A Dark Secret347 / 536

A Dark Secret – Chapter 347

6 min read November 6, 2026

रिया का हाथ मेरी मुट्ठी में था और उसकी उँगली काँप रही थी। मैंने काजल की तरफ़ देखा। वह कुर्सी पर बैठी थी, एक टाँग दूसरी पर चढ़ी, और उसके सामने चाय का प्याला रखा था। प्याला अब भी भाप छोड़ रहा था।

"तुमने चाय अपने लिए बनाई है," मैंने कहा, "या हमारे लिए भी?"

काजल ने प्याला उठाया। "तीन प्याले बनाए थे। दो ठंडे हो गए, तुम आती नहीं थी।" उसने घूँट भरा। "फिर नए बनाए।"

"कैसे पता था कि हम कुएँ से आएँगे?"

"पता नहीं था। अंदाज़ा था। हवेली का मुख्य दरवाज़ा मैंने आज बंद कर दिया था — दो लोगों से बंद करवाया। तुम अगर सामने से आती, तो खटखटाती और कोई न खोलता। तब तुम पीछे आती। पीछे दरवाज़ा है, सीढ़ी है, कुआँ है।" उसने प्याला रखा। "बस इतना हिसाब था।"

रिया ने मेरा हाथ छोड़ा और दीवार के बीच टँगी तस्वीर के पास गई। बाबू हरनाम सिंह। सफ़ेद कुर्ता, हाथ में छड़ी, आँखें सीधी कैमरे में। रिया उसके सामने खड़ी हो गई और ऊपर देखने लगी।

"इन आँखों वाले आदमी को मैंने देखा है," रिया ने कहा।

काजल का हाथ हवा में रुक गया। प्याला उसके होंठों से दूर था।

"क्या बोली?"

"सपने में।" रिया पलटी। "दो बार। पहली बार वह मुझे कुछ बता रहे थे पर मुझे सुनाई नहीं दे रहा था। दूसरी बार वह सिर्फ़ खड़े थे और मेरी तरफ़ देख रहे थे। मैंने पूछा कि आप कौन हैं, तो उन्होंने अपनी छड़ी से दीवार पर कुछ लिखा।"

काजल ने प्याला मेज़ पर रखा। उसकी उँगलियाँ प्याले से चिपक गई थीं, छोड़ने में ज़ोर लगा। "क्या लिखा?"

"पढ़ नहीं पाई। सुबह उठी तो याद नहीं रहा।" रिया ने कंधे उचकाए। "मैं बारह साल की हूँ, दीदी। हर सपना याद नहीं रहता।"

काजल ने कुर्सी की बाहें पकड़ लीं। पहली बार उसके चेहरे पर पाउडर के नीचे कुछ और दिखा — जल्दी, बेचैनी।

"तुम्हारे दादा जी," मैंने कहा, "तुम्हारे दादा जी को कुछ पता था रिया के बारे में?"

काजल ने मेरी तरफ़ देखा। "मेरे दादा जी को सब पता था। वह मरे नहीं हैं, मीरा। वह इस हवेली में हर दीवार में बैठे हैं।" उसने हाथ उठाया और कमरे की तरफ़ इशारा किया। "तुम्हें लगता है यह कमरा खाली है? यहाँ तीन पीढ़ियों की तस्वीरें टँगी थीं। आज सिर्फ़ उनकी है। बाकी कहाँ गईं? मैंने उतार दीं। क्योंकि जब मैं उनके सामने से गुज़रती थी, मुझे लगता था कोई मेरी गर्दन पकड़ रहा है।"

रिया ने कहा, "तो आपको भी डर लगता है।"

काजल मुस्कुराई। वह मुस्कान पहले जैसी नहीं थी — कुछ ज़्यादा चौड़ी, कुछ ज़्यादा जल्दी। "डर किसे नहीं लगता, बेटा। डर के बिना आदमी काम क्यों करेगा?"

"तो आप अपना नाम वापस क्यों नहीं लेना चाहतीं?" मैंने पूछा।

काजल ने मेरी तरफ़ देखा, फिर चाय की तरफ़, फिर खिड़की की तरफ़ जो बंद थी, फिर वापस मेरी तरफ़।

"क्योंकि मैं अपना नाम लेने के लिए जो करना पड़ेगा, वह नहीं कर सकती," उसने कहा। "और तुम कर सकती हो, इसीलिए तुम यहाँ हो।"

मैंने कुर्सी खींची और उसके सामने बैठ गई। रिया मेरे पीछे खड़ी रही, दीवार से सटकर।

"मुझे असली रजिस्टर चाहिए," मैंने कहा। "कहाँ है?"

"मेरे पास नहीं।"

"पता है। कहाँ है?"

काजल ने हाथ जोड़े, कोहनियाँ घुटनों पर। "वह औरत जिसके पास है, वह खुद को रजिस्टर की मालिक समझती है। लेकिन वह भी सिर्फ़ मोहरा है, मीरा। मेरे दादा जी ने चालीस साल पहले जो जाल बुना, उसमें हर कोई फँसा है — मैं, वह औरत, तुम्हारी माँ, मेरा मुंशी, भैरों, तुम, और…" उसने रिया की तरफ़ देखा। "…और अब यह बच्ची।"

"मेरी बेटी पर हाथ मत डालो," मैंने कहा। मेरी आवाज़ तेज़ हो गई थी, मुझे पता था। "तुमने अपने मुँह से कहा था कि उसका नाम आधा लिखा है। उसे पूरा मैं करूँगी।"

"कैसे?"

"पता नहीं। पर करूँगी।"

काजल ने सिर हिलाया। "आधा नाम कभी पूरा नहीं होता, मीरा। यह मेरे दादा जी का नियम है, मैंने नहीं बनाया। जिसका नाम आधा लिखा जाए, वह सिर्फ़ एक तरीक़े से पूरा होता है — रखवाला बनकर। रखवाले का नाम पूरा लिखा जाता है क्योंकि रखवाला रजिस्टर का हिस्सा बन जाता है।"

"तो रिया को तुम्हारी जगह रखवाला बनाना है।"

"रिया नहीं। कोई भी।" काजल ने कंधे उचकाए। "मैं खुद चाहती हूँ कि यह खेल ख़त्म हो। पर मैं नहीं कर सकती, क्योंकि मेरा नाम तो आख़िरी पन्ने पर है। जो आख़िरी पन्ने पर हो, वह रजिस्टर को तोड़ नहीं सकता, सिर्फ़ निभा सकता है। तुम बाहर से आई हो। तुम तोड़ सकती हो।" उसने रुककर रिया की तरफ़ देखा। "पर तोड़ने के लिए भी दाम चुकाना पड़ता है। और वह दाम तुम्हारी बेटी है।"

कमरे में सन्नाटा नहीं था। नीचे से आवाज़ें आ रही थीं। पानी की। कुआँ।

और फिर ऊपर से रामदीन की आवाज़ गूँजी, दबी हुई पर साफ़, "मीरा! पानी चढ़ रहा है! दस मिनट में सीढ़ी डूब जाएगी!"

मैंने काजल की तरफ़ देखा। "তুম চলে যাও।"

"क्यों?"

"क्योंकि अब भी तुम्हारे पास मौक़ा है।" उसने जेब से कुछ निकाला — एक छोटी चाबी, पीतल की, जंग लगी। उसे मेज़ पर सरका दिया। "दूसरे कमरे में तिजोरी है। उसमें जो रजिस्टर रखा है, वह नक़ल है। असली नहीं। जिसके पास असली है, वह इसे जलाकर भी नहीं मिटा सकती, क्योंकि नक़ल खुद को असली समझती है।"

"फिर चाबी क्यों दे रही हो?"

"क्योंकि नक़ल में एक चीज़ है जो असली में नहीं।" काजल उठी। उसने अपनी साड़ी ठीक की। "असली में तुम्हारा नाम है, रिया का नाम है, मेरा नाम है। नक़ल में सिर्फ़ तारीख़ें हैं। चालीस साल की हर तारीख़, हर नाम, हर गली। अगर तुम उन तारीख़ों को मिटा दो, तो सौदा अपने आप टूट जाएगा — क्योंकि सौदा तारीख़ों पर टिका है, नाम पर नहीं।"

मैंने चाबी उठाई। ठंडी थी, बहुत ठंडी।

"तुम मेरी मदद क्यों कर रही हो?"

"मैं मदद नहीं कर रही।" काजल दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी, फिर रुकी। "मैं सिर्फ़ अपने हिसाब लगा रही हूँ। अगर तुम हार गई, तो रिया रखवाला बनेगी और मेरा काम आसान हो जाएगा। अगर तुम जीत गई, तो मेरा नाम शायद वापस आ जाए। दोनों में मेरा फ़ायदा है।"

वह दरवाज़े तक गई। रिया ने रास्ता दिया, पर जब काजल उसके पास से गुज़री, रिया ने कहा, "दीदी।"

काजल रुकी।

"उनकी आँखें," रिया ने तस्वीर की तरफ़ देखा। "सपने में वह मुझे देखकर हँस रहे थे। आपके दादा जी हँसते थे?"

काजल कुछ देर खड़ी रही। उसकी पीठ सीधी थी पर साँस तेज़ थी।

"मेरे दादा जी हँसते नहीं थे," उसने कहा। "कभी नहीं।"

और वह चली गई। दरवाज़ा बंद हुआ। कुंडी की आवाज़ आई।

मैंने रिया का हाथ पकड़ा और दूसरे दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। लकड़ी का दरवाज़ा, बंद, पर चाबी के लिए छेद नहीं था। मैंने चाबी देखी। पीतल की, छोटी, जंग लगी। फिर मैंने दरवाज़े पर हाथ फेरा। दरवाज़े के बीच में, ऊपर से नीचे तक, एक पतली लकड़ी की पट्टी थी जिसमें छेद था। मैंने चाबी उसमें डाली।

नहीं घूमी।

"माँ।"

"रुक।"

मैंने चाबी निकाली, पलटकर डाली। फिर पलटकर। तीसरी बार डालते ही चाबी घूमी और अंदर कुछ गिरा — छोटी सी आवाज़, धातु की।

दरवाज़ा खुला।

दूसरा कमरा पहले से बड़ा था, पर कुछ अजीब तरीक़े से छोटा भी। दीवारों पर यहाँ तस्वीरें थीं — तीन पीढ़ियों की, जैसा काजल ने कहा। बाबू हरनाम, उनके बेटे, उनके पोते। सब सफ़ेद कुर्ते में, सब हाथ में छड़ी, सब सीधे देखते हुए। तीनों की आँखें एक जैसी।

कमरे के आख़िर में लोहे की तिजोरी थी, बड़ी, काली, ज़मीन से लगी। और उसके ऊपर… एक रजिस्टर।

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