A Dark Secret – Chapter 356
"आधा।"
"आधा?"
"नाम बोला, पर पूरा नहीं बोला। मैंने लिखा, बोला नहीं। कल सुबह जब तीन बार बोलूँगी, तब पूरा होगा।"
रात को रिया जल्दी सो गई। मैं जागती रही, रजिस्टर सीने से लगाए। तीन बजे रिया उठी, बिना आवाज़ किए। मेरे पास आकर बैठ गई।
"माँ, मुझे नींद नहीं आ रही।"
"डर लग रहा है?"
"नहीं।" उसने अपनी कलाई देखी। "निशान कल से कम है। मुझे लगता है कल रात कुछ हुआ जो रजिस्टर को रोक गया।"
मैंने उसका हाथ उठाया। सच में, निशान कल से हल्का था। यह अच्छी खबर थी। पर अच्छी खबरें इस शहर में महँगी पड़ती थीं।
तीन आधे बजे मैंने वर्दी पहनी। रिया उठी, मेरी जेब में मेरे नाम-पते वाली परची डाली, और बोली, "मैं तुझे गेट तक छोड़ने चलूँगी।"
"रिया—"
"बस गेट तक। गाड़ी से उतरूँगी नहीं।"
मैं मान गई।
एम्बुलेंस से हम हवेली के पीछे की गली में पहुँचे। वहाँ पुराना लोहे का दरवाज़ा था, जंग लगा, चुप। रिया गाड़ी में बैठी रही, खिड़की खुली। मैं उतरी, जेब से पीतली गोली निकाली, हथेली में रखी।
गली बिल्कुल खाली थी। पर स्याही की महक थी, वही गोंद जैसी, पुरानी।
मैंने दरवाज़े के सामने खड़ी होकर गोली को कसकर पकड़ा। फिर तीन बार बोली —
"सरोज जोशी। पीतल गली। तेरी आवाज़।"
कुछ नहीं हुआ।
मैंने दूसरी बार बोला — "सरोज जोशी। पीतल गली। तेरी आवाज़।"
दरवाज़े की जंग हिली, जैसे हवा आई हो। पर कुछ नहीं खुला।
तीसरी बार मैंने गोली को दोनों हाथों में जकड़ा, आँखें बंद कीं, और धीमे से बोला, जैसे कोई चालीस साल पुराना राज़ बता रही हो —
"सरोज जोशी। पीतल गली। तेरी आवाज़।"
दरवाज़ा खुला।
अंदर सीढ़ियाँ थीं — पत्थर की, संकरी, नीचे। नीचे से हवा आ रही थी, गरम। मैंने पीछे मुड़कर देखा। रिया मुझे देख रही थी। मैंने सिर हिलाया। वह भी हिलाई।
फिर मैंने अंदर कदम रखा।
सीढ़ियाँ नीचे गईं, दस, पंद्रह, बीस। जितनी नीचे, उतनी स्याही की महक गहरी। आख़िर में एक कमरा था, पत्थर का, छोटा। वहाँ लालटेन जल रही थी, हवा में धीमी, पीली।
कोने में एक औरत बैठी थी। छोटी, दुबली, बाल सफ़ेद और कटे हुए, हाथ में पीतल की एक कलम। वह उठी नहीं, मेरी तरफ़ देखा, सिर थोड़ा झुकाकर।
"तू आई," उसने कहा। आवाज़ धीमी, खुरदरी, जैसे चालीस साल से बोलना भूल गई हो। "मैंने सोचा था तू सिर्फ़ बोलेगी, अंदर नहीं आएगी।"
"आप सरोज हैं?"
"सरोज याद है तुझे?" उसकी आँखों में कुछ चमका। "माँ की बहन?"
"माँ नहीं बता पाई।"
"वह बताना चाहती थी।" उसने कलम मेज़ पर रखी। "पर रजिस्टर ने उसे बोलने ही नहीं दिया। उसने तेरा नाम लिखा, और उसी रात उसका अपना नाम उठना शुरू हो गया। फिर वह ज़्यादा देर रुक नहीं सकी।"
"आप जानती थीं?"
"मैं वहाँ थी। हवेली में। मैंने देखा तेरी माँ रो रही थी, और बाबू हरनाम मुस्कुरा रहा था।" उसने मेरी तरफ़ देखा, आँखें सीधी। "उस रात मैंने कहा — मेरा नाम मिटा दो। मैं बाहर चली जाऊँगी और तेरी बेटी को बचाऊँगी। पहले माँ ने मना किया, फिर मान गई।"
"तो आप चालीस साल से यहाँ हैं।"
"चालीस साल।" उसने कमरे के चारों तरफ़ हाथ फैलाया। "सिर्फ़ इस वजह से कि मैं सुनती रहूँ। जब कोई नाम उठता है, मैं उसे यहाँ सुनती हूँ। हर नाम, हर गली, हर आवाज़।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मेरे पास रजिस्टर है। असली वाला। और उसके सारे नाम मेरे सीने में हैं।"
मैंने साँस ली। "आपको मेरा नाम बोलना था।"
"तेरा नहीं।" उसने सिर हिलाया। "तेरी बेटी का।"
"नहीं।"
"सुन।" वह उठी। छोटी थी, पर सीधी खड़ी हुई, कमर तक। "मैंने चालीस साल में एक बात सीखी है — जो नाम बचाया जा सकता है, उसे बचाना पड़ता है। तेरी बेटी का नाम रजिस्टर में आधा है। अगर कोई उसे पूरा नहीं बोलेगा, तो वह आधा ही रहेगा। और आधा नाम वाला इंसान ज़िंदा तो रहता है, पर अपना पूरा नहीं हो पाता।"
"तो आप उसे पूरा कर दीजिए।"
"मैं नहीं कर सकती।" उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ टूटा। "मेरा नाम रजिस्टर में नहीं है। जो नाम रजिस्टर में नहीं है, वह रजिस्टर से कुछ नहीं माँग सकता। मैं सिर्फ़ सुन सकती हूँ, सँभाल सकती हूँ, गिन सकती हूँ। पर बोल नहीं सकती।"
"तो फिर कौन बोलेगा?"
उसने मेरी तरफ़ देखा। लंबा देखा। फिर उसने अपनी कलम उठाई, अपनी मेज़ से एक पीला पन्ना निकाला, और उस पर पीतल की कलम से एक नाम लिखा।
"यह तेरा काम है," उसने कहा। "कल से। हर रात, एक नाम। मैं तुझे बताऊँगी। हर नाम के साथ गली और आवाज़। तू उस काग़ज़ पर लिखेगी, फिर उस गली में जाकर बोलेगी। जब तक रजिस्टर में सिर्फ़ रिया का नाम और बाबू हरनाम की मुहर न बचे।"
"और रिया?"
"रिया का नाम मैं नहीं बचा सकती। पर तू बचा सकती है। रिया का नाम रजिस्टर में आधा है, इसलिए वह खुद बोल सकती है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पर उसे अपने नाम का आधा हिस्सा भी चाहिए — वह नाम जो आज भी उसकी हाज़िरी से मिट रहा है। वह हिस्सा तू लाएगी, उसकी क्लास के रजिस्टर से।"
मैंने उस पीले पन्ने पर देखा। पीतल की कलम से लिखा नाम था — "सुनीता चौहान।"
"यह कौन है?"
"पहली औरत जिसे बाबू हरनाम ने मिटाया था। पहली गली, पहली आवाज़।" उसने पन्ना मेरी तरफ़ बढ़ाया। "कल रात, यह नाम बोलना। मैं सुनूँगी, गिनूँगी, और अगर गलत हुआ, तो मेरी आवाज़ तेरे कान में आएगी। अगर सही हुआ, तो वह औरत तेरे सामने आएगी — चालीस साल बाद।"
मैंने पन्ना लिया। हाथ काँप रहे थे।
"एक बात," मैंने कहा। "जब मैं वहाँ बोलूँगी, तब काजल?"
सरोज पीछे हटी, पत्थर की दीवार से टिक गई। उसके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो चालीस साल की हिम्मत से निकला हुआ था।
"काजल ने उस रात हवेली में मुझे देखा था," उसने कहा। "मैंने उसे गुज़ारिश की — रोक मुझे। पर वह आठ साल की थी। अपने दादा के सामने वह क्या करती?"
"तो वह जानती है आप यहाँ हैं?"
"वह जानती है," सरोज ने कहा। "और इसीलिए वह मुझसे डरती है। क्योंकि जानती है कि मैं वह नाम बोल सकती हूँ जिसके बाद उसका कारोबार नहीं बचेगा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पर एक बात जान ले, मीरा। काजल उस रात मुझे रोक न पाई, इसका ग़म उसने चालीस साल अपने अंदर रखा। और आज वह तुझसे मदद करने आई थी, याद है? यह ग़म ही है।"
मैंने पन्ना जेब में रखा। सरोज की तरफ़ देखा, फिर सीढ़ियों की तरफ़।
"मैं आऊँगी," मैंने कहा। "हर रात।"
"कल रात से शुरू," उसने कहा। "पर एक शर्त।"
"क्या?"
"जब हम सब नाम हो जाएँ, तब तू रजिस्टर मुझे देगी। मैं उसे कुएँ में डालूँगी।"
"रजिस्टर जलता नहीं।"
"जलता नहीं, डूबता है।" उसने सिर हिलाया। "टूटता नहीं, बहता है। यह कुएँ के नीचे का राज़ है। जो पानी इसे छूता है, वह सारा नाम अपने साथ ले जाता है। पर तब तक वह पानी सूख चुका होगा, और तब तक हम सब ज़िंदा होंगे — खुश नहीं, ज़िंदा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। चालीस साल से एक कुएँ के नीचे बैठी औरत, जो माँ की बहन थी, और जिसने शहर से अपना नाम खुद मिटवा दिया था।
"अब जा," उसने कहा। "सुबह होने वाली है। और तेरी बेटी ऊपर गाड़ी में अकेली बैठी है।"
"आप उसे जानती हैं?"
"मैं हर महीने सुशीला के मुँह से उसका नाम सुनती थी। मुझे पता है वह कैसी है। और मैं जानती हूँ वह डरती नहीं।"
मैं सीढ़ियाँ चढ़ी। बाहर निकली, गली में। सुबह की हल्की रोशनी आ रही थी। एम्बुलेंस वहीं थी। रिया खिड़की से बाहर देख रही थी।
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