A Dark Secret355 / 536

A Dark Secret – Chapter 355

6 min read November 6, 2026

"मेरी माँ की बहन?" मैंने दोहराया। "माँ की कोई बहन थी?"

"थी।" उसकी आवाज़ टूट रही थी, जैसे चालीस साल का ज़ंग छूट रहा हो। "छोटी बहन। तेरी माँ से चार साल छोटी। नाम—"

वह रुका।

"नाम क्या था?" मैंने पूछा।

"मैंने ही उसका नाम रजिस्टर से मिटाया था।"

अस्पताल की लाइट ऊपर टिमटिमाई, फिर स्थिर हो गई। मैंने रिया का हाथ कसकर पकड़ा। रिया ने मेरी तरफ़ देखा, और मैंने उसकी आँखों में वही चीज़ देखी जो मेरे अंदर चल रही थी — कुछ ऐसा जो अब तक सिर्फ़ काग़ज़ों में था, अब खून में आ गया था।

"तुमने क्यों मिटाया?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ सुनकर मुझे खुद अजीब लगी।

रामदीन बेंच पर बैठ गया। उसने अपने घुटनों की तरफ़ देखा।

"क्योंकि मैं उस वक़्त बोलना नहीं जानता था," उसने कहा। "और वह जानती थी।"

"क्या जानती थी?"

"यह कि रजिस्टर में उसका नाम कहाँ लिखा है।" उसने अपनी जेब से पान मसाला निकाला, पर मुँह में नहीं रखा, हाथ में पकड़े रहा। "वह हरनाम के लिए स्याही बनाती थी, पर खुद का नाम कभी नहीं लिखवाया। उसने अपनी बहन, तेरी माँ, को कहा था कि तू अपनी बेटी का नाम लिखवा देना, ताकि उसे शहर में जगह मिले। और तेरी माँ ने वही किया।"

"माँ ने मेरा नाम लिखवाया था।"

"हाँ। पर रजिस्टर ने उसे दो बार पढ़ा। एक बार माँ के लिए, एक बार बेटी के लिए। उसने कहा था — दो नाम लिखे, दो नाम उठेंगे।" रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। "तेरी माँ रोई थी। मैंने देखा था। उसने रजिस्टर से कहा था — मेरा नाम लो, बेटी को छोड़ दो। पर रजिस्टर नहीं माना। उसने पहले तेरी माँ का नाम उठाया। फिर…"

वह रुक गया।

"फिर क्या?"

"फिर उसकी बहन ने अपना नाम खुद मिटवा दिया।"

मैंने रिया की तरफ़ देखा। वह बिल्कुल चुप खड़ी थी, होंठ कसे हुए, आँखें मेरे चेहरे पर।

"क्यों?" मैंने पूछा।

"क्योंकि वह जानती थी कि अगर उसका नाम रजिस्टर से निकल गया, तो वह रजिस्टर से बाहर हो जाएगी। और जो नाम रजिस्टर से बाहर है, वह रजिस्टर को छू सकता है। वह हवेली के नीचे उतर गई। वहीं रहती है। चालीस साल से।"

मेरे हाथ काँप रहे थे।

"तो वह मेरी मौसी है," मैंने कहा।

"हाँ।"

"और वह चालीस साल से हवेली के नीचे इसलिए है क्योंकि तुमने उसका नाम मिटाया?"

"नहीं।" रामदीन ने अपना सिर उठाया। पहली बार उसकी आवाज़ में कुछ साफ़ था, बिना हिचक। "मैंने उसका नाम मिटाया, हाँ। पर वह नीचे मेरी वजह से नहीं उतरी। वह नीचे उतरी क्योंकि उसने खुद चुना। उसने कहा — रामदीन, तू मेरा नाम मिटा दे, ताकि मैं रजिस्टर के बाहर हो जाऊँ। और तू वह काम कर जो मैं नहीं कर सकती।"

"कौन सा काम?"

"तेरी हिफ़ाज़त।"

अस्पताल के बरामदे में एक स्ट्रेचर गुज़रा, पहिया बाईं तरफ़ खींचता हुआ। दूर कहीं एक नर्स ने किसी का नाम पुकारा। रामदीन ने पान मसाला जेब में रखा और अपने घुटनों पर हाथ रखकर बैठा रहा।

"तेरी माँ की मौत के बाद," उसने कहा, "वह औरत हर महीने उसी कुएँ से ऊपर आती थी और तेरे बारे में पूछती थी। सुशीला ने उससे कहा था — मीरा को मत छूना, उसे मत बताना, वह ठीक है। इसलिए वह चुप रही। चालीस साल। पर अब रजिस्टर जाग गया है और वह अब और चुप नहीं रहेगी।"

"क्योंकि रिया का नाम है।" मैंने रिया की तरफ़ देखा।

"क्योंकि रिया का नाम है," रामदीन ने दोहराया। "और वह रिया को रखवाला बनाना नहीं चाहती। वह चाहती है कि रिया का नाम लौटे। पर उसके पास वह ताकत नहीं। उसके पास सिर्फ़ वह रजिस्टर है जो असली है, और उसके पन्ने पढ़ने का तरीक़ा। बोलने का तरीक़ा तुझे सीखना होगा।"

रिया ने पहली बार बोला।

"चाचा, वह नानी है?"

रामदीन ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भर आईं, पर उसने पोंछा नहीं।

"तेरी माँ की मौसी," उसने कहा। "हाँ। तेरी नानी की तरह।"

"तो वह बुरी नहीं है?"

"नहीं।" रामदीन ने सिर हिलाया। "वह चालीस साल से सिर्फ़ एक काम कर रही है — उन नामों को सँभाल रही है जो रजिस्टर ने उठा लिए। वह उन्हें याद रखती है। हर नाम, हर गली, हर आवाज़। वह खुद भूल गई है कि वह कौन है, पर औरों को नहीं भूलेगी।"

मैंने गहरी साँस ली। रिया का हाथ मेरे हाथ में था, छोटा, गरम।

"कल सुबह," मैंने कहा। "सुबह छह बजे के बजाय, सुबह चार बजे। मैं उससे मिलूँगी।"

"वह तुझे तभी मिलेगी जब तू उसका नाम बोलेगी।"

"उसका नाम क्या है?"

रामदीन ने रिया की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।

"तेरी माँ का नाम सुशीला था," उसने कहा। "उसकी छोटी बहन का नाम सरोज था।"

मैं स्तब्ध रह गई।

"सरोज?"

"हाँ। इस शहर का नाम उसी के नाम पर पड़ा था। बाबू हरनाम ने खुद रखा था — सरोज नगर। पर उसने बाद में वह नाम भी रजिस्टर से मिटवा दिया, क्योंकि जिसका शहर, उसका नाम।"

मेरे हाथ काँप रहे थे। रिया ने मेरी उँगलियाँ दबाईं।

"तो मुझे 'सरोज' बोलना है?"

"तीन बार। पूरा नाम, गली, आवाज़।"

"मुझे उसकी आवाज़ नहीं पता।"

रामदीन ने अपनी जेब से कुछ निकाला। एक पुरानी सिक्के जैसी पीली चीज़, हथेली पर रखी। पीतल की छोटी चपटी गोली, जिस पर खुदा था — "सरोज"।

"यह मेरे पास चालीस साल से है," उसने कहा। "तू इसे हथेली में रखकर बोलेगी, तो आवाज़ सही निकलेगी। फिर यह तेरी।"

"क्यों अब दे रहे हो?"

"क्योंकि अब मेरा पूरा नाम मेरे पास है। मैं अपना काम कर चुका।"

रामदीन उठा। बेंच छोड़कर खड़ा हुआ, कमर सीधी करके, पहली बार। उसने अस्पताल के गेट की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।

"कल सुबह चार बजे," उसने कहा। "हवेली के पीछे वाला दरवाज़ा। मैं वहाँ नहीं आऊँगा। रिया भी नहीं आएगी।"

"क्यों नहीं?"

"क्योंकि वह औरत सिर्फ़ तुझसे मिलेगी। और तेरे पास उस वक़्त सिर्फ़ एक नाम होगा — सरोज।" वह मुड़ा, फिर रुका। "और मीरा — अगर वह तुझे अपना नाम बताए, तो उसे तुरंत तीन बार दोहरा देना। चाहे जो हो जाए। वरना वह औरत फिर भूल जाएगी, और उसके साथ चालीस साल के सारे नाम भूल जाएँगे।"

वह चला गया। अस्पताल के गेट से बाहर, सड़क पर, और फिर हमने उसे नहीं देखा।

रिया ने मेरी तरफ़ देखा।

"माँ, तू रो रही है?"

"नहीं।"

"तेरे हाथ ठंडे हैं।"

"तेरे भी तो।"

उसने मुस्कुराने की कोशिश की, नहीं हुई।

"तो कल सुबह चार बजे?"

"हाँ।"

"और मैं?"

"तू अस्पताल में रामदीन के साथ।"

"पर वह तो कह गया कि वह वहाँ नहीं आएगा—"

"वह हवेली के पीछे नहीं आएगा। अस्पताल में तो रहेगा ही।"

रिया ने सिर हिलाया। फिर उसने अपनी जेब से माँ की वह छोटी स्याही की पुड़िया निकाली, जो उसने कल मेज़ पर रखी थी। "मैं इसे अपने पास रखूँगी।"

"वह तेरी है।"

"पर माँ, एक बात।"

"क्या?"

"अगर वह औरत तेरी मौसी है, तो वह तुझे कुछ ऐसा बताएगी जो हमें तोड़ेगा।"

"कैसे पता?"

"क्योंकि जो लोग चालीस साल एक कुएँ के नीचे रहते हैं, वे सच बोलते हैं। चिकनी बातें उन्हें आती ही नहीं।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। बारह साल की बच्ची, जो अपनी माँ को उसकी ही मौसी के बारे में सच बता रही थी।

हम घर लौटे। शाम को मैंने आँगन की दीवार धोई, पर नाम नहीं गए — सुशीला जोशी, रिया जोशी, आज की तारीख़। दीवार के नीचे नया नाम उभर रहा था, धीरे-धीरे, अधूरा। मैंने रजिस्टर खोला। आख़िरी पन्ने पर मेरे लिखे सुशीला जोशी के नीचे नई लाइन आ गई थी —

"एक नाम बोला गया। शहर हिला। तारीख़ रुकी।"

रिया ने पीछे से देखा।

"तो हमने सही किया?"

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