A Dark Secret – Chapter 348
जैसे ही मैंने रजिस्टर पर नज़र डाली, वह खुद खुल गया। पन्ने हवा में पलटने लगे — फड़-फड़-फड़ — और फिर रुक गए। स्याही की महक उठी, इतनी तेज़ कि मेरी आँखें भर आईं। फँसी हुई, मीठी, पुरानी गोंद जैसी।
रिया ने अपनी नाक कपड़े से ढक ली। "माँ, यह… यह तो हमारे घर की दीवार जैसी महक है।"
वह सही थी। यही महक मेरे आँगन की दीवार से आई थी जिस पर मेरा नाम लिखा था। यही महक उस पन्ने से आई थी जो मनोहर ने दिया था।
मैं रजिस्टर के पास गई। पन्ना खुला था और उस पर चालीस साल पुरानी तारीख़ें थीं — साल, महीना, दिन, और हर तारीख़ के सामने एक नाम। कुछ नाम पूरे थे, कुछ आधे, कुछ पर काली स्याही की मोटी लकीर। मैंने पन्ना पलटा। दूसरा पन्ना, तीसरा। हर पन्ने पर तारीख़ें, नाम, गलियाँ।
"तारीख़ें मिटानी हैं," मैंने कहा। "हर तारीख़।"
रिया ने रजिस्टर की तरफ़ देखा। "कैसे?"
मेरी जेब में पीतल की कलम नहीं थी — वह मोड़ पर खड़ी औरत ने ले ली थी। पर मेरी जेब में एक और चीज़ थी। रामदीन का पीला काग़ज़। जिस पर "सुशीला" लिखा था।
मैंने काग़ज़ निकाला और उसे पलटा। पीछे की तरफ़ कुछ नहीं था — सिर्फ़ पीला, खुरदुरा काग़ज़। फिर मैंने रामदीन की पीली पुड़िया याद की — वह खाली थी।
"माँ, कुछ आ रहा है।"
मैंने रिया की तरफ़ देखा। वह कमरे के कोने की तरफ़ देख रही थी। वहाँ ज़मीन पर, तिजोरी के पास, एक सफ़ेद चादर पड़ी थी। मैंने पहले उसे देखा ही नहीं।
"यह पहले नहीं थी," रिया ने कहा।
"तुम्हें कैसे पता?"
"क्योंकि मैंने कमरे में आते ही चारों तरफ़ देखा था। कोना खाली था।"
मैं उस चादर तक गई और उसे उठाया। उसके नीचे एक लोहे का डिब्बा था, छोटा, वही जैसा रामदीन के पास था — जिसमें चार औरतों की तस्वीर थी। मैंने डिब्बा खोला।
अंदर काग़ज़ों का बंडल था। सबसे ऊपर एक चिट्ठी थी, मोड़ी हुई, और उस पर मेरी माँ की लिखाई।
"रिया," मैंने कहा। "दरवाज़े के पास जाओ। अगर मैं कहूँ, तो सीढ़ी की तरफ़ भागो।"
"माँ—"
"अभी।"
वह गई। मैंने चिट्ठी खोली।
"अगर यह चिट्ठी किसी और के हाथ लगी है, तो उसका मतलब है कि मैं नहीं रही, और मेरी बेटी ने वह रास्ता चुन लिया है जिससे मैं उसे बचाना चाहती थी। सुशीला।"
नीचे तारीख़ थी। बीस साल पुरानी।
मैंने अगला काग़ज़ निकाला। मकान की खरीद का काग़ज़ था — वही दो पन्नों का बनियान जो माँ की संदूक में था। पर इस पर कुछ और लिखा था। असली में आख़िरी लाइन थी — "होने वाली बच्ची का नाम…" और उसके नीचे माँ की लिखाई में — "रिया।"
मैं रुक गई।
"रिया," मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी।
"हाँ?"
"तुम्हारा नाम… माँ ने तुम्हारे पैदा होने से पहले ही लिखवा दिया था। बच्ची का नाम पता था उन्हें? रिया?"
"नहीं।" रिया दरवाज़े से मेरी तरफ़ आई। "मतलब?"
"मतलब यह कि तुम्हारा नाम तुमसे पहले दर्ज हो गया था। तुम्हारी माँ ने लिखवाया था — मेरी माँ ने।" मैंने चिट्ठी उठाई। "और उन्हें पता था कि मैं यहाँ आऊँगी।"
नीचे से पानी की आवाज़ तेज़ हो गई। रामदीन की आवाज़ आई, "मीरा! सीढ़ी का पहला मोड़ डूब गया!"
मैंने काग़ज़ों का बंडल उठाया और उसे अपनी जैकेट में ठूँसा। फिर रजिस्टर उठाया। उसका वज़न अजीब था — हल्का, बहुत हल्का, जैसे पन्ने हवा से भरे हों।
"रजिस्टर ले चलो," मैंने कहा।
"माँ, रजिस्टर भारी नहीं है?"
"नहीं।"
"पर यह बड़ा तो है—"
"रिया।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "यह रजिस्टर असली नहीं है। यह नक़ल है। और नक़ल असली से ज़्यादा डरावनी है — क्योंकि नक़ल में सब कुछ लिखा है जो असली में नहीं।"
हम भागे। दरवाज़े से बाहर, पहले कमरे से पार, कुएँ के दरवाज़े की तरफ़। मैंने रजिस्टर अपनी छाती से लगाया हुआ था। उसकी महक मेरे कपड़ों पर लग रही थी।
कुएँ के दरवाज़े तक पहुँची तो सीढ़ियों में पानी चढ़ रहा था। पहले मोड़ तक डूबा हुआ था।
"रामदीन!" मैं चिल्लाई।
"मीरा!" उसकी आवाज़ ऊपर से आई। "दीवार के साथ! दीवार के साथ चढ़ो!"
मैंने रिया को आगे किया और दीवार का सहारा लेकर चढ़ने लगी। पानी ठंडा नहीं था। गरम था। गरम और चिपचिपा, जैसे स्याही में घुला हुआ।
चार कदम चढ़ी, फिर पाँच। पानी घुटनों तक था। रिया मेरे आगे बढ़ रही थी, हाथ दीवार पर, धीरे-धीरे।
"माँ, दीवार पर कुछ लिखा है।"
"मत पढ़ो।"
"पर यह—"
"रिया, मत पढ़ो।"
वह रुकी नहीं। चढ़ती रही।
मैंने भी दीवार पर नज़र डाली। सीलन के निशानों के बीच, गीली स्याही से, एक नाम लिखा था। बड़े अक्षरों में।
सुशीला जोशी।
मेरी माँ का नाम। मेरे हाथ से रजिस्टर फिसलने लगा। मैंने उसे कसकर पकड़ा।
"माँ, यह किसका नाम है?"
"तेरी नानी का।"
"वह कहाँ हैं?"
"यहाँ।" मैंने साँस रोकी। "कहीं यहाँ। इस हवेली में। इस दीवार में। इस पानी में। मुझे नहीं पता।"
हम ऊपर पहुँचे। रामदीन ने हमें खींचकर बाहर निकाला। हम तीनों ज़मीन पर गिरे रहे। पानी कुएँ के मुँह तक आया और रुक गया।
रामदीन ने रजिस्टर देखा, जो मेरी बाँहों में दबा था। उसने कुछ नहीं कहा। फिर उसने मेरी जैकेट से झाँका जहाँ काग़ज़ों का बंडल था।
"वह क्या है?"
"माँ की चिट्ठी है," मैंने कहा। "और मकान का काग़ज़। और…" मैंने रुककर उसकी तरफ़ देखा। "रामदीन चाचा, रिया का नाम मेरी माँ ने लिखवाया था। मेरी बेटी का नाम मेरी माँ ने रजिस्टर में डलवा दिया था, मेरे पूछे बिना।"
रामदीन ने रिया की तरफ़ देखा। रिया बैठी थी, घुटने सीने से लगाए।
"मैं जानता हूँ," रामदीन ने कहा।
"क्या?"
"मैं जानता हूँ। बीस साल पहले तेरी माँ आई थी मेरे पास। वह रो रही थी। उसने कहा था — मेरी बेटी को शहर में जगह चाहिए, और मैं उसे रजिस्टर में लिखवा दूँगी। मैंने उसे मना किया। बहुत मना किया।" उसने अपना सिर नीचे किया। "पर वह नहीं मानी।"
"आपने मुझे बताया क्यों नहीं?"
"क्योंकि बताता तो तू पूछती कि मेरी बेटी का नाम कहाँ है। और मैं झूठ बोलना नहीं चाहता था।" उसने अपनी भूरी जैकेट के बटन की तरफ़ देखा। "अब तू खुद जान गई।"
मैं उठी। रजिस्टर मेरे हाथ में था। चालीस साल की तारीख़ें उसके पन्नों में सोई थीं।
"यह मैं जलाऊँगी," मैंने कहा।
"नहीं।" रामदीन ने हाथ उठाया। "तूने खुद कहा — नक़ल है। नक़ल जलती है, पर तारीख़ें नहीं जलतीं। तारीख़ें पन्ना बदलकर बच जाती हैं। तुझे कुछ और करना पड़ेगा।"
"क्या?"
वह कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "असली रजिस्टर वापस लेना पड़ेगा।"
"वह किसके पास है?"
रामदीन ने कुएँ की तरफ़ देखा, फिर हवेली के पीछे के दरवाज़े की तरफ़। "उसके पास जिसका नाम कभी बोला नहीं गया।"
मैंने काग़ज़ों का बंडल निकाला और चिट्ठी फिर पढ़ी। नीचे एक और लाइन थी जो मैंने पहले नहीं पढ़ी थी।
"और हाँ, अगर तू यह पढ़ रही है, तो उस औरत से मिलना जो पीतल गली में स्याही बनाती है। वह तेरी नानी की सहेली थी। — सुशीला।"
मैंने चिट्ठी रामदीन को दी। उसने पढ़ी और उसका चेहरा बदल गया।
"सुमित्रा," उसने कहा। "तुम्हारी नानी की सहेली सुमित्रा है। वही जो पीतल गली में रहती है। वही जो कभी रजिस्टर में नहीं लिखी।"
पीछे से एक आवाज़ आई। पतली, ठंडी, धीमी।
"बहुत देर कर दी।"
हम पलटे। हवेली के पीछे के दरवाज़े पर वह औरत खड़ी थी — सफ़ेद साड़ी, छोटे सफ़ेद बाल, हाथ में कपड़े में लिपटी पीतल की कलम।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno