A Dark Secret – Chapter 354
"पर मेरा नाम हाज़िरी से मिट रहा है।"
"तभी तो।" मैंने उसके हाथ की तरफ़ देखा। निशान कलाई पर था, धुँधला, पर कल से थोड़ा और फैला हुआ। "अगर तेरा नाम वहाँ मिट रहा है, तो हमें उसे वहीं जाकर देखना होगा। बाहर से नहीं देख सकते।"
रिया ने सोचा। फिर वह उठी, पानी का गिलास भरा, पिया, और बोली, "ठीक है। पर एक शर्त।"
"बोल।"
"तू मुझे स्कूल के गेट तक छोड़ेगी, और वहीं खड़ी रहेगी। पूरे दिन नहीं, बस छुट्टी तक।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर मेरा नाम मिटने लगा, तो तुझे पता चलेगा।" उसने गिलास रखा। "तू वह चीज़ें देख लेती है जो दूसरों को नहीं दिखतीं। दीवार पर नाम, फोटो में औरत। मुझे लगता है यह तेरी कमज़ोरी नहीं, तेरी आँख है।"
मैंने कुछ नहीं कहा। वह ठीक कह रही थी, और मुझे यह सुनना अच्छा नहीं लगा।
सुबह छह बजे मैंने चाय ठेले की तरफ़ नहीं देखा। सात बजे रिया को वर्दी पहनाई, बाल बाँधे, टिफ़िन दिया, और एम्बुलेंस से स्कूल छोड़ने चली गई। रास्ते में वह खिड़की से बाहर देखती रही, कुछ नहीं बोली। गेट पर उतरते वक़्त बोली, "तू वहीं खड़ी रहना। पेड़ के नीचे।"
"जा।"
वह अंदर गई। मैं पेड़ के नीचे खड़ी रही। आधे घंटे बाद गाड़ी लेकर अस्पताल भी नहीं गई। उसी जगह खड़ी रही।
क्लास में क्या हुआ, रिया ने दोपहर में फोन पर बताया। उसकी आवाज़ धीमी थी, जैसे किसी के सुनने के डर से।
"माँ, हाज़िरी लग रही थी। मिसेज़ देसाई नाम बोल रही थीं। जब मेरा नंबर आया, मैंने 'हाज़िर' कहा। फिर मैंने कहा — मिसेज़, शालिनी नायक आज नहीं आई?"
मैंने मुट्ठी कसी।
"फिर?"
"फिर वह रुक गईं। पूरी क्लास चुप। उन्होंने रजिस्टर देखा, दोबारा देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा और कहा — शालिनी कौन? मैंने कहा, शालिनी, मेरी दोस्त, वह मेरे साथ बैठती थी। तो वह चिल्लाईं। सबके सामने। कहा कि इस क्लास में ऐसा कोई बच्चा कभी नहीं था, और मैं झूठ बोल रही हूँ, और मुझे अपने मन से नाम नहीं बनाने चाहिए।"
"तूने क्या किया?"
"कुछ नहीं। मैं बैठ गई।"
"रिया—"
"माँ, सुन पूरा।" उसकी आवाज़ में कुछ बदला। "लंच के बाद मैं बरामदे में गई। वहाँ पुरानी तस्वीरों का बोर्ड है। पिछले साल की क्लास फोटो। मैंने देखा।"
"और?"
"मैं फोटो में हूँ, तीसरी कतार में। मेरे बगल में एक जगह खाली है। बिल्कुल खाली। जैसे किसी को काटकर निकाला गया हो। पर काटा हुआ नहीं लगता, माँ। बस जगह है, और उस जगह के चारों तरफ़ बच्चे मुस्कुरा रहे हैं। मैंने फोन से फोटो खींच ली।"
"घर आ।"
"छुट्टी में आ रही हूँ। पर माँ—"
"क्या?"
"मुझे उस फोटो में शालिनी नहीं दिख रही। सिर्फ़ जगह दिख रही है।"
मैंने फोन रखा। पेड़ के नीचे खड़ी रही, हाथ ठंडे थे। मुझे उस फोटो में शालिनी दिख रही थी — यह मुझे पता था, देखे बिना भी पता था। क्योंकि मुझे वे चीज़ें दिखती हैं जो शहर मिटा रहा है।
तीन बजे रिया बाहर आई। गाड़ी में बैठते ही फोन खोला और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
मैंने देखा।
फोटो में बच्चों की तीन कतारें थीं, नीली वर्दी, सफ़ेद पट्टी। तीसरी कतार में रिया खड़ी थी, और उसके बगल में शालिनी — सफ़ेद कॉलर, बालों में नीली रिबन, हल्की मुस्कान, एक हाथ रिया के कंधे पर।
"देख," रिया ने कहा। "वहाँ।"
"हाँ, देख रही हूँ। वह तेरे कंधे पर हाथ रखे है।"
रिया ने मेरी तरफ़ देखा, आँखें फैल गईं।
"माँ, वहाँ कोई नहीं है। मैं देख रही हूँ, बिल्कुल खाली जगह है। तेरे हिसाब से वहाँ शालिनी है, और मेरे हिसाब से—"
"खाली जगह।"
"हाँ।"
हम दोनों फोन की तरफ़ देखते रहे। एक ही तस्वीर, दो अलग चीज़ें। मेरे लिए एक लड़की खड़ी थी, उसके लिए हवा।
मैंने गाड़ी चालू की।
"कहाँ जा रहे हैं?" रिया ने पूछा।
"अस्पताल।"
रामदीन बेंच पर बैठा था, वही भूरी जैकेट, जेब में पान मसाला। मैंने सीधे उसके सामने खड़ी होकर फोन दिखाया।
"इस फोटो में क्या दिख रहा है तुम्हें?"
उसने देर तक देखा। फिर आँखें ऊपर उठाईं। कुछ नहीं बोला।
"रामदीन," मैंने कहा। "मैं जानती हूँ तुम कुछ छिपा रहे हो। तुम 'रजिस्टर' शब्द पहले भी बोल चुके हो। कब्रिस्तान में, हवेली में, सीढ़ियों पर। तुम्हें सब पता है।"
उसने आसपास देखा। अस्पताल का बरामदा, दूर एक नर्स, बाबूलाल गेट पर खड़ा। रामदीन ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे बेंच के कोने पर खींच लिया।
"फोटो में लड़की दिख रही है?" उसने धीमे से पूछा।
"हाँ।"
"कपड़े कैसे?"
"नीली वर्दी, सफ़ेद कॉलर।"
रामदीन ने आँखें बंद कर लीं, जैसे कोई पुराना दर्द उठ आया हो।
"तुझे दिखती है," उसने कहा। "तो तेरी आँखें अभी साफ़ हैं। अभी।"
"क्या मतलब?"
"मतलब यह कि जो लोग मिटते हैं, उन्हें सिर्फ़ वही देख पाता है जिसका नाम अभी रजिस्टर में ताज़ा है। तेरा नाम है। इसलिए दिख रही है। और रिया का नाम भी है, पर रिया का नाम आधा है — इसलिए उसे नहीं दिख रही।"
रिया ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"रामदीन।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "शालिनी कहाँ है? उसकी माँ कहाँ है? मुझे सिर्फ़ इतना बता — वे ज़िंदा हैं या नहीं?"
रामदीन उठ खड़ा हुआ। बेंच से तीन क़दम दूर गया, फिर रुका।
"ज़िंदा हैं," उसने कहा। "पर ज़िंदा होने से क्या होता है, अगर तेरा नाम तेरे पास नहीं?"
"तो फिर वे कहाँ हैं?"
वह लौटा। मेरे पास आकर खड़ा हुआ, इतना पास कि उसकी साँस सुनाई दे।
"तेरे को हवेली के पीछे वाली औरत से मिलना पड़ेगा।"
"मैं मिल चुकी हूँ। नीचे वाले कमरे में।"
"नहीं।" उसने सिर हिलाया। "वह स्याही बनाने वाली है। मैं किसी और की बात कर रहा हूँ। वह औरत जो हवेली के पीछे वाले दरवाज़े के नीचे रहती है — जिसका नाम कभी रजिस्टर में नहीं लिखा गया। वही असली रजिस्टर रखती है। और वही जानती है कि कौन सा नाम कहाँ गया।"
"तो मैं उससे मिलूँगी।"
"उससे मिलना आसान नहीं।"
"क्यों?"
रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने चालीस साल की थकान जैसा समझा।
"क्योंकि वह किसी से नहीं मिलती। वह सिर्फ़ उनसे बोलती है जिनके नाम उसने खुद सुने हों।"
"तो मेरा नाम उसने सुना है। सुशीला ने उसे हर महीने बोला था — यह तुमने ही तो कहा था।"
"हाँ।" उसने गला साफ़ किया। "पर वह तुझसे मिलने से पहले एक शर्त रखेगी।"
"क्या?"
"वह पूछेगी कि तू उसका नाम जानती है या नहीं।"
मैं रुक गई। रिया ने मेरी तरफ़ देखा।
"उसका नाम क्या है?" मैंने पूछा।
रामदीन ने आसमान की तरफ़ देखा, वैसे ही जैसे वह हमेशा देखता है जब कोई सवाल सीधा हो और जवाब टेढ़ा।
"उसका नाम," उसने कहा, "किसी ने नहीं लिखा। इसलिए किसी को याद नहीं।"
"तो फिर वह ज़िंदा कैसे है?"
"क्योंकि उसका नाम कभी टूटा नहीं। जो लिखा नहीं गया, वह मिटेगा कैसे?"
मैंने सोचा। फिर मैंने वह बात कही जो मेरे मन में कल से घूम रही थी, जो मैं कहने से बच रही थी।
"रामदीन। वह औरत कौन है?"
वह हिला। पहली बार, चालीस साल में पहली बार, मैंने उसकी आवाज़ में घबराहट सुनी। उसने दोबारा आसपास देखा। फिर वह मेरे कान के पास झुका।
"वह तेरी माँ की बहन थी।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए। रिया ने मेरा हाथ पकड़ा, उसने सुना नहीं था, पर मेरा चेहरा देख लिया था।
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