A Dark Secret – Chapter 349
वह मेरी तरफ़ बढ़ी। मेरे सामने रुकी। उसने कलम मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"मैंने यह तुमसे ली थी," उसने कहा। "अब वापस।"
मैंने कलम ली। धातु ठंडी थी, बहुत ठंडी।
"अब अंदर आओ," उसने कहा। "तेरी माँ को तो मैं नहीं बचा सकी। पर तेरा नाम आज भी मेरे पास है।"
और वह अंदर चली गई। हम तीनों उसके पीछे-पीछे, हवेली के उस दरवाज़े की तरफ़ बढ़े जहाँ पत्थर की सीढ़ियाँ नीचे उतरती थीं — उन सीढ़ियों की तरफ़ जहाँ एक औरत चालीस साल से रह रही थी, जिसका नाम किसी ने नहीं लिखा।
॥
सीढ़ियाँ पत्थर की थीं, चौड़ी नहीं, एक आदमी के लिए भी तंग। नीचे से हवा आ रही थी जिसमें स्याही और गीली मिट्टी की महक घुली थी। सुमित्रा देवी आगे-आगे उतर रही थीं, कमर झुकी हुई, पर क़दम सीधे। नीचे अँधेरा था, पर किसी कोने से पीली रोशनी की पतली लकीर आ रही थी, जैसे दूर कोई दीया जल रहा हो।
"दीवार को हाथ लगाओ," सुमित्रा देवी ने बिना पलटे कहा। "सीढ़ियाँ गीली हैं।"
मैंने रिया का हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं पर काँप नहीं रही थीं। पीछे रामदीन की साँस सुनाई दे रही थी, भारी और रुक-रुक कर।
नीचे उतरते हुए सीढ़ियाँ मुड़ीं। दीवार पर एक तरफ़ पत्थर के खांचे थे जिनमें काई भरी थी। तीसरी मोड़ पर सुमित्रा देवी रुकीं।
"यहीं से आगे सीधा रास्ता है," उन्होंने कहा। "और अब सुन लो — जो अंदर है, उससे सवाल मत पूछना। वह जवाब नहीं देती। वह सिर्फ़ नाम पहचानती है।"
"नाम?" रिया ने पूछा।
"हाँ। जो नाम उसने सुना है, वह याद रखती है। जो नाम उसे नहीं सुनाया गया, वह उसके लिए हवा जैसा है।"
हम नीचे पहुँचे। एक छोटा कमरा था, पत्थर का, छत कम, और बीच में एक चौकी पर वह औरत बैठी थी।
उम्र का अंदाज़ा नहीं लग रहा था। सफ़ेद बाल कंधों तक, चेहरा पतला, आँखें खुली, पर कहीं देख नहीं रही थी। उसके हाथ में कुछ नहीं था, गोद में एक पुराना कपड़ा पड़ा था जिस पर स्याही के धब्बे सूखे पड़े थे। कमरे की दीवार पर एक ट्यूबलाइट थी, वही पीली रोशनी, जो यहाँ रास्ता दिखा रही थी।
सुमित्रा देवी ने मेरी तरफ़ देखा। "नाम लो।"
"किसका?"
"अपना। ज़ोर से।"
मैंने साँस ली। "मीरा जोशी।"
औरत का सिर हिला। उसने धीरे से अपनी तरफ़ देखा। आँखें वही थीं — खाली नहीं, पर जैसे किसी ने उनके पीछे की यादें हटा दी हों।
"मीरा," उसने कहा। आवाज़ सूखी लकड़ी जैसी, फिर भी साफ़। "मीरा जोशी।"
मेरे पीछे रामदीन की साँस अचानक बंद हुई।
"इसे कैसे पता?" वह फुसफुसाया।
सुमित्रा देवी ने कपड़ा उठाया, गोद से। "क्योंकि मैंने उसे सुनाया है। चालीस साल में जो भी नाम मैंने उसके पास बोले, वह याद हैं उसे। और तेरा नाम मैंने बोला था — तेरी माँ के कहने पर।"
मेरे पैर के नीचे का पत्थर ठंडा था। "आपने मेरा नाम बोला था?"
"हर महीने।" सुमित्रा देवी ने कपड़ा सीधा किया। "तेरी माँ हर महीने आती थी, यहाँ तक। सीढ़ियाँ उतरती थी, इस कमरे में खड़ी होती थी, और यह बूढ़ी औरत का हाथ पकड़कर कहती थी — मीरा जोशी। मेरी बेटी। फिर एक दिन वह आनी बंद हो गई।"
"क्यों?"
"क्योंकि वह बीमार पड़ी। और फिर गई।" सुमित्रा देवी ने मेरी तरफ़ देखा। "तू तब छोटी थी।"
रिया ने मेरा हाथ दबाया। उसका सवाल मुँह तक आया पर वह रुक गई — शायद पहली बार सोच-समझकर रुकी।
"यह औरत कौन है?" मैंने पूछा।
"यह वह है जिसका नाम कभी नहीं लिखा गया।" सुमित्रा देवी ने कपड़े पर रखा हाथ आगे किया। "बाबू हरनाम ने इसे काम पर रखा था, जब वह अठारह की थी। स्याही बनाने का काम। पर जब सबके नाम लिखे जाते, तब इसे एक तरफ़ रख दिया — यह वह थी जो अंगूठा लगाती थी, तो इसका नाम काग़ज़ पर लिखा नहीं गया। और इसीलिए यह अब भी यहाँ है। जो लिखा जाता है, वह जाता है। जो नहीं लिखा जाता, वह रह जाता है।"
मैंने देखा। औरत ने अपना हाथ कपड़े से निकाला। उँगलियाँ पतली थीं, और तर्जनी पर काला निशान था — वैसा ही निशान जो मेरी उँगली पर आता था, वैसा ही जो रिया के हाथ से अभी फीका पड़ा था।
"यह चालीस साल यहाँ अकेली रही?" रिया ने पूछा। उसकी आवाज़ धीमी थी।
"अकेली नहीं," सुमित्रा देवी ने कहा। "यह हवेली को सुनती है। हर नाम जो रजिस्टर से उतरता है, यहाँ से गुज़रता है। जब रजिस्टर का पन्ना खाली होता है, यह उस नाम को अपने पास रख लेती है। इसलिए रजिस्टर कभी पूरा खाली नहीं होता। पर तेरे और रिया के नाम के साथ कुछ अलग हुआ।"
"क्या?"
"रजिस्टर ने रिया का नाम उभारकर रखा, और तेरा फीका कर दिया।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "यह पहले कभी नहीं हुआ।"
रजिस्टर मेरे हाथ में था। मैंने उसे चौकी पर रखा — बूढ़ी औरत उसे देख रही थी, बिना छुए। मैंने पन्ने पलटे। पहला पन्ना — खाली। दूसरा — खाली। तीसरा — खाली। चौथे पर धुँधले से कुछ अक्षर थे, जैसे धुएँ से लिखे गए हों और एक आधा नाम बचा रह गया। पाँचवें पर एक तारीख़ थी, चौदह साल पहले की, और स्याही फटी हुई थी।
"यह तो खाली है," मैंने कहा। "काजल ने कहा था चालीस साल की तारीख़ें हैं।"
"काजल ने बहुत कुछ कहा है," सुमित्रा देवी ने कहा। "कुछ सच, कुछ आधा।"
पीछे से पैरों की आहट आई। मैं पलटी। काजल सीढ़ियों पर खड़ी थी। उसकी साड़ी का पल्लू कंधे से खिसक आया था, जो कभी उसकी आदत नहीं थी। उसने बाल नहीं सँवारे।
"यह रजिस्टर मेरा नहीं है," उसने कहा। "मैंने तुमसे झूठ बोला था।"
"कौन सा झूठ?" मैंने पूछा।
"यह वाला।" उसने रजिस्टर की तरफ़ इशारा किया। "यह मेरे दादा के पास था। मैंने इसे तिजोरी में रखा था और सोचा था यह वही है जो मैं चालीस साल से देख रही हूँ। पर तब से मैंने आख़िरी पन्ना नहीं पलटा था।" उसकी आवाज़ में चीनी नहीं थी, अब. "तीस साल पहले, जब मैं आठ साल की थी, यह रजिस्टर मोटा था। इतना मोटा कि बंद होता तो पन्ने बाहर झाँकते। हर पन्ने पर दस-दस नाम। मैं गिनती करती थी, मुझे अच्छा लगता था। फिर दादाजी मरे — और मुझे पता नहीं लगा कि कब, यह रजिस्टर पतला होने लगा। जैसे कोई रातों में इसे खाली कर रहा हो।"
"आपने किसी से कहा?"
"किससे कहती?" उसने रजिस्टर को देखा, फिर मुझे। "मैं खुद इसे भरती थी, तो खाली होने पर डर लगता था। मुझे लगा मैं ही पागल हो रही हूँ।" उसने अपनी उँगलियाँ जोड़ीं। "पर अब देखो — मैंने दो दिन पहले यहाँ कुछ नहीं लिखा। बीस नाम; जो काग़ज़ पर थे; वे रजिस्टर में चले गए। अपने आप।"
मैंने आख़िरी पन्ना उठाया। मोहर थी, काली, बाबू हरनाम की। उसके नीचे मेरा नाम था — मीरा जोशी — पर फीका, जैसे धूल में लिखा हो। और उसके बगल में, नीचे की तरफ़ रिया जोशी — उभरा हुआ, मोटा, गीला।
रिया ने झाँका। उसका चेहरा एक लम्हे में ही बदल गया।
"यह क्या है, माँ?"
"मत छू," मैंने कहा। पर उसकी उँगली पहले ही पन्ने तक पहुँच चुकी थी।
छूते ही उसका हाथ का निशान चमका। पीला-सफ़ेद, तेज़ रोशनी जैसी चीज़, जो पल भर में गई। रिया ने हाथ झटका और पीछे हटी। उसकी उँगली पर स्याही अब और गहरी हो गई थी; कल जहाँ फीकी थी, वह अब साफ़ उभर आई थी।
"देखा?" सुमित्रा देवी ने कहा। "तीस साल पहले मैंने कहा था।"
"क्या कहा था?" मैंने पूछा।
वह काजल की तरफ़ मुड़ीं। "बता।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno