोई नहीं खींच सकता।"
"पर मैंने तो कभी —"
"आज रात सीख।" सुधा ने कलम मेरे हाथ में रख दी। "जा। ऊपर जा। और सीढ़ियों पर मत रुकना।"
मैं कलम लेकर मुड़ी। सीढ़ियों की तरफ़। ऊपर से रोशनी आ रही थी — नीली, ठंडी।
"मीरा," सुधा ने पीछे से कहा। मैं रुकी। "तेरी माँ ने भी यही किया था — मेरा नाम बोलते-बोलते रुक गई, और उसी दिन से मैं यहाँ हूँ। तूने पूरा बोला — इसलिए अब मैं जा सकती हूँ। पर जाने से पहले —"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"तेरी माँ ने आख़िरी बार जो लिखा था, वह मैंने तुझे नहीं दिखाया।"
मैं सीढ़ी पर खड़ी थी। ऊपर रिया चिल्ला रही थी। नीचे सुधा कुछ और कहना चाहती थी। और मेरे हाथ में पीतल की कलम थी, जो ठंडी नहीं थी — गरम थी, जैसे किसी ने अभी-अभी उसे पकड़ा हो।
"क्या लिखा था?" मैंने पूछा।
सुधा ने मुँह खोला।
और उसी वक़्त हवेली की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।
॥
अँधेरे में सुधा की आवाज़ आई, धीमी, पर साफ़ — "मत रुक। सीढ़ी पकड़।"
मैंने दीवार टटोली। पत्थर ठंडा था। ऊपर से रिया की आवाज़ आ रही थी, अब चीख जैसी — "माँ, जल्दी!"
"क्या लिखा था माँ ने?" मैंने अँधेरे में पूछा। "आख़िरी बार। तू बोल रही थी।"
सुधा कुछ देर चुप रही। फिर बोली, "सीढ़ी पर हूँ। तेरे नीचे। हाथ बढ़ा।"
मैंने हाथ बढ़ाया। उसकी उँगलियाँ मेरी कलाई पर पड़ीं — पतली, ठंडी पर काँपती हुई।
"तेरी माँ आई थी," सुधा ने कहा। "बीस साल पहले। इसी कमरे में। उसने मेरा चेहरा देखा और रो पड़ी। मैंने कहा — तू कौन है। उसने कहा, मैं सुशीला हूँ, तेरी सहेली सरोज की बहन।"
"और फिर?"
"फिर उसने मेरा नाम बोलना शुरू किया। 'सुधा हरनाम' — बस दो शब्द बोले थे कि रजिस्टर हिला। ऊपर से आवाज़ आई — काग़ज़ों के खिसकने की। तेरी माँ ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में जो डर था, वह मैं चालीस साल से भूल नहीं पाई।"
"वह भाग गई?"
"भागी नहीं।" सुधा की आवाज़ सख़्त हो गई। "उसने मेरा हाथ पकड़ा था। पर तभी उसकी आवाज़ फटने लगी — जैसे कोई गले से तार खींच रहा हो। वह घुटनों पर गिरी। और मैं — मैं कुछ नहीं कर पाई। कलम उठाई, हवा में लिखा, पर उसका नाम मेरे हाथ से फिसल गया। फिर वह उठी और सीढ़ियाँ चढ़ गई।"
"तूने उसे रोका नहीं?"
"रोकती कैसे?" सुधा ने कहा। "मेरा आधा नाम था। मेरे पास जो भी ताकत थी, वह बस इतनी थी कि मैं उसे देख सकूँ।"
हवेली में अब भी अँधेरा था। ऊपर रिया की आवाज़ आई — "माँ, गली से दो लोग आ रहे हैं!"
"बीस साल मैंने तेरी माँ से नफ़रत की," सुधा बोली। "मैंने सोचा — यह औरत मुझे छोड़कर गई। अपनी जान बचाकर। पर पिछले साल, जब मुझे तेरी आवाज़ सुनाई दी — तू मुझे सुना रही थी, बिना जाने — मैं समझी कि सुशीला भागी नहीं थी। रजिस्टर ने उसे भगाया था। उसने तेरी माँ को उस दिन उसी तरह खींचा जैसे आज मुझे खींच रहा है।"
"माँ अब नहीं है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अचानक सूखी निकली। "तीन साल पहले मरी। कैंसर।"
सुधा की उँगलियाँ मेरी कलाई पर कस गईं।
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