A Dark Secret353 / 536

A Dark Secret – Chapter 353

7 min read November 6, 2026

मैंने तीसरी चिट्ठी उठाई। यह अधूरी थी, आख़िरी हिस्सा फटा हुआ।

"अगर मैं न रहूँ तो मीरा को बताना कि—"

बस। उसके आगे कुछ नहीं था। फटा हुआ किनारा, पीला, पुराना।

"माँ," रिया ने कहा। "माँ, इसका आगे कुछ है। यह फटा नहीं है। यह काटा हुआ है। देख, किनारे सीधे हैं।"

उसने सही कहा। फटा हुआ काग़ज़ रेशेदार होता है। यह सीधा कटा हुआ था।

"तो आगे का हिस्सा कहीं है," मैंने कहा।

मैंने संदूक दोबारा छाना। कपड़े झटके, साड़ियाँ खोलीं, सिक्का उठाया। कुछ नहीं।

फिर मेरा हाथ संदूक के अस्तर के नीचे गया। कुछ सख़्त था, काग़ज़ जैसा नहीं।

मैंने अस्तर फाड़ा।

एक छोटी पुड़िया निकली, पीली, वैसी ही जैसी रामदीन ने दी थी — पर यह ज़्यादा छोटी थी, और इसमें स्याही सूखी नहीं, गाढ़ी थी। पुड़िया के साथ एक पर्ची लिपटी थी, माँ की लिखाई में —

"यह स्याही मत फेंकना। यह रिया के काम आएगी।"

रिया ने पर्ची पढ़ी। फिर मेरी तरफ़ देखा।

"माँ, नानी को कैसे पता था कि मेरा नाम रिया होगा? मैं तो उनके मरने के बाद पैदा हुई।"

मेरे हाथ से पुड़िया फिसल गई। रिया ने झटके से पकड़ी।

"माँ?"

"माँ ने तेरा नाम चुना था," मैंने कहा, धीरे से। "अस्पताल में, मेरे होने से पहले। उन्होंने कहा था — बेटी होगी तो रिया।"

"तो यह स्याही—"

"यह स्याही तेरे लिए बनाई गई थी। मेरे होने से पहले।"

रिया ने पुड़िया खोली। स्याही गाढ़ी थी, पर बह रही थी। उसमें से वही गोंद जैसी महक उठी, पर इस बार कुछ और भी था — थोड़ी मीठी, थोड़ी जली हुई, जैसे कोई चीज़ बहुत देर तक आँच पर रखी रही हो।

"माँ," रिया ने कहा। "यह स्याही मेरे निशान पर लगे तो क्या होगा?"

"मत करना।"

"पर अगर—"

"रिया। मत करना।"

वह रुकी। पुड़िया बंद की, पर जेब में नहीं रखी। मेज़ पर रख दी, ठीक उसी जगह जहाँ रजिस्टर था।

"मैं इसे फेंकने नहीं दे रही," उसने कहा। "पर मैं इसे इस्तेमाल भी नहीं कर रही। अभी।"

बाहर आँगन में कुछ गिरा। हल्की आवाज़, जैसे काग़ज़ का टुकड़ा हवा से आकर गिरा हो।

मैं दौड़कर बाहर गई। आँगन में कुछ नहीं था। दीवार पर नाम वही थे, तारीख़ें वही। पर गेट के नीचे से एक लिफ़ाफ़ा अंदर सरक आया था, आधा अंदर, आधा बाहर।

मैंने उठाया। बिना नाम। खोला।

अंदर एक पर्ची थी, किसी और की लिखाई में, बड़े अक्षरों में —

"सुबह छह बजे चाय ठेले पर मत आना। जो आएँगे, वे तेरे नाम के साथ आएँगे।"

मैंने लिफ़ाफ़ा पलटा। पीछे कुछ नहीं। पर जैसे ही मैंने उसे पलटा, उँगली पर कुछ लगा — गीली स्याही, ठंडी।

मैंने हाथ देखा। उँगली पर कुछ लिखा था, बहुत छोटा, बहुत महीन — एक नाम।

"सुशीला।"

मैंने पर्ची फाड़ दी। फिर सोचा, और टुकड़े उठाकर जेब में रख लिए। क्यों, यह मुझे भी नहीं पता। बस रख लिए।

रिया दरवाज़े पर खड़ी थी।

"किसका लिफ़ाफ़ा?"

"पता नहीं।"

"क्या लिखा है?"

मैंने उसे पर्ची दिखाई। उसने पढ़ा, फिर मेरी तरफ़ देखा।

"तो हम नहीं जाएँगे?"

"जाएँगे।" मैंने दीवार की तरफ़ देखा। "पर तेरे साथ नहीं।"

"माँ—"

"रिया, सुन।" मैंने उसके कंधे पकड़े। "जो भी वहाँ आएगा, उसके पास मेरा नाम होगा। मेरा नाम, मेरी गली, मेरी आवाज़। अगर मैं वहाँ अकेली जाऊँगी, तो मुझे पता रहेगा कि कौन आया। पर अगर तू साथ होगी, तो उनके पास तेरा नाम भी होगा। और तेरा नाम अभी मेरे से भी कमज़ोर है।"

"तो मैं घर पर अकेली?"

"रामदीन के पास। अस्पताल में।"

"मैं चाचा के पास रहूँगी," उसने कहा। "पर एक बात।"

"क्या?"

"तू जाएगी, तो मेरा नाम भी साथ ले जाएगी। लिखकर। जेब में। ताकि अगर तू भूल जाए, तो काग़ज़ याद दिला दे।"

मैंने उसे देखा। बारह साल की बच्ची, जो अपनी माँ को उसकी ही याददाश्त से बचाने का तरीक़ा बता रही थी।

मैंने पीतल की कलम उठाई और उसी पल उसके हाथ की तरफ़ देखा। निशान अब पूरी कलाई पर था, धुँधला, पर साफ़। रिया ने मेरी नज़र पकड़ ली।

"वह बढ़ रहा है," उसने कहा। "रोज़ थोड़ा।"

"मुझे पता है।"

"कितना वक़्त है?"

पतली औरत ने कहा था — चालीस दिन। आज सोलह था।

"चौबीस दिन," मैंने कहा।

रिया ने सिर हिलाया। कोई सवाल नहीं। कोई डर नहीं। बस सिर हिलाया, और उसके बाद कहा, "तो पहला नाम किसका बोलेंगे?"

"पता नहीं। पर सुबह तक तय कर लेंगे।"

रिया चारपाई पर लेट गई, पर आँख खुली रखी। मैंने रजिस्टर उठाया और आख़िरी पन्ना देखा।

रिया का नाम थोड़ा और मोटा हो गया था।

और उसके नीचे एक नई लाइन थी, जो सुबह तक नहीं थी —

"तारीख़ आगे बढ़ी। कारण — नाम नहीं बोला गया।"

रजिस्टर अब हमें बता रहा था। नाम न बोलने पर तारीख़ आगे बढ़ती जाती है। बोलने पर वह रुकती है। शायद पीछे भी हटती है।

मैंने अपनी जेब से पर्ची के टुकड़े निकाले और उन्हें जोड़कर मेज़ पर रखा। "सुशीला" अब भी वहाँ था, धुँधला, पर पढ़ा जा सकता था।

मैंने पीतल की कलम उठाई और रजिस्टर के आख़िरी पन्ने पर, रिया के नाम के नीचे, एक नया नाम लिखा। अपने हाथ से, अपनी स्याही से।

"सुशीला जोशी।"

स्याही पकड़ी, टिकी, फैली नहीं।

और उसी वक़्त, आँगन की दीवार पर, मेरे नाम के ऊपर, एक नया नाम उभरा — धीरे-धीरे, एक-एक अक्षर।

"सुशीला जोशी। तारीख़ — आज।"

रिया चारपाई से उठ बैठी।

"माँ, तूने क्या किया?"

"पहला नाम बोल दिया," मैंने कहा। "अब रजिस्टर को पता है कि हम खेल रहे हैं।"

बाहर गली में कुछ चला, धीरे-धीरे, जैसे कोई पैर घसीट रहा हो। रिया ने मेरा हाथ पकड़ा। हम दोनों दरवाज़े की तरफ़ देखते रहे।

कोई नहीं आया। पर स्याही की महक अब घर के अंदर थी, कमरे में, बिस्तर के नीचे, दीवार के अंदर। और उस महक के साथ एक आवाज़, बहुत धीमी, जो अब सिर्फ़ मेरे कान में नहीं, रिया के भी कान में आ रही थी।

रिया ने मेरी तरफ़ देखा, आँखें बड़ी।

"माँ, यह तो—"

"हाँ।"

"यह तो नानी की आवाज़ है।"

॥

रिया ने पहले मेरी तरफ़ देखा, फिर दरवाज़े की तरफ़। स्याही की महक अब कमरे में खड़ी थी, दीवारों से रिसती हुई।

"नानी?" उसने धीमे से कहा। "मतलब तेरी माँ?"

मैंने सिर हिलाया। आवाज़ गई थी, पर गई कहाँ — यह पता नहीं था। जैसे कोई दीवार के पीछे से बोला हो और फिर पीछे हट गया हो।

"माँ, तू डर रही है?"

"नहीं।" मैंने कलम मेज़ पर रखी। "मैं सोच रही हूँ।"

"क्या?"

"कि सुबह छह बजे मैं चाय ठेले पर जाऊँ या नहीं।"

रिया चारपाई पर बैठ गई, घुटने मोड़कर। उसकी आँखों में नींद नहीं थी, सिर्फ़ हिसाब।

"अगर तू नहीं गई," उसने कहा, "तो जो आने वाले थे, वे घर आ जाएँगे।"

"हाँ।"

"और अगर तू गई, तो वहाँ जो मिलेगा, वह पहले से तय है।"

"हाँ।"

"तो फिर?"

मैंने दीवार पर लिखा माँ का नाम देखा — सुशीला जोशी, तारीख़ आज। स्याही अब सूख रही थी, किनारों से पीली पड़ रही थी, जैसे पुराना काग़ज़।

"तो फिर," मैंने कहा, "हम वहाँ नहीं जाएँगे जहाँ वे बुला रहे हैं। हम वहाँ जाएँगे जहाँ वे नहीं चाहते।"

रिया ने मेरी तरफ़ देखा। "कहाँ?"

"कल सुबह तेरी क्लास।"

उसका मुँह खुला रह गया।

"मेरी क्लास?"

"तू स्कूल जाएगी।"

"माँ, तूने कल ही तो मुझे स्कूल से निकाला था। मिसेज़ देसाई ने कहा था—"

"मुझे पता है मिसेज़ देसाई ने क्या कहा।" मैंने कुर्सी खींचकर बैठी। "सुन। अगर तू कल स्कूल नहीं गई, तो सबको शक होगा। स्कूल वालों को, पड़ोसियों को, उस औरत को भी जो हवेली में बैठी है। उसे लगेगा कि हम डर गए। और जो डर जाता है, उसे वे आसानी से उठा लेते हैं।"

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