A Dark Secret361 / 536

A Dark Secret – Chapter 361

7 min read November 6, 2026

"कहाँ से?"

"पुरानी फाइल। निर्माण विभाग। सरोज नगर।"

वह उठा, और वह उठा जैसे कोई बूढ़ा नहीं, कोई जवान उठ रहा हो। उसने मेरा हाथ पकड़ा।

"मीरा," उसकी आवाज़ धीमी थी। "सुधा का नाम मत बोलना।"

"क्यों?"

"क्योंकि सुधा का नाम मैंने नहीं मिटाया था। उसका नाम बाबू हरनाम ने खुद मिटाया था — अपने हाथ से। और उसने कहा था कि जो इसे बोलेगा, उसका नाम भी जाएगा।"

"तो वह कौन थी?"

रामदीन ने रिया की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, और फिर उसने सीढ़ी पर बैठकर अपना सिर हाथों में पकड़ लिया।

"सुधा हरनाम," उसने कहा। "बाबू हरनाम की बेटी। काजल की बुआ। और —" वह रुका, और उसके हाथ काँपे — "और सरोज की सहेली।"

मेरे हाथ से फाइल फिसल गई। रिया ने उसे झट से पकड़ा।

"तो सुधा हवेली की थी," मैंने कहा।

"हाँ। और उसने सौदा तोड़ने की कोशिश की थी। अपने पिता के खिलाफ़ खड़ी हुई थी। चालीस साल पहले। और बाबू हरनाम ने उसका नाम मिटा दिया — अपनी ही बेटी का।"

रिया ने फाइल अपनी छाती से लगा ली।

"तो सुधा का नाम लौटाने से," वह धीरे बोली, "सौदा कमज़ोर होगा।"

रामदीन ने सिर उठाया। "नहीं। सुधा का नाम लौटाने से सबसे बड़ा नाम लौटेगा। और जो सबसे बड़ा नाम लौटेगा — बाबू हरनाम का सबसे बड़ा गुनाह लौटेगा।"

फिर वह उठा, अपनी भूरी जैकेट ठीक की, और मेरी तरफ़ देखकर बोला —

"आज चौबीस है।"

मुझे कुछ समझ नहीं आया। "हाँ।"

"रजिस्टर में तारीख़ दो तरह की है। एक जो नाम के साथ लिखी है, और एक जो खुद नाम के नीचे उभरती है। दूसरी तारीख़ बुरी है। उस दिन हवेली का दरवाज़ा किसी भी नाम के लिए खुला रहता है।"

"कल?"

"आज रात।"

हम घर लौटे। मैंने सुधा वाली फाइल मेज़ पर रखी और उस पर हाथ रखकर बैठ गई। रिया सामने कुर्सी पर बैठी थी, पैर हिला रही थी।

"तू स्कूल जा।"

"आज स्कूल नहीं।"

"रिया —"

"माँ, आज हवेली का दरवाज़ा खुला है। और सुधा हरनाम का नाम मिटा है। और मेरी कलाई पर निशान है। तू मुझे स्कूल नहीं भेज सकती।"

मैंने उसकी कलाई देखी। निशान अब हथेली तक आ गया था, हल्का, पर मौजूद।

"मुझे सोना है," मैंने कहा। "तीन घंटे।"

मैं सोई। और सोते वक़्त मैंने वही सपना देखा — बंद कमरा, दीवार, और उँगली पर गीली स्याही। पर इस बार दीवार पर लिखा था — "सुधा"। नीचे तारीख़ — "चौबीस"। और मैंने उँगली अपनी तरफ़ देखी तो उस पर भी "सुधा" उभर रहा था, आधा — "सु"।

मेरी आँख खुली। कमरे में स्याही की महक थी, वही पुरानी, गोंद वाली, फँसी हुई।

मैंने अपनी उँगली देखी।

उस पर आधा नाम उभरा हुआ था — "सुधा" — और उसके नीचे तारीख़ — "चौबीस"।

॥

मैंने उँगली रिया के सामने रखी। उसने देखा और उसका मुँह खुला रह गया।

"माँ, यह तो —"

"हाँ।"

हम दोनों अस्पताल की तरफ़ भागे। रास्ते में मेरा दिमाग़ खाली था, बस एक ही बात घूम रही थी — सुधा। जिसका नाम कोई नहीं बोल सकता था, वह मेरी उँगली पर लिखा था। और तारीख़ चौबीस। आज।

रामदीन बेंच पर बैठा था, पर जैसे ही मैंने उँगली आगे की, वह खड़ा हो गया। पान का पत्ता ज़मीन पर गिरा और उसने उसे देखा भी नहीं।

"यह कब उभरा?" उसकी आवाज़ किसी और की लग रही थी।

"सोकर उठी तो यही मिला। रामदीन, यह नाम —"

"चालीस साल बाद," उसने मेरी बात काटी। "चालीस साल बाद यह नाम पहली बार किसी के हाथ पर उभरा है। पहली बार।"

"इसका मतलब?"

"इसका मतलब यह है कि रजिस्टर अब सुधा को वापस बुला रहा है। उसे जगह चाहिए। और जगह वह वहीं से लेगा जहाँ उसने पहले कभी ली थी।"

मेरा गला सूख गया। "कहाँ से?"

"जिस चीज़ पर वह नाम बना था।" रामदीन ने मेरी उँगली की तरफ़ देखा। "तेरे हाथ से।"

रिया मेरे पीछे खड़ी थी, उसने मेरी कलाई पकड़ी। उसकी मुट्ठी ठंडी थी।

"तो यह मेरे नाम की कीमत पर आएगा," मैंने कहा।

"नाम की नहीं। नाम की जगह पर।" रामदीन ने अपनी जेब से एक टूटा पान निकाला और मुँह में रख दिया, फिर थूक दिया। "सुधा हवेली के पीछे सीढ़ी के नीचे रहती है। पर वह अब इंसान नहीं है, मीरा। वह सिर्फ़ एक नाम है जो किसी शरीर में फँसा है। वह नाम पूरा नहीं है, इसीलिए वह अपने चारों तरफ़ के नाम खींचकर अपने को पूरा करती है। समझ रही है?"

"तो वह मेरा नाम खींच लेगी?"

"अगर तू उसके सामने अपना पूरा नाम नहीं बोलेगी।"

मैंने अपनी कलाई छुड़ाई। "मैं आज रात उससे मिलूँगी।"

"ना।" रामदीन ने मेरा रास्ता रोका। "सुन। सुधा के कमरे में जाने से पहले तुझे अपना पूरा नाम तीन बार बोलना होगा — नाम, गली, आवाज़। तीनों साथ। जो अपना पूरा नाम नहीं बोलता, वह खाली हाथ जाता है और सुधा उसके हाथ में जो मिलता है वह ले लेती है। बीस साल पहले तेरी माँ गई थी। वह सुधा का नाम बोलने गई थी। आधा बोलकर रुक गई —"

"और?"

"और फिर सुशीला ने कभी पूरा नाम नहीं बोला। उसने अपना नाम सुधा को दे दिया, इसीलिए सुधा आज भी वहीं है।"

रिया ने मेरा हाथ पकड़ा। "माँ, मुझे भी जाना है।"

"नहीं।"

"माँ —"

"रिया, मैंने कहा नहीं।" मेरी आवाज़ ऊँची हो गई और मैंने खुद को रोका। फिर धीरे बोली, "तू सुनने वाली है। तेरा काम बाहर है। सुनना। जो मैं अंदर बोलूँ, तुझे सुनना है। अगर मेरी आवाज़ टूटे, अगर मैं रुक जाऊँ, तो तुझे बोलना है। बाहर से। पूरा नाम। समझी?"

रिया ने सिर हिलाया। उसकी आँखें सूखी थीं, जो मुझे और डरा गईं।

रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। "और तू — पहले अपना नाम बोल। अभी। यहीं। मेरे सामने।"

"अभी?"

"अभी। मेरे सामने बोलेगी तो मैं गवाह रहूँगा। जो नाम गवाही से बोला जाए, वह सुधा जल्दी नहीं खींच सकती।"

मैंने गहरी साँस ली।

"मीरा जोशी। सरकारी अस्पताल की गली, सरोज नगर। आवाज़ —" मैं रुकी। मेरी आवाज़ कैसी है? मैंने कभी सोचा नहीं था। "आवाज़ — जो लोग फोन पर सुनते हैं और कहते हैं, तू ठीक तो है?"

रामदीन का चेहरा सख़्त रहा। "पूरा बोल। आवाज़ कैसी है?"

"आवाज़ — थकी हुई, पर साफ़।"

"फिर से।"

"मीरा जोशी। सरकारी अस्पताल की गली, सरोज नगर। आवाज़ थकी हुई, पर साफ़।"

"फिर से।"

"मीरा जोशी। सरकारी अस्पताल की गली, सरोज नगर। आवाज़ थकी हुई, पर साफ़।"

रामदीन ने सिर हिलाया। "अब इसे लिख।"

"कहाँ? नोटबुक तो हवेली में छूट गई।"

रामदीन ने अपनी भूरी जैकेट की जेब से एक पुरानी मुड़ी हुई रसीद निकाली — किसी दुकान की, जिस पर पीछे की तरफ़ कोई पुरानी तारीख़ लिखी थी। उसने रसीद मेरी तरफ़ बढ़ाई और अपनी जेब से एक बिना धार वाली पेंसिल दी।

"पीछे लिख। नाम, गली, आवाज़। और अपने नाम के नीचे अपना हस्ताक्षर।"

मैंने लिखा। पेंसिल की नोक बहुत घिसी थी, अक्षर मोटे बन रहे थे। रिया मेरे कंधे के ऊपर से देख रही थी।

"अब यह रसीद अपने पास रख," रामदीन ने कहा। "सुधा के कमरे में इस काग़ज़ की महक जाएगी तो वह जानेगी कि तेरा नाम गवाही वाला है।"

मैंने रसीद मोड़कर जेब में रखी।

"रामदीन," मैंने कहा। "तू साथ चल।"

वह चुप रहा। फिर उसने आसमान की तरफ़ देखा। शाम हो रही थी, आसमान किसी पुराने पीतल जैसा रंग ले रहा था।

"मैं साथ नहीं आ सकता," उसने कहा। "मेरा नाम भी अभी नया-नया लौटा है। अगर मैं सुधा के सामने गया और अपना नाम भूल गया, तो जो नाम लौटा है वह भी जाएगा। और फिर चालीस साल का इंतज़ार करना पड़ेगा।"

"तो मैं अकेली?"

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