A Dark Secret359 / 536

A Dark Secret – Chapter 359

6 min read November 6, 2026

वह कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर उठे, थेले पर पैसे रखे, और बोले, "पंद्रह मिनट। स्टोर के बाहर।"

मैं वहीं बैठी रही। चाय ठंडी हो गई।

पंद्रह मिनट बाद चड्ढा जी ने मुझे एक पतली पीली फाइल थमाई। उस पर सिर्फ़ तीन शब्द लिखे थे — "पड़ाव गली, एक।" और नीचे, हल्की स्याही में एक नाम — सुनीता चौहान।

"इसे लौटाना," उन्होंने कहा, और तेज़ी से चले गए।

मैंने फाइल खोली। पहला पन्ना — एक बकरी की तस्वीर, जिसके गले में घंटी थी। दूसरा पन्ना — सुनीता का नाम, गली, और एक लाइन — "आवाज़: टीन के टुकड़े जैसी।" तीसरा पन्ना — एक तारीख़, तीस साल पुरानी, और उसके नीचे सिर्फ़ चार अक्षर — "उठा लिया।"

मैंने फाइल बंद की। जेब में पन्ना था, कलम थी, गोली थी।

घर लौटकर मैं आँगन में गई, रिया के साथ। एम्बुलेंस वहीं खड़ी थी। मैंने उसका पिछला दरवाज़ा खोला और अंदर बैठ गई। रिया सामने बैठी।

"आज रात," मैंने कहा। "पड़ाव गली के मोड़ पर, नीम के नीचे, मैं सुनीता चौहान का नाम बोलूँगी।"

"और मैं?"

"तू गाड़ी में रहेगी।"

"माँ।"

"रिया, यह बात मेरी मान। इस बार तू गाड़ी में रहेगी। अगर मैं डेढ़ घंटे में न आऊँ, तो तू रामदीन को फोन करेगी और शहर से बाहर चली जाएगी — चाची के साथ, पापा के पास।"

"मैं नहीं जाऊँगी।"

"रिया —"

"मैं नहीं जाऊँगी।" उसकी आवाज़ में वह ज़िद थी जो सिर्फ़ बारह साल की उम्र में आती है, और उसके बाद कभी नहीं। "तूने कहा था कि तेरे पास रजिस्टर है पर वह नहीं जो उसमें लिखा है। मुझे लगता है मुझे पता है वह क्या है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"क्या?"

"वह आवाज़ जो रजिस्टर में है। जो नामों को बाँधती है।" उसने अपनी कलाई की तरफ़ देखा। "तेरे पास नाम है, पर आवाज़ नहीं। और मेरे पास आवाज़ है, पर नाम नहीं। इसीलिए वह मुझे चुन रहा है। इसीलिए मेरा निशान कलाई तक बढ़ा।"

मैं कुछ नहीं बोली।

"माँ," उसने कहा, "अगर तू अकेले बोलेगी, तो वह औरत तुझे सुनेगी, पर वह नहीं लौटेगी। क्योंकि उसे लौटने के लिए दो आवाज़ें चाहिए — कहने वाली और सुनने वाली। मैं सुनूँगी।"

बाहर हवा चली और आँगन के पेड़ से पत्ते आकर एम्बुलेंस की छत पर गिरे।

"तुझे कैसे पता?"

"क्योंकि मैंने सुना है," उसने कहा। "जब तू दीवार पर माँ का नाम लिख रही थी, मैंने सुना था। स्याही की महक के पीछे कोई बोल रहा था। वह माँ नहीं थी, माँ। वह सुनीता थी। वह पहले से रो रही थी।"

मैंने सीट का पीछा पकड़ लिया।

"तूने मुझे क्यों नहीं बताया?"

"क्योंकि तू डर जाती।"

मैं उसकी तरफ़ देखती रही। बारह साल।

"अब क्या?" मैंने पूछा।

"अब हम दोनों जाएँगे," उसने कहा। "और तू बोलेगी, मैं सुनूँगी। और अगर सुनीता आई, तो हम दोनों उसे उसका नाम लौटाएँगे — पूरा।"

एम्बुलेंस का पिछला दरवाज़ा हवा से ज़ोर से बंद हो गया — वैसे ही जैसे पुरानी गाड़ियों में होता है, धड़ाम से।

हम दोनों चौंक गए। फिर रिया हँस पड़ी।

मैंने उसका हाथ पकड़ा।

"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक शर्त।"

"क्या?"

"जब मैं बोलूँ, तू मेरी तरफ़ देखती रहेगी। मेरी आवाज़ पर नज़र रखेगी। अगर मैं बीच में रुक जाऊँ, तो तू मेरा नाम बोलेगी — मीरा जोशी, तीस साल, एम्बुलेंस वाली।"

"क्यों?"

"क्योंकि जो नाम बोलता है, वह भूल सकता है। और मुझे नहीं भूलना।"

रिया ने मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया।

उस रात जब मैं पड़ाव गली के मोड़ पर पहुँची, नीम पहले से वहाँ खड़ा था — बूढ़ा, फैला हुआ, और उसके नीचे एक टीन का टुकड़ा पड़ा था, जैसे किसी ने अभी रखा हो।

पर मुझे यह नहीं पता था कि उस टीन के नीचे एक काग़ज़ दबा है, और उस काग़ज़ पर मेरी माँ की लिखाई में एक लाइन है, और वह लाइन उस आवाज़ की है जिसे मैं चालीस साल पहले से सुन रही हूँ।

॥

टीन के नीचे जो काग़ज़ दबा था, वह मैंने उठाया नहीं। पहले नाम बोलना था — यही रामदीन की हिदायत थी, यही चड्ढा जी की फाइल में लिखा था। टीन का टुकड़ा मैंने उठाकर जेब में रखा, और काग़ज़ वहीं पड़ा रहने दिया।

रिया गाड़ी में बैठी थी, खिड़की खुली थी, उसकी आँखें मुझ पर थीं।

"आवाज़ पहले," मैंने कहा। "फिर नाम। फिर गली।"

"टीन बजाऊँ?"

"तू बैठ।"

मैंने टीन का टुकड़ा हवा में पकड़ा और उस पर अँगूठे से ठोक दिया। आवाज़ निकली — पतली, पुरानी, जैसे पीतल की थाली पर चम्मच गिरे। एक बार। दो बार। तीसरी बार ज़ोर से।

गली में रोशनी कहीं भी नहीं थी। सिर्फ़ अस्पताल से आती एम्बुलेंस की लाल बत्ती मेरी गाड़ी पर पड़ रही थी, जो मैंने जान-बूझकर जलती छोड़ी थी।

"सुनीता चौहान," मैंने कहा।

मेरी आवाज़ गली में गई और लौटी नहीं।

"सुनीता चौहान," दूसरी बार।

रिया ने गाड़ी का दरवाज़ा खोला।

"माँ, तेरी आवाज़ काँप रही है।"

"बैठ।"

"मैं सुन रही हूँ। यही तो काम है मेरा।" वह बाहर आ गई और नीम के उस पार खड़ी हो गई। "फिर बोल।"

मैंने तीसरी बार बोला। "सुनीता चौहान। पड़ाव गली।"

हवा रुक गई। नीम का एक पत्ता भी नहीं हिला। और फिर — मुझे यक़ीन नहीं हुआ — नीम की जड़ के पास की मिट्टी में एक लकीर उभरी, जैसे किसी ने उँगली से गीली ज़मीन पर नाम खींचा हो। मैंने झुककर देखा। "सुनीता" — आधा बना, फिर मिट गया।

"लिखा तो," रिया ने धीरे से कहा, "पर टिका नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि आवाज़ अधूरी है।" वह मेरे पास आई और मेरी कलाई पकड़ी। "तू बोल रही है, पर सुनने वाला कोई नहीं। मैं सिर्फ़ सुन रही हूँ, तेरी आवाज़ को नहीं। मुझे उसकी आवाज़ सुननी होगी।"

"क्या मतलब?"

"जब मैंने दीवार पर माँ का नाम लिखा था, तब मुझे सुनीता रोती सुनाई दी थी। वह मुझे सुनाई देती है, तुझे नहीं। इसीलिए तू बोल, और मैं सुनूँगी — पर मुझे उसकी आवाज़ ढूँढनी होगी, तेरी नहीं।"

मैंने टीन फिर बजाया। "सुनीता चौहान। पड़ाव गली।"

रिया ने आँखें बंद कीं।

कुछ देर कुछ नहीं हुआ। फिर मेरी गाड़ी का हॉर्न खुद बजा — छोटा, दबा हुआ, जैसे कोई हाथ लगाकर छोड़ गया हो। रिया की आँखें खुलीं और उसमें पानी था।

"सुन लिया," उसने कहा। "वह कह रही है — 'मेरा नाम मत लिखो, मेरा नाम मत लिखो, मुझे मेरे घर भेजो।'"

"घर?"

"वह कह रही है वह घर में बंद है। मरे हुए लोग घर में बंद नहीं होते, माँ।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा और मेरे हाथ से टीन गिर गया। मैंने उसे उठाया और फौरन जेब में डाला, फिर उस काग़ज़ की तरफ़ झुकी जो टीन के नीचे दबा था। एक पन्ना, मोड़ा हुआ, पीला, किनारे से फटा। मैंने खोला।

माँ की लिखाई थी। मैं उसे पहचानती हूँ — माँ के अक्षर सीधे नहीं थे, दाईं तरफ़ थोड़ा झुके हुए, और "म" हमेशा बड़ा बनता था।

लिखा था — "यह आवाज़ सुधा की है, सुनीता की नहीं। सुनीता तो बाद में आई। अगर मेरी बेटी यह पढ़ रही है, तो वह जान ले कि पहला नाम सुधा का है, और सुधा का नाम मैंने ही लिखवाया था। माफ़ कर देना।"

मैंने पन्ना रिया को दिया। वह दो बार पढ़ गई।

"सुधा कौन है?"

"मुझे नहीं पता।"

"तो पता करना पड़ेगा।"

उस रात हम घर लौटे और मैंने फोन मिलाया। प्रकाश जोशी — मेरे पिता — का नंबर। घंटी बजती रही। दस, बारह, पंद्रह बार। फिर कट गया। मैंने फिर मिलाया। इस बार सीधे "नंबर बंद है" वाली आवाज़ आई।

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