A Dark Secret – Chapter 360
मैंने फोन सोफ़े पर पटका। रिया रसोई से निकली, हाथ में चाय का गिलास, और मेरी तरफ़ देखकर वहीं रुक गई।
"क्या हुआ?"
"कुछ नहीं।"
"माँ।" उसने गिलास नीचे रखा। "तू जब झूठ बोलती है, तब तेरी आवाज़ नाक से निकलती है।"
मैं बैठ गई। कुर्सी पर। और मैंने उसकी तरफ़ देखा — बारह साल, चौड़ी आँखें, मेरे ही जैसी ज़िद लिए खड़ी।
"बैठ," मैंने कहा।
वह बैठ गई।
"मैं तुझे सब बताऊँगी," मैंने कहा। "शुरू से। और तू बीच में कुछ नहीं पूछेगी। पूरा सुनके पूछेगी।"
"ठीक है।"
और मैंने बताया। हवेली। बाबू हरनाम सिंह का सौदा। रजिस्टर — जो जलता नहीं, सिर्फ़ पन्ना बदलता है। हर नए घर के साथ एक नाम। तारीख़ आने पर नाम उठा लिया जाता है — और इंसान खुद भूलने लगता है कि वह कौन है। काग़ज़ों से मिटता है, अपनों की याद से मिटता है, नौकरी से मिटता है। रखवाला — हर पीढ़ी में एक, जो रजिस्टर की देखभाल करे। सरोज। मेरी माँ की बहन, जिसका नाम रामदीन ने मिटाया था और जो चालीस साल से हवेली के नीचे पत्थर के कमरे में है। सुमित्रा — स्याही बनाने वाली, जिसका नाम कभी लिखा ही नहीं गया इसलिए वह अब भी ज़िंदा है। काजल हरनाम — जो रखवाला है, पर रजिस्टर उसे नहीं चुन रहा।
और फिर मैं रुकी। गिलास में चाय ठंडी हो रही थी।
"बोल न," रिया ने कहा।
"रजिस्टर में तेरा नाम है," मैंने कहा। "तेरे जन्म से पहले से। मैंने नहीं लिखवाया। माँ ने लिखवाया — मेरी माँ ने, तेरी दादी ने। तेरा नाम पहले से था, और मेरा भी। मेरे साथ उसने सिर्फ़ तारीख़ आगे की थी।"
रिया कुछ देर चुप बैठी रही। बाहर कुत्ता भौंका, फिर चुप हो गया।
"और मेरे हाथ का निशान?"
"वह रजिस्टर तुझे चुन रहा है। रखवाला बनाने के लिए।"
"काजल की जगह?"
"हाँ।"
वह उठी, रसोई में गई, नल खोला, हाथ धोया, और वापस आई। उसकी कलाई पर निशान अब भी था — मैं देख सकती थी, हल्का सा, स्याही के धुएँ जैसा।
"माँ," उसने कहा, "एक सवाल है।"
"पूछ।"
"अगर नाम मिटाने से इंसान मिट जाता है, तो उसे बचाने का तरीक़ा क्या है? मतलब — अगर कोई एक बार मिट गया, तो वापस कैसे आए?"
"रामदीन कहता है — नाम, गली, आवाज़। तीनों बोलने से नाम वापस आ सकता है।"
"पर अभी तो नहीं आया।"
"क्योंकि हमने तीनों नहीं बोले। हमने नाम बोला, गली बोली, पर आवाज़ अधूरी थी — टीन सिर्फ़ आवाज़ का इशारा है, असली आवाज़ नहीं।"
रिया ने अपनी कलाई की तरफ़ देखा।
"तो हमें असली आवाज़ ढूँढनी होगी।" उसने सिर उठाया। "और माँ, सबसे बड़ी कड़ी वह औरत है — हवेली के पीछे वाली। सरोज। उसका नाम भी मिटा है, और वह अब भी ज़िंदा है। इसका मतलब — नाम बोलकर लौटाया जा सकता है। वह सबूत है। हमें उसका नाम ढूँढना होगा — पूरा नाम, गली, आवाज़।"
"उसका नाम सरोज जोशी है।"
"नहीं।" रिया ने सिर हिलाया। "सरोज तो अब का नाम है। उसका जो नाम मिटा, वह अलग होगा। जब रामदीन ने नाम मिटाया, तब वह क्या बोला था? वह नाम। वही नाम उसे लौटाएगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। बारह साल की बच्ची मेरे सामने एक ऐसी बात कह रही थी जो मेरे दिमाग़ में एक हफ़्ते से नहीं आई थी।
"कल सुबह," मैंने कहा, "अस्पताल। पुराने रिकॉर्ड।"
"अभी चल।"
"रिया —"
"माँ, अभी सुबह के चार बजे हैं। अस्पताल खुला है। और तेरी ड्यूटी भी है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा और पहली बार लगा कि वह मेरी बेटी नहीं, मेरे साथ खड़ी एक औरत है — छोटी, पर औरत।
हम पाँच बजे अस्पताल पहुँचे। इमरजेंसी वार्ड में सिर्फ़ एक नर्स थी, बेंच पर दो लोग सो रहे थे। मैंने अनीता मिश्रा को ढूँढा। वह तीसरी मंज़िल के स्टोर में थी, काग़ज़ों के बोरे हटा रही थी।
"इतनी सुबह?" उसने पूछा।
"पुरानी फाइलें चाहिए," मैंने कहा। "चालीस साल पुरानी।"
"चालीस साल?" उसने अपनी कलाई पर हाथ रखा। "मीरा, यहाँ चालीस साल पहले का कुछ नहीं है। जो है, वह सिर्फ़ पिछले बीस साल का है। बाकी बोरों में रखा है और चाबी चड्ढा जी के पास है।"
"चड्ढा जी घर गए।"
"तो?"
मैंने उसकी आँखों में देखा। "अनीता, मुझे वह चाबी चाहिए।"
वह कुछ देर खड़ी रही। फिर उसने अपनी जेब से चाबियों का छल्ला निकाला और मुझे दिया।
"दो चाबियाँ हैं," उसने कहा। "एक पुरानी, एक नई। पुरानी किसी बोरे के लिए है जो इकतालीस साल पहले का है। बाकी मुझे नहीं पता।"
"तू क्यों दे रही है?"
"क्योंकि चड्ढा जी ने कल रात तीन बजे मुझे फोन करके कहा था कि अगर मीरा फाइल माँगे तो दे देना, और बाद में उसका नाम मत लेना।" वह मुड़ गई। "मुझे नहीं पता वह क्या कह रहे थे। पर मैंने उन्हें ऐसा डरते हुए पहले कभी नहीं सुना।"
स्टोर में रोशनी पीली थी, ट्यूबलाइट सिर्फ़ एक जल रही थी। बोरे दीवार के साथ रखे थे, धूल में लिपटे। मैंने पहला बोरा खोला। उसमें हाज़िरी के पुराने पन्ने थे, बिल, कुछ स्टेशनरी। दूसरा — पुरानी दवाइयों के खाली डिब्बे। तीसरा — फाइलें, रबर बैंड से बँधी।
रिया एक कोने में बैठकर फाइलें खोलने लगी। मैंने चौथा बोरा उठाया। भारी था।
"माँ," रिया ने कहा। "यह देख।"
उसके हाथ में एक पतली पीली फाइल थी। ऊपर लिखा था — "निर्माण विभाग, सरोज नगर"। मैंने फाइल खोली। अंदर काग़ज़ थे — ज़मीन के काग़ज़, नक्शे, मुहरें। और बीच में एक लिफ़ाफ़ा जिस पर लिखा था — "नाम-सूची, भाग एक"।
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर हाथ से लिखी सूची थी, दो पन्नों में।
पहला पन्ना — तारीख़ें और नाम। "चौदह मार्च, रामदीन यादव, पीतल गली।" "बीस मार्च, सुशीला जोशी, मालवीय चौक।" और इसी तरह आगे।
दूसरा पन्ना — और उस पर सिर्फ़ तीन नाम। पहला — "सुशीला जोशी" — पूरा लिखा हुआ। दूसरा — "सु" — बाकी कटा हुआ, स्याही से मिटाया। तीसरा — "मी" — यानी "मीरा" — आधा लिखा, और उसके आगे कुछ नहीं।
"यह तो सुशीला और मैं," मैंने कहा।
"पर बीच में जो है," रिया ने उँगली रखी, "वह कौन है? 'सु' — सुशीला का 'सु' नहीं है, क्योंकि सुशीला तो पूरा लिखा हुआ है। यह अलग नाम है।"
"सुमित्रा?" मैंने कहा। "पर सुमित्रा ने खुद कहा था कि उसका नाम कभी नहीं लिखा गया।"
"तो दूसरी 'सु' है।" रिया ने मेरी तरफ़ देखा। "सुधा।"
मैं वहीं बैठ गई। स्टोर के फर्श पर, धूल में।
"माँ ने पर्ची पर लिखा — 'पहला नाम सुधा का है।'" मेरी आवाज़ धीमी निकली। "मतलब सुधा इससे पहले मिट चुकी थी।"
"और तेरी माँ ने उसे लिखवाया।"
"क्यों?"
"शायद वह उसे बचाना चाहती थी। शायद वह सुधा की बेटी थी — नहीं, रुक।" रिया ने फाइल के पन्ने उलटे। "माँ, यह देख। नीचे तारीख़ है — 'दो जून'। और उसके नीचे लिखा है — 'उठा लिया'। फिर 'बारह जून', फिर 'उठा लिया'। यानी हर बार नाम उठाया गया है।"
"सुधा कौन थी?" मैंने खुद से पूछा।
"वह चौथी औरत हो सकती है," रिया ने कहा। "जिसकी तस्वीर में चेहरा मिटा दिया गया था। रामदीन के डिब्बे में चार तस्वीरें थीं — तीन के चेहरे साफ़, चौथी का मिटा हुआ। वही सुधा हो सकती है।"
मैंने फाइल बंद की और अपनी बगल में दबा ली। "यह मैं ले जा रही हूँ।"
"अनीता को बताना पड़ेगा?"
"बाद में।"
हम नीचे उतरे। सीढ़ियों पर रामदीन मिला — बेंच पर बैठा, हाथ में पान का पत्ता, आँखें उठाकर मेरी तरफ़।
"क्या निकाला?" उसने पूछा।
"सुधा," मैंने कहा।
उसका हाथ रुक गया। पान का पत्ता उसकी उँगलियों से फिसला और सीढ़ी पर गिर गया। वह उसे उठाने के लिए नहीं झुका।
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