A Dark Secret – Chapter 358
"सुनीता चौहान," उसने दोहराया, जैसे नाम को मुँह में तोल रहा हो। "वह पीतल गली की नहीं थी। वह पड़ाव गली की थी। तीस साल पहले मिटी थी। इसका मतलब सरोज ने देर से शुरू किया है — सबसे पुराना नाम पहले।"
"गली कौन सी?"
"सुनीता के घर के सामने एक नीम था। पड़ाव गली के मोड़ पर। क्या वह अब भी है?"
"नहीं जानती।"
"होगा। नीम जल्दी नहीं मरता।" उसने रिया की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। "और आवाज़… सुनीता की आवाज़ बहुत ऊँची थी। वह गली भर में सुनाई देती थी। उसके पास एक टीन का टुकड़ा था, जिसे वह हिलाती रहती थी। वह बकरीवाली थी। सुबह छह बजे उसकी बकरियाँ निकलती थीं और शहर की नींद खुल जाती थी।"
"बकरी वाली औरत…" मैंने धीरे से कहा।
"हाँ। और उसके पति का नाम भी मैं जानता था, पर अब मेरे मुँह से नहीं निकलता। तुझे सिर्फ़ उसका नाम-गली-आवाज़ चाहिए। तीन चीज़ें। जब बोल, तो पहले उसकी आवाज़ याद रख — वह ऊँची आवाज़, टीन का ठक-ठक। फिर नाम। फिर गली।"
"क्यों इस क्रम में?"
"क्योंकि रजिस्टर आवाज़ से खुलता है और नाम से बंद होता है। उल्टा किया, तो दरवाज़ा खुलेगा और अंदर जो है वह बाहर आएगा — नाम पीछे रह जाएगा।"
मैंने गले में सूखा महसूस किया।
"तू साथ आएगा?"
"मैं नहीं आ सकता। मेरा नाम अभी लौटा है, मीरा। अगर मैं उस गली में जाकर खड़ा हुआ और उस औरत ने मुझे देखा, तो मेरा नाम फिर जाएगा। मैं वह जोखिम नहीं ले सकता।" उसने अपनी जैकेट की तरफ़ देखा। "अब मेरे पास वापस देने के लिए एक ही नाम है।"
मैं चुप बैठी रही।
"पर एक चीज़ है," वह बोला। "सुबह छह बजे, चाय के ठेले पर, चड्ढा जी आएँगे। उनसे पूछ — पड़ाव गली की बकरीवाली का रिकॉर्ड। सालों पहले उन्होंने एक फाइल देखी थी जिसमें सुनीता चौहान लिखा था। पर वह डरेंगे। तू उन्हें सरोज का नाम मत बताना।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर चड्ढा जी को पता चला कि सरोज ज़िंदा है, तो वह काजल को फोन कर देंगे। दस साल से उनका तबादला नहीं हुआ — तू समझ क्यों।"
मैं उठी। रिया भी उठी।
"रामदीन," मैंने कहा, "तूने माँ को जाना था। उससे माफ़ी क्यों नहीं माँगी?"
वह कुछ देर बैठा रहा। फिर बोला, "माँगी थी। जिस दिन वह मरी, मैं अस्पताल के बाहर खड़ा था। तेरे पिता अंदर थे। मुझे अंदर जाने नहीं दिया। मैंने दरवाज़े से ही कहा, 'सुशीला, माफ़ कर दे।' और उस रात मेरी जेब में पीतल की गोली आ गई। वह गोली मैंने तुझे दे दी। गोली माँ की तरफ़ से थी — सरोज के लिए।"
मैंने जेब में हाथ डाला। गोली वहीं थी।
"चल रिया," मैंने कहा।
घर पहुँचकर मैंने रिया को नाश्ता दिया, उसे स्कूल भेजने की सोची, फिर सोचा कि आज नहीं। उसे चाची के घर भेज दिया, दो गली दूर। फिर मैं आँगन में गई और दीवार के सामने खड़ी हो गई।
माँ का नाम अभी वहीं था — सुशीला जोशी — और उसके नीचे वह पहला नाम — सुनीता चौहान — जो मैंने सरोज के पन्ने से उठाया था, पर अभी बोला नहीं। दीवार पर उभरा था। मैंने पीतल की कलम उठाई, पर कुछ लिखने से पहले जेब से फोन निकाला।
प्रकाश जोशी। दो रिंग। तीन। पाँच।
फिर आवाज़ — "हाँ, बेटा।"
"पापा।"
"सब ठीक?"
"नहीं।" मैंने आँगन की दीवार पर हाथ रखा। "पापा, मुझे सच बताओ। माँ ने मकान खरीदते वक़्त क्या लिखवाया था?"
दूसरी तरफ़ चुप्पी।
"पापा।"
"तू क्यों पूछ रही है?"
"क्योंकि मुझे पता है कि उसमें मेरा नाम है। और अब मुझे यह भी पता है कि उसने कब लिखवाया। जब मैं पैदा नहीं हुई थी।" मेरी आवाज़ उठ गई — शायद पहली बार उनसे इतनी ऊँची। "पापा, तुम मुझे बताओ, माँ ने मुझे बेचा था क्या? उसने मेरा नाम उस रजिस्टर में क्यों लिखवाया?"
तब मैंने सुना — प्रकाश ने अपनी साँस रोकी। फिर कुछ खिसका, शायद कुर्सी। फिर वह बोले, और उनकी आवाज़ छोटी थी, जैसे खुद से बात कर रहे हों।
"तेरी माँ ने तुझे बेचा नहीं था, बेटा — उसने तुझे बचाने के लिए तेरा नाम लिखवाया था।"
और फोन कट गया।
मैंने फोन कान से हटाया और दीवार की तरफ़ देखा। सुनीता चौहान का नाम मेरे सामने लिखा था, स्याही गीली थी, और अब दीवार पर तीन शब्द और उभर आए — "बेचा नहीं, बचाया।"
मैंने डायल किया।
प्रकाश का फोन बंद था।
फिर सामने वाली खिड़की पर एक परछाई हिली। मैं पलटी — कोई नहीं था। पर आँगन के गेट पर एक काग़ज़ पड़ा था, जो अभी वहाँ नहीं था। मैंने उसे उठाया। बिना लिफ़ाफ़े का, मुड़ा हुआ, और उस पर सिर्फ़ एक लाइन —
"तेरी माँ ने तेरा नाम लिखवाया था, पर तेरा नाम रजिस्टर में पहले से था। तेरी माँ ने सिर्फ़ तारीख़ को आगे धकेला था। — भैरों"
मैंने उस लाइन को तीन बार पढ़ा। चौथी बार मेरे हाथ काँप रहे थे।
"माँ," रिया की आवाज़ पीछे से आई। "तूने मुझे चाची के घर भेजा था?"
मैं पलटी। रिया गेट पर खड़ी थी, हाथ में एक पीली चिट्ठी।
"तू वहाँ से आई कैसे?"
"चाची ने कहा, कोई तुझे बुलाने आया था। कह रहा था तेरे घर में कुछ हुआ है। मैं भागकर आई।" उसने चिट्ठी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "यह दीवार के नीचे पड़ी थी। माँ, यह माँ की लिखाई है।"
मैंने चिट्ठी ली। माँ की लिखाई — टेढ़ी, जल्दी में लिखी, जैसे हर चीज़ आज ही करनी हो। माँ की तीसरी चिट्ठी — जो संदूक में आधी कटी मिली थी। यह पूरी थी।
"जिस दिन रिया का नाम लिखवाया," माँ ने लिखा था, "मैंने सरोज से मिलने की कोशिश की। वह नीचे नहीं आई। उसने किवाड़ बंद कर दिया। मैंने दरवाज़े से कहा — 'बहन, मेरा बच्चा सुनीता की तरह गुम नहीं होगा। मैंने उसका नाम लिखवा दिया। अब शहर उसे भूल नहीं सकता।' और सरोज ने अंदर से कहा — 'शहर नहीं भूल सकता, सुशीला। पर रजिस्टर भूल सकता है।'"
मैंने आगे पढ़ा।
"उस दिन सरोज ने मुझे एक शर्त बताई — 'तेरे बच्चे का नाम रजिस्टर में है, तो एक दिन वह उसे उठाने आएगा। जिस दिन वह आए, तू उससे कह देना कि मैंने तेरा नाम उस दिन लिखवाया जिस दिन सरोज ने मुझे बताया था कि सुनीता का नाम मिटा है। मेरी बेटी मरे हुए नामों में से एक नाम वापस लाएगी।'"
मैंने चिट्ठी नीचे रख दी।
रिया ने मेरी तरफ़ देखा।
"माँ, क्या हुआ?"
"तेरे नानी ने मेरा नाम सिर्फ़ बचाने के लिए नहीं लिखवाया था।" मेरी आवाज़ किसी और की लग रही थी। "उसने मेरा नाम एक काम के लिए लिखवाया था — कि मैं उन सबके नाम वापस लाऊँ जो गए।"
रिया ने मेरा हाथ पकड़ा।
"तो तू वह काम करेगी ना?"
"करूँगी।"
"अच्छा।" उसने सिर हिलाया, बिल्कुल वैसे जैसे मैं हिलाती हूँ। "तो फिर रोना बंद कर और चाय बना। कल रात बकरीवाली का नाम बोलना है, और आज सुबह चड्ढा जी से मिलना है।"
मैं उसकी तरफ़ देखकर हँस पड़ी — पहली बार कई दिनों में, और वह हँसी किसी चीज़ से नहीं आई, बस आ गई।
"तू माँ की बेटी है।"
"पता है," उसने कहा। "चाय में चीनी कम डालना।"
सुबह छह बजे मैं चाय के ठेले पर पहुँची। चड्ढा जी वहाँ थे, बेंच के किनारे, कप हाथ में। मैं उनके सामने बैठ गई।
"पड़ाव गली," मैंने कहा। "बकरीवाली सुनीता चौहान। तीस साल पहले। एक फाइल थी।"
चड्ढा जी ने कप नीचे रखा। उनका चेहरा बदला — नाराज़गी नहीं, और कुछ। डर।
"किसने भेजा?"
"रामदीन ने।"
उन्होंने आसपास देखा। "मैं कुछ नहीं जानता।"
"आप जानते हैं। और अब आपके पास दो रास्ते हैं। या आप मुझे वह फाइल दिखाते हैं। या मैं अगले हफ़्ते उसी फाइल के साथ आपके केबिन में आऊँगी, और उस वक़्त आपके सामने सिर्फ़ एक चीज़ होगी — आपका अपना नाम, जो अब भी पूरा है।"
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