A Dark Secret – Chapter 351
"माँ, मैं तुझे अकेले नहीं जाने दूँगी।" उसने मेरी तरफ़ देखा, आँखें सूखी, हाथ साफ़। "मैंने एक नाम देखा है। शालिनी का। मैं उसे भूली नहीं। और अगर मैं भूलूँगी, तो… तो मेरा नाम भी चला जाएगा।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। वह ठंडा था। बहुत ठंडा।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक शर्त। रजिस्टर तेरे हाथ नहीं लगेगा। जब तक मैं कहूँ, दूर रहेगी तू उससे।"
"माँ—"
"यह शर्त है, रिया।"
वह कुछ देर देखती रही। फिर सिर हिलाया। छोटा, एक बार।
रामदीन ने घड़ी देखी। "मैं बूढ़ा आदमी हूँ। तीन घंटे सो लेता हूँ, फिर चाय के ठेले पर मिलता हूँ। तू तब तक तैयारी कर।" वह चलने लगा, फिर रुका। "और मीरा — जब लिखे, तो पेंसिल से नहीं। पीतल की कलम से।"
"क्यों?"
"क्योंकि तेरी पेंसिल की लिखाई मिटती है।" उसने अपनी जेब में हाथ डाला और एक छोटी सी पीली पुड़िया निकाली, जो उसने पहले नहीं दिखाई थी। "यह रख। इसमें सूखी स्याही है। पानी डालकर गाढ़ी कर लेना।"
"आपके पास यह कहाँ से?"
"बीस साल पहले तेरी माँ ने दी थी। कहा था — जिस दिन मेरी बेटी को ज़रूरत पड़े, दे देना।" उसने पुड़िया मेरे हाथ में रखी। "लगता है आज वह दिन है।"
वह चला गया। सुमित्रा देवी भी मुड़ीं। जाने से पहले उन्होंने रिया की तरफ़ देखा। "तू अपने हाथ की तरफ़ देखती रहना," उन्होंने कहा। "अगर निशान बढ़े, तो मुझे बताना। बढ़ना शुरू हो जाए तो रोकना मुश्किल होता है।"
वह गईं। गली खाली थी। सिर्फ़ एम्बुलेंस, सोडियम की पीली रोशनी, और हवेली का बंद पीला दरवाज़ा।
मैंने रजिस्टर बैग में रखा। रिया ने मेरा हाथ पकड़ा।
"माँ, मुझे डर लग रहा है।"
"मुझे भी," मैंने कहा।
"तो हम क्यों जा रहे हैं?"
"क्योंकि हम रुके तो वह आएगा।" मैंने एम्बुलेंस का दरवाज़ा खोला। "और जब वह आएगा, तब हम तैयार नहीं होंगे। अभी हम तैयार हो रहे हैं।"
हम बैठे। इंजन चला। एम्बुलेंस ने हवेली की गली से बाहर निकलते हुए एक बार हॉर्न दिया, खुद से, जैसे कोई और बजा रहा हो। रिया ने डैशबोर्ड पर चिपकी अपनी तस्वीर की तरफ़ देखा।
"माँ, उस औरत को क्या कहते हैं? जो नीचे थी?"
"किसी ने उसका नाम नहीं रखा," मैंने कहा। "तो कहते क्या?"
"मैं उसे नाम दे सकती हूँ? अपनी तरफ़ से?"
"नाम देने से वह रजिस्टर में आ जाएगी, रिया।"
"पर वह पहले से नहीं है ना? तो जो नाम मैं दूँगी, वह किसी और का नहीं होगा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मैं उसे 'नानी' बुलाऊँगी। मेरी नानी का नाम नहीं, बस नानी।"
मैंने गाड़ी रोक दी। बीच सड़क पर, सुनसान, रात के तीन बजे।
"तू क्या कर रही है?"
"मैं उसे बचाना चाहती हूँ," उसने कहा। "वह चालीस साल से अकेली है, माँ। किसी ने उसे नाम नहीं दिया। मैं उसे नाम दूँगी।"
मैंने गाड़ी आगे बढ़ाई। कुछ नहीं बोली। पर अंदर, कहीं, एक डर और एक उम्मीद दोनों जगह बना रहे थे।
घर पहुँचे तो रात के चार बजे थे। बूढ़ा जोड़ा सो रहा था। मैंने पिछले आँगन की लाइट जलाई। रिया ने कुर्सी खींची, बैठी, और अपने हाथ की तरफ़ देखने लगी।
उसका निशान उँगली से बढ़कर हथेली की तरफ़ बढ़ रहा था। कल तक जो एक उँगली पर था, वह अब तीन उँगलियों तक फैल चुका था, धुँधला, पर फैलता हुआ।
मैंने पीली पुड़िया खोली। स्याही, सूखी, पत्थर जैसी। मैंने उसमें पानी की चार बूँदें डालीं और पीतल की कलम की नोक डुबोई। स्याही गाढ़ी हुई, काली, और उसमें से वही पुरानी गोंद जैसी महक उठी।
मैंने रजिस्टर खोला। पन्ने फिर खाली थे। आख़िरी पन्ने पर मेरा नाम और रिया का नाम। रिया का नाम थोड़ा और मोटा हो गया था।
"रिया," मैंने कहा। "काग़ज़ ला। जितना मिले, सब।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। "क्यों?"
"क्योंकि मैं आज रात बारह नाम लिखूँगी। इस कलम से। इस स्याही से। और फिर देखते हैं, कौन किसको भूलता है।"
रिया उठी। अलमारी खोली। पुरानी कॉपियाँ निकालीं, कुछ जली हुई जिल्द वाली, कुछ खाली। मेज़ पर रखीं।
मैंने पीतल की कलम उठाई। नोक काग़ज़ पर रखी। पहला नाम याद किया — शालिनी नायक, शांति विहार फेज़ दो, गली सात।
फिर वही हुआ जो रामदीन ने कहा था। स्याही पकड़ी, टिकी, फैली नहीं।
और उसी वक़्त, मेरे पीछे, आँगन की दीवार पर, गीली स्याही से कुछ उभरने लगा — धीरे-धीरे, एक-एक अक्षर। मैंने पलटकर देखा।
दीवार पर लिखा था — "तेरे पास रजिस्टर है, पर तेरे पास वह नहीं है जो उसमें लिखा है।"
मैंने रिया की तरफ़ देखा। उसने दीवार देखी, फिर मेरी तरफ़। उसकी आँखों में वही डर था जो मेरे पेट में था।
"माँ," उसने कहा। "हमारे पास क्या नहीं है?"
मैंने अपनी बाँहें देखीं। कलम थी, काग़ज़ था, स्याही थी, रजिस्टर था। रिया थी, मेरे पास, सामने खड़ी।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर सुबह तक पता चल जाएगा।"
मैंने कलम फिर उठाई और दूसरा नाम लिखा। आँगन की दीवार पर नया नाम उभरा, और मेरे हाथ से स्याही की महक उठी — वही पुरानी, फँसी हुई, मीठी। और उस महक के साथ एक और आवाज़ आई, बहुत धीमी, जैसे किसी ने दूर से मेरा नाम पुकारा हो — और फिर चुप।
॥
आँगन की दीवार पर जो आख़िरी नाम उभरा था, वह अभी सूखा नहीं था कि मेरे हाथ से कलम छूट गई। स्याही की महक गाढ़ी होकर फैल रही थी, और उसी महक के साथ वह आवाज़ फिर आई — दूर से, दबी हुई, जैसे कोई कुएँ के अंदर से बुला रहा हो।
रिया ने मेरी कलाई पकड़ ली।
"माँ, तेरा हाथ काँप रहा है।"
"तेरा भी।"
"मेरा नहीं। मेरा तो ठंडा है। देख।"
उसने हथेली सामने की। निशान अब तीन उँगलियों से बढ़कर कलाई की तरफ़ जा रहा था, धुँधला, पर साफ़ दिख रहा था — स्याही फैलने का रास्ता।
मैंने रजिस्टर बंद किया और रिया का हाथ अपनी जेब में डाल दिया, जैसे छिपाने से कुछ रुक जाएगा।
"गाड़ी में चल," मैंने कहा। "अभी।"
"कहाँ?"
"रामदीन के पास। अस्पताल।"
रिया ने दीवार की तरफ़ देखा। उसका नाम वहाँ अब भी उभरा हुआ था, मेरे नाम के नीचे, तारीख़ के साथ।
"और ये?"
"ये रहने दे। मिटाने की कोशिश मत करना। मैंने आज रात एक बार कोशिश की, और देख क्या हुआ।"
हम पिछले दरवाज़े से निकले। बूढ़े जोड़े की खिड़की में बत्ती जल उठी थी, पर कोई बाहर नहीं आया। एम्बुलेंस पहली किक पर ही चल पड़ी, जो अपने आप में अजीब था।
अस्पताल के बाहर बेंच पर रामदीन बैठा था, पर आज वह अकेला नहीं था। उसके पास वही पतली औरत खड़ी थी — सफ़ेद साड़ी, हाथ में कपड़े में लिपटी पीतल की कलम। मैंने गाड़ी रोकी और रिया की तरफ़ देखा।
"गाड़ी में रह।"
"माँ—"
"रिया। गाड़ी में रह। दरवाज़ा अंदर से बंद कर ले।"
वह बैठी रही, पर खिड़की खुली रखी। मैं जानती थी वह सुन रही है। मुझे उससे कुछ छिपाना नहीं था।
रामदीन उठा। उसके हाथ में पान मसाला नहीं था, और वह पहली बार मुझे सीधा देख रहा था, बिना आसमान की तरफ़ देखे।
"काग़ज़?" उसने पूछा।
"क्या?"
"तेरी नोटबुक। बारह नाम। वह तेरे पास है?"
मैंने जेब टटोली। फिर दूसरी। फिर कमीज़ के अंदर वाली जेब।
"हवेली में," मैंने कहा। "सीढ़ियों पर। पानी बढ़ रहा था, रिया की जेब से गिर गई।"
रामदीन ने आँखें बंद कर लीं। एक लंबी साँस ली, जैसे किसी पुराने दर्द को अंदर धकेल रहा हो।
"तो अब वह काग़ज़ उनके हाथ में है," उसने कहा। "और जो नाम काग़ज़ पर हों, उन्हें कोई भी उठा सकता है। बोल सकता है, मिटा सकता है, आगे बढ़ा सकता है।"
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