A Dark Secret350 / 536

A Dark Secret – Chapter 350

6 min read November 6, 2026

काजल ने साँस ली। "मैं दो दिन पहले यहाँ आ रही थी। तब यह रजिस्टर खोलकर देख रही थी। और तब मुझे यह समझ आ गया — यह मुझे भरने नहीं दे रहा।" उसने मुझे देखा। "यह नाम पूछ रहा है, मीरा। सिर्फ़ रिया को।"

"इसका मतलब?"

"इसका मतलब यह कि रजिस्टर ने रखवाला चुना है। और रखवाला मैं नहीं हूँ।" वह एक क़दम पीछे हटी। "यह रजिस्टर तुम्हारी बेटी को चुन रहा है।"

रिया ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल था, पर वह रो नहीं रही थी।

मैंने रजिस्टर बंद किया। मेरा हाथ उस समय काँप रहा था जो कम से कम दो दिन से नहीं काँपा था। मैंने उसे अपने बैग में डाला, चेन खींची।

"अब यह मेरे पास रहेगा," मैंने कहा।

काजल हँसी। वह हँसी छोटी थी, पर मीठी नहीं। "रजिस्टर किसी के पास नहीं रहता, मीरा। जिसके पास रहता है, वह उसे पाता है — वह उसे नहीं चुनता। तुम जिसे बैग में रख रही हो, वह अभी से तय कर रहा है कि कब तुम्हारे हाथ से निकलेगा और किसके हाथ में जाएगा।"

"तो मैं इसे नष्ट कर दूँ?"

"करके देख।" काजल ने अपनी उँगली की तरफ़ इशारा किया। "मैंने तीन बार जलाया। तीनों बार नया पन्ना आया। फिर मैंने फाड़ा, चार टुकड़े किए, कुएँ में डाले।" उसकी आवाज़ धीमी हुई। "अगली सुबह वह मेरे बिस्तर के सिरहाने रखा था।"

ऊपर से चिल्लाने की आवाज़ आई। रामदीन की। असली रामदीन, बिना झिझक, जैसे कभी-कभी दिखती है।

"पानी बढ़ रहा है! बाहर निकलो!"

सुमित्रा देवी तुरंत हिलीं। "सीढ़ियाँ! जल्दी!"

मैंने रिया का हाथ पकड़ा। कमरे से बाहर, सीढ़ियों के मुँह पर। वहाँ से ऊपर का रास्ता अब भी खुला था, पर तीन सीढ़ियों पर गीली चमक थी। पानी धीरे-धीरे बढ़ रहा था, गरम, और उसकी महक बदल रही थी — पहले स्याही, अब थोड़ी जली हुई लकड़ी जैसी।

"रिया, पहले तू," मैंने कहा।

"माँ—"

"बहस नहीं।"

उसने मेरी आँखों में देखा, फिर सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। मैं उसके पीछे-पीछे। पत्थर पर पैर फिसल रहे थे, काई ने जगह छोड़ दी थी। मेरी साँस भारी हो रही थी, और नीचे से पानी की आवाज़ आ रही थी — चढ़ती हुई।

ऊपर आधे रास्ते पर रामदीन ने मेरा हाथ पकड़ा और खींचा। मैं लड़खड़ाई, फिर सीधी हुई। हवेली के पीछे के दरवाज़े के बाहर तीनों खड़े थे — रामदीन, सुमित्रा देवी, और मैं। गीली ज़मीन।

रिया कुछ क़दम आगे खड़ी थी, साँस भर रही थी।

"काजल?" रामदीन ने कुछ देर बाद कहा।

मैंने पीछे देखा। दरवाज़े के अंदर अँधेरा था। सीढ़ियों से पानी की आवाज़ आ रही थी, और कुछ नहीं।

"वह अंदर ही रही," मैंने कहा।

"मरने नहीं देगी वह," सुमित्रा देवी ने कहा। "उसका दादा उसे बचाएगा। उसकी तरह के लोग अंदर से बाहर आना जानते हैं।"

"आप अंदर नहीं गईं," मैंने कहा। "आप वहाँ क्यों नहीं रहीं? चालीस साल उस कमरे में?"

सुमित्रा देवी ने मेरी तरफ़ देखा। कुछ देर चुप रहीं। "क्योंकि मैं हर रोज़ सोचती हूँ कि मैं आज बाहर रह लूँ। और कल फिर सोचती हूँ। कल से आज तक बीस साल से चल रहा है यह हिसाब।" उन्होंने कपड़ा सीधा किया। "मैं उस औरत को नहीं छोड़ सकती। वह मेरी बहन जैसी है।"

"आपकी बहन?"

"नहीं, जन्म से नहीं।" उन्होंने कपड़ा जेब में रख लिया। "हम दोनों हरनाम के लिए काम करती थीं। मैं स्याही बनाती थी, वह अंगूठा लगाती थी। फिर उसे नीचे रख दिया गया और मैं ऊपर रह गई।" उन्होंने रजिस्टर की तरफ़ देखा, जो मेरे बैग में था। "अब तुम उससे मिल चुकी हो। उसने तुम्हारा नाम सुन लिया है। अब वह हर रात तुम्हारा नाम दोहराएगी।"

"इसका मतलब?"

"इसका मतलब यह कि अब तुम भूलने के दायरे में हो।" उन्होंने एक गहरी साँस ली। "अब तुम्हें कोई नई जगह नहीं चुननी। जहाँ हो, वहीं रुको। और रोज़ अपना नाम बोलो।"

रिया ने हमारी बात सुनी। वह पास आई। "मैं भी बोलूँगी।"

सुमित्रा देवी ने उसकी तरफ़ देखा। कुछ देर। फिर उन्होंने रिया के सिर पर हाथ रखा, जो उन्होंने पहले कभी नहीं किया था। "तू बोलेगी," उन्होंने कहा। "और इसीलिए तुझे रोकना ज़रूरी है।"

"क्यों?"

"क्योंकि जो नाम बोलता है, वह लौटा सकता है। और जो लौटा सकता है, उसे रजिस्टर रहने नहीं देता।"

रामदीन ने बीच में आकर उनका हाथ रिया के सिर से हटाया। "अब आगे की बात कल। बच्ची ज़मीन पर खड़ी है, चलो।"

हम पीछे के दरवाज़े से बाहर आए। गली में रोशनी पीली थी, सोडियम की, और हवेली का पीला रंग उसमें और पीला लग रहा था। रामदीन ने एम्बुलेंस के पास पहुँचकर बोनट पर हाथ रखा।

"कल सुबह छह बजे," उसने कहा। "चाय ठेले वाले की दुकान पर। मैं कुछ लोगों को लाऊँगा।"

"कौन?"

"जो अब तक गए।" उसने अपनी जैकेट के बटन देखे। "उनके घर वाले। जो बचे हैं। मैंने चालीस साल में उनके नाम लिखे थे और किसी को नहीं बताया। अब बताऊँगा।"

"आपके पास कितने नाम हैं?"

रामदीन ने सोचा। "बारह पक्के। बारह और जिनमें यक़ीन नहीं। और चार जो मैंने कभी लिखे ही नहीं — क्योंकि जब लिखता, उस वक़्त उनका नाम बोलना पड़ता, और मुझे बोलना नहीं आता।"

"तो अब आता है?"

उसने मेरी तरफ़ देखा। कुछ देर। फिर बोला, "तेरी वजह से आता है। मैंने तेरा नाम बोला था सीढ़ियों पर। याद है? जब मैं भूल रहा था। तब मुझे याद आया कि बोलना कैसे होता है।"

रिया ने एम्बुलेंस का पिछला दरवाज़ा खोला। उसकी जेब में हाथ डाला — और उसका चेहरा बदल गया।

"माँ।"

"क्या?"

उसने अपनी जेब उलट दी। खाली। "नोटबुक। मेरी जेब से गई।"

मेरे पेट में कुछ ठंडा उतरा। "कौन सी नोटबुक?"

"माँ, वही। तेरी।" उसके हाथ काँपने लगे। "तुमने मुझे दी थी। कहा था — रख, कोई पढ़े मत। मैंने जेब में रखी। और…"

"कब तक?"

"जब हम कुएँ पर थे।" उसकी आवाज़ फँस गई। "मैंने उसे महसूस किया था। जब सीढ़ियों पर थे — बाहर निकलते वक़्त। नीचे से कोई पकड़ रहा था। मुझे लगा कुएँ का पानी है।"

मैंने अपनी जेबें टटोलीं — पीतल की कलम थी, माँ की चिट्ठी थी, रामदीन का पीला काग़ज़ था। नोटबुक नहीं। नोटबुक, जिसमें बारह पक्के नाम, बारह गलियाँ, बारह आवाज़ें हैं — सब कुछ, पेंसिल से, मेरी लिखाई में।

रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। "हवेली में रह गई।"

"हाँ।"

"तो वह अंदर है।"

"हाँ।" मैंने हवेली के उस बंद दरवाज़े की तरफ़ देखा। पानी की आवाज़ अब नहीं आ रही थी। पीला रंग, बंद दरवाज़ा, और अंदर — नोटबुक, पानी, काजल, और वह औरत जो अब मेरा नाम जानती है।

"सुबह," रामदीन ने कहा।

"नहीं।" मैंने एम्बुलेंस की तरफ़ बढ़ते हुए बैग से रजिस्टर निकाला। "मैं इसे कहीं नहीं छोड़ूँगी। और अगर वह मेरी नोटबुक ले गई है, तो…" मैंने रामदीन की तरफ़ देखा।

रामदीन ने अपनी भूरी जैकेट की जेब से पान मसाला निकाला, मुँह में रखा, और चबाया। फिर बोला, "तो तुझे उन नामों को दोबारा लिखना पड़ेगा। अपनी याद से।"

"बारह नाम? मेरी याद से?"

"तेरी याद में हैं," उसने कहा। "बारह बार बोले हैं तूने।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पर एक बात सुन — लिखने से पहले, हर नाम को उसकी गली में जाकर बोलना पड़ेगा। तीन बार। जैसे तूने रसोई में किया था। फिर लिखना।"

"इतनी रात?"

"तो सुबह होने दे।" फिर उसने काँधा उचकाया। "पर एक बात — सुबह तक रजिस्टर रिया को चुन लेगा।"

मैं रुकी। रजिस्टर मेरे हाथ में था। पतला, हल्का, बंद।

"तो रात में ही।" मैंने रिया की तरफ़ देखा। "तू घर जाएगी। दादी के पास।"

"नहीं।"

"रिया—"

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