A Dark Secret – Chapter 352
"रुक।" मैंने उसकी तरफ़ उँगली उठाई। "वह काग़ज़ मेरा है। मेरे हाथ की लिखाई है। मैं अभी जाकर ले आती हूँ।"
"हवेली के दरवाज़े सुबह तक बंद हैं," उसने कहा। "सुबह चार बजे से पहले कोई नहीं खोलेगा, कोई नहीं खुलेगा। रजिस्टर जाग गया है। आज रात उसने अपना हिसाब शुरू कर दिया है। जो भीतर है, वह बाहर नहीं आएगा। जो बाहर है, वह भीतर नहीं जाएगा।"
"तुम्हें कैसे पता?"
"क्योंकि मैंने एक बार कोशिश की थी," उसने कहा। "उन्नीस सौ चौरासी में। दरवाज़ा खटखटाया, कोई नहीं खोला। सुबह तक खड़ा रहा, फिर लौट आया। सुबह देखा तो मेरे जूतों के नीचे स्याही लगी थी, और मेरी जेब में वह काग़ज़ था जो मैंने कभी लिखा ही नहीं था।"
पतली औरत आगे आई। उसने अपना हाथ बढ़ाया, जिसमें कपड़े में लिपटी कलम थी।
"यह तेरी है," उसने कहा। "अब इसे अपने पास रख। स्याही बनाना तू सीख जाएगी। पर पहले यह सीख कि कौन सा नाम पहले बोलना है।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो पहला नाम तू बोलेगी, वह सबसे पहले लौटेगा। और जो सबसे पहले लौटेगा, वह सबको बताएगा कि लौटना मुमकिन है।"
मैंने कलम ली। पहली बार उसका वज़न महसूस किया — हल्की, ठंडी, पर हथेली में बैठ जाने वाली।
"हवेली में जो काग़ज़ है," मैंने कहा, "उसमें बारह नाम हैं। रामदीन, तेरे पास बारह और हैं, और चार जो तूने कभी लिखे नहीं। अगर वह काग़ज़ उनके हाथ में है तो वे पहले उन्हें मिटाएँगे।"
"नहीं।" रामदीन ने सिर हिलाया। "वे पहले उन्हें उठाएँगे। मिटाने में वक़्त लगता है। उठाने में नहीं।"
"फ़र्क़ क्या?"
"उठाना मतलब वे उस नाम को कहीं और ले जाएँगे। दूसरे काग़ज़ पर, दूसरी तारीख़ पर, दूसरे आदमी के हाथ पर। और फिर वह नाम जो अब तक एक जगह बैठा था, अब दो जगह होगा। और जब नाम दो जगह हो जाए, तो उसे पूरा याद रखना नामुमकिन हो जाता है।"
मैंने रिया की तरफ़ देखा। खिड़की से उसकी आँखें चमक रही थीं। वह सब सुन रही थी।
"तो सुबह चार बजे," मैंने कहा। "मैं हवेली जाऊँगी।"
"तू अकेली नहीं जाएगी," रामदीन ने कहा। "आज रात मुझे भी अपना पूरा नाम याद है। यह पहली बार है चालीस साल में।"
उसकी आवाज़ में कुछ था जो मैंने पहले नहीं सुना — जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपने ही नाम को चख रहा हो।
"रामदीन," मैंने कहा। "पूरा नाम?"
"रामदीन यादव। पीतल गली, पीतल गली का चौथा मकान। आवाज़ — आवाज़ मेरी।" उसने अपना गला साफ़ किया। "यह मेरी आवाज़ है ना?"
"हाँ," रिया ने गाड़ी से कहा। "चाचा, तेरी आवाज़ है।"
रामदीन मुस्कुराया। पहली बार। दाँत कम थे।
"तेरी वजह से," उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा। "उस रात सीढ़ियों पर तूने मेरा नाम बोला था। तब से वह लौटता जा रहा है, रोज़ थोड़ा-थोड़ा।"
पतली औरत कुछ बोलने को हुई, फिर रुक गई। उसने रामदीन की तरफ़ देखा, जैसे इजाज़त माँग रही हो। रामदीन ने सिर हिलाया।
"वह बेवकूफ़ी कर रही है," औरत ने कहा, मेरी तरफ़ देखकर। "आँगन में बारह नाम लिखकर। इससे वह रजिस्टर को बुला रही है। नाम लिखे जाने से उठते नहीं, पर बुलाए ज़रूर जाते हैं। अब रजिस्टर को पता है कि तेरे पास कलम है, स्याही है, और ज़िद है। और रजिस्टर को ज़िद पसंद नहीं।"
"तो मिटा दूँ?"
"नहीं।" उसने अपना पतला हाथ उठाया। "जो लिखा गया है, वह अब तेरा काग़ज़ है। वह गवाही है। अगर तू मिटाएगी, तो तेरे पास कुछ नहीं बचेगा। रहने दे।"
रिया ने गाड़ी का दरवाज़ा खोला और बाहर कूद पड़ी।
"माँ।"
"रिया, गाड़ी में—"
"नहीं।" वह सीधी मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। "तू हर बार मुझे गाड़ी में बैठाती है। अब मैं तेरे साथ खड़ी रहूँगी।"
उसका निशान अब साफ़ दिख रहा था, कलाई के नीचे तक। मैंने उसे देखा और कुछ नहीं कहा।
"सब सुन रही थी," मैंने कहा।
"हाँ। और मुझे एक बात समझ आई।" उसने पतली औरत की तरफ़ देखा। "आपने कहा कि रजिस्टर ज़िद पसंद नहीं करता। तो फिर रजिस्टर मेरे पीछे क्यों पड़ा है? मैंने क्या ज़िद की?"
पतली औरत ने उसे देखा। लंबी देर तक।
"तूने ज़िद नहीं की," उसने कहा। "तेरी माँ ने की। तू सिर्फ़ उसका नाम है जो सबसे आख़िर में जोड़ा गया। और रजिस्टर को आख़िरी नाम सबसे ज़्यादा चुभते हैं।"
अस्पताल के गेट पर लाइट जल उठी। कोई आ रहा था। रामदीन ने हमें पीछे खींच लिया।
"अब जाओ," उसने कहा। "सुबह छह बजे चाय ठेले पर। मैं घरवालों को लेकर आऊँगा। तू काग़ज़ वाला काम कर। जो नाम याद हैं, उन्हें काग़ज़ पर उतार। पर एक बात — अब जब भी लिखे, अपना नाम पहले लिख। हर बार। हर काग़ज़ पर। तेरा नाम, तेरी गली, तेरी आवाज़।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो लिखता है, वह भूलता नहीं। और जो अपना नाम नहीं लिखता, उसका नाम दूसरा लिख देता है।"
घर पहुँचे तो रात के साढ़े चार बजे थे। बूढ़े जोड़े की खिड़की में बत्ती बुझ चुकी थी।
आँगन में दाख़िल होते ही मैंने दीवार देखी। नाम वहीं थे, पर अब कुछ और भी था। मेरे नाम के नीचे एक लाइन जुड़ गई थी — "तारीख़ बदल गई है।"
मैंने रिया की तरफ़ देखा।
"कल पंद्रह थी," रिया ने कहा। "आज सोलह है।"
"मतलब?"
"मतलब वह तारीख़ जो मेरे नाम के नीचे लिखी थी, अब आगे बढ़ गई है। रजिस्टर सिर्फ़ मेरा नाम नहीं लिख रहा। वह तारीख़ भी चला रहा है।"
मैंने दीवार के पास जाकर देखा। मेरे नाम के नीचे जो तारीख़ थी, वह भी बदल गई थी। दोनों तारीखें एक-एक दिन आगे खिसक गई थीं।
मैंने कलम उठाई, स्याही में डुबोई, और दीवार पर अपना नाम लिखने को हुई।
"माँ, रुक।" रिया ने मेरा हाथ पकड़ा। "अगर तू इसे मिटाएगी तो पता कैसे चलेगा कि रजिस्टर किसे उठा रहा है?"
"मैं मिटाने नहीं—"
"तू लिखने जा रही थी ना? ऊपर से?"
मैं रुक गई। उसकी बात में दम था। अगर मैंने अपना नाम दीवार पर दोबारा लिखा, तो दो नाम हो जाएँगे। और दो नाम मतलब दो जगह। और दो जगह मतलब दो तारीख़ें। और मैं खुद को और फँसा लेती।
"ठीक है," मैंने कहा। "यह जैसा है, वैसा रहेगा। कलम नीचे रख।"
हम अंदर गए। रिया चारपाई पर बैठी। मैंने अलमारी खोली और वह संदूक निकाला जो माँ का था — पुरानी लकड़ी, ऊपर से धूल, अंदर से महक जो आज भी उन्हीं की थी।
माँ की चीज़ें कभी पूरी नहीं छाँटी थीं। डर था कि छाँटते-छाँटते कहीं वह मिल जाएँगी जो मरने के बाद नहीं मिलनी चाहिए।
आज मैंने पूरा संदूक खाली किया।
कपड़े, दो साड़ियाँ, एक पुराना सिक्का, कुछ तस्वीरें — और तीन चिट्ठियाँ। तीनों एक ही लिफ़ाफ़े में, एक ही लिखाई में, पर किसी पर डाक टिकट नहीं, किसी पर पता नहीं।
"ये तो भेजी ही नहीं गईं," रिया ने कहा।
"नहीं भेजी गईं।"
पहली चिट्ठी माँ की लिखाई में थी, तारीख़ बीस साल पुरानी। लिखा था —
"प्रकाश, मकान का सौदा करते वक़्त कुछ ऐसा हुआ जो मैं तुम्हें नहीं बता सकती। बस इतना जान लो कि घर हमारा है, और रहेगा। मैंने कुछ लिखवा दिया है। कोई बड़ी बात नहीं। काग़ज़ी काम है।"
मैंने रिया की तरफ़ देखा। वह अपनी कलाई को रगड़ रही थी, धीरे-धीरे, जैसे स्याही को जगह से हिला रही हो।
दूसरी चिट्ठी, तारीख़ छह महीने बाद की —
"उस औरत ने कहा कि बच्ची का नाम लिखना पड़ेगा, वरना मकान हमारा नहीं रहेगा। वह काग़ज़ लेकर आई थी — पीला, मोटा। मैंने पूछा कि बच्ची का नाम क्यों। वह हँसी और बोली — जो घर में आएगा, उसका नाम तो पहले से लिखा जाता है। मैंने कहा बच्ची अभी हुई नहीं। वह बोली — तो होने वाली बच्ची का नाम लिख दो। मैंने लिख दिया।"
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