A Dark Secret – Chapter 357
मैं गाड़ी में बैठी। रिया ने मेरी तरफ़ देखा, कुछ नहीं पूछा।
"उसका नाम सरोज है," मैंने कहा।
"मुझे पता था।"
"कैसे?"
"तूने हथेली में गोली रखी थी। मैंने उस पर लिखा देख लिया।"
मैंने गाड़ी चालू की। सुबह की हवा खिड़की से आई, ठंडी।
"माँ," रिया ने कहा। "अब क्या?"
"अब कल रात। सुनीता चौहान।"
"अकेले?"
"अकेले।"
"पर मैं तुझे काग़ज़ दूँगी — अपना नाम लिखा हुआ। और तू मुझे अपना देगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। फिर मैंने होंठ कसे, गाड़ी की स्पीड बढ़ाई, और उस रात जब मैं सुनीता चौहान का नाम बोलूँगी, मुझे यह नहीं पता था कि चालीस साल पहले की कोई आवाज़ मेरे पीछे खड़ी होगी।
और वह भी अपना नाम बोलना चाहेगी।
॥
रिया ने पहले मेरी तरफ़ देखा, फिर दरवाज़े की तरफ़। स्याही की महक अब कमरे में खड़ी थी, दीवार पर माँ का नाम अभी सूखा नहीं था, और मेरे हाथ में सरोज का दिया पीला पन्ना था — सुनीता चौहान।
मैंने पन्ना जेब में रखा और रसोई की तरफ़ बढ़ी। चूल्हे पर पानी रखा, फिर रिया की तरफ़ देखा।
"तू सो जा।"
"तू भी सो जा।"
"मुझे अस्पताल जाना है। रामदीन से कुछ पूछना है।"
रिया ने चादर सीधी की और बैठ गई। "मैं भी आ रही हूँ।"
"रिया।"
"माँ, तू अकेले जाएगी, तो मैं यहाँ बैठकर उसी दीवार को देखती रहूँगी। और वह दीवार आज रात मुझे अच्छी नहीं लग रही।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। बारह साल की बच्ची, चौदह घंटे से जागी हुई, और उसकी आवाज़ में वह चीज़ थी जो मेरे पास नहीं थी — साफ़-साफ़ कह देने की आदत।
"जल्दी उठ। दो मिनट।"
अस्पताल के बाहर वाली बेंच पर रामदीन बैठा था। सुबह के पाँच बजे थे, आसमान में हल्की धुंध, और वह अपनी भूरी जैकेट में ऐसे बैठा था जैसे रातभर वहीं बैठा हो।
"चाचा।"
उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर रिया की तरफ़, फिर अपने पान मसाले की तरफ़।
"तू पूछने आई है।"
"हाँ।"
"पूछ।"
मैं उसके सामने बैठ गई। रिया उसके बगल में खड़ी रही।
"मेरी माँ की बहन का नाम सरोज था। तूने बताया कि तूने उसका नाम मिटाया था। अब पूरी बात बता। क्या हुआ था उस रात?"
रामदीन ने पान मुँह में रखा और दूर आसमान की तरफ़ देखा। फिर वह बोला, धीमा, टुकड़ों में।
"चालीस साल पहले मैं हवेली में ड्राइवर था। बाबू हरनाम की गाड़ी चलाता था। सुबह छह बजे निकलना, रात नौ बजे लौटना। उस घर में जो होता था, वह मुझे नहीं बताया जाता था। पर गाड़ी में बैठे-बैठे आदमी बहुत कुछ बोल जाता है।"
"क्या बोलता था?"
"बाबू हरनाम का एक ही डर था — रजिस्टर। वह कहता था, 'जिस दिन यह काग़ज़ मेरे हाथ से निकला, उस दिन यह शहर मेरा नहीं रहेगा।'"
रिया ने पूछा, "तो किसने चुराया था?"
रामदीन ने उसकी तरफ़ देखा और कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "तेरी माँ की बहन ने। सरोज ने।"
मैंने साँस रोकी।
"वह उस घर में काम करती थी — स्याही बनाती थी, पन्ने सुखाती थी, तारीख़ें लिखती थी। बाबू हरनाम उस पर भरोसा करता था। पर एक दिन उसने देख लिया कि रजिस्टर में किस-किस का नाम है, और उन नामों का क्या होता है। उसने रजिस्टर उठाया और भागने की कोशिश की।"
"पकड़ी गई?"
"पकड़ी नहीं गई। रजिस्टर उसके हाथ में था और वह हवेली के पिछले दरवाज़े तक पहुँच गई। पर वहाँ मैं खड़ा था।"
रामदीन ने अपने हाथों की तरफ़ देखा। उसकी उँगलियाँ घुटनों पर रखी थीं, स्थिर, पर मैंने देखा कि वे हल्की काँप रही थीं।
"बाबू हरनाम ने मुझे हुक्म दिया — 'इसका नाम मिटा।' मैं बीस साल का था। नौकरी नई थी। घर में माँ बीमार थी। मैंने कलम उठाई।"
"तूने मिटा दिया?"
"मैंने काग़ज़ पर उसका नाम लिखा, और फिर उसके नीचे तारीख़। चालीस साल पहले की तारीख़। बस। उसके बाद मैंने कभी उसका नाम नहीं बोला।"
"क्यों नहीं बोला?"
रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें धुँधली थीं, पर उसमें वह चीज़ थी जो सिर्फ़ उस आदमी की होती है जिसने चालीस साल एक ही गलती को अपने अंदर रखा हो।
"क्योंकि जो अपना नाम भूल जाता है, वह किसी का नाम बोलना भी भूल जाता है। मैं उसका नाम याद रखना चाहता था, पर मैंने उसे काग़ज़ पर दर्ज कर दिया था। जिस चीज़ को रजिस्टर एक बार ले ले, उसे इंसान का मुँह वापस नहीं देता। मैंने चालीस साल में कई बार कोशिश की — हर बार 'स' तक आता और आगे कुछ नहीं।"
मैंने रिया की तरफ़ देखा। वह बेंच की सीमेंट पर अपने पैर से कोई रेखा बना रही थी।
"तो वह ज़िंदा है?" मैंने पूछा।
"हवेली के नीचे जो औरत रहती है — वही सरोज है। मैंने तुझे देर से बताया, यह मेरी गलती है। पर मैं डरता था कि तू मुझसे पूछेगी — 'तूने क्यों किया?' और मेरे पास जवाब नहीं था।"
"तूने मुझे बताया था कि तूने सरोज से माफ़ी माँगी थी?" मैंने पूछा।
"माफ़ी नहीं माँगी। मैं उसके सामने खड़ा हुआ था, एक बार, बीस साल पहले। उसने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। बस कहा, 'जा, रामदीन। और अब कभी मेरा नाम मत लेना।'"
"तो तूने क्यों नहीं लिया?"
"क्योंकि उसके बाद मेरे पास उसका नाम नहीं था। मेरे पास सिर्फ़ उसकी आवाज़ थी — पीछे से आती हुई, जब वह हवेली के पिछले दरवाज़े से नीचे उतर रही थी, मुझसे कह रही थी, 'सुशीला को बोल देना कि मैंने उसका नाम नहीं छुआ।'"
मैं सीधी बैठ गई।
"माँ का नाम? सरोज ने माँ का नाम नहीं छुआ?"
"उसने मुझे नाम मिटाने से पहले यही कहा था। पर जब रजिस्टर में उसका नाम गया, तो उसके साथ उसके हाथ का सारा काम भी चला गया। और उसके बाद सुशीला ने जो किया —"
"माँ ने क्या किया?"
रामदीन ने पान थूका और अपने हाथ जैकेट की जेब में डाल दिए।
"तेरी माँ ने मकान खरीदा। यह जानकर खरीदा कि उस घर का नाम रजिस्टर में है। और उसने अपनी होने वाली बच्ची का नाम उसमें लिखवाया।"
"क्यों?"
"क्योंकि उसे लगा कि अगर उसका बच्चा रजिस्टर में होगा, तो शहर उसे कभी नहीं भूल सकता। उसे लगा कि यह एक तरह की जगह है — शहर में पक्की जगह।"
मैंने मुँह खोला, पर कुछ नहीं निकला।
"पर सरोज के लिए यह धोखा था," रामदीन ने कहा। "सरोज खुद कभी रजिस्टर में नहीं लिखी गई थी। उसने अपना नाम नहीं लिखवाया। और उसकी बहन ने अपने बच्चे का नाम लिखवा दिया। सरोज को लगा कि सुशीला ने उसके साथ वही किया जो बाबू हरनाम ने उसके साथ किया था। दोनों ने मिलकर उसे काग़ज़ बना दिया।"
"पर सरोज ने मुझसे अभी बात की," मैंने कहा। "उसने मुझे रजिस्टर दिया, पन्ना दिया, कहा कि मैं आऊँ। अगर उसे माँ से इतनी शिकायत थी, तो मुझसे क्यों मिल रही है?"
रामदीन ने पहली बार मेरी तरफ़ पूरा देखा।
"क्योंकि सरोज ने तुझे बचपन में देखा है। सुशीला हर महीने उसके पास आती थी — कुएँ की सीढ़ियों तक आती थी, दाल भेजती थी, तेरी तस्वीर लाती थी। सरोज ने तेरी हर तस्वीर रखी है। वह माँ से नाराज़ थी, तुझसे नहीं।"
मैंने रिया की तरफ़ देखा। उसने सीमेंट पर बनाना बंद कर दिया था और मेरी तरफ़ देख रही थी।
"माँ," उसने कहा। "तू रो रही है।"
"नहीं रो रही।"
"रो रही है।"
मैंने आँखें पोंछीं। "क्या करूँ, धूल है।"
रिया मेरे बगल में बैठ गई और मेरा हाथ पकड़ लिया।
रामदीन उठने लगा। मैंने उसे रोका।
"रुक। एक बात और। सुनीता चौहान का नाम कल रात बोलना है। उसकी गली और आवाज़ क्या है?"
रामदीन फिर बैठ गया। इस बार उसने जेब से पान नहीं निकाला।
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