A Dark Secret346 / 536

A Dark Secret – Chapter 346

6 min read November 6, 2026

रामदीन ने कहा, "मीरा, गाड़ी आगे बढ़ा। रुकना मत। जो देख लेता है, वह गिना जाता है।"

मैंने गाड़ी आगे बढ़ाई। वह औरत मेरी खिड़की के बगल से गुज़री, धीरे-धीरे, ऐसे जैसे कोई सड़क पर चलती हो। मैंने उसकी तरफ़ नहीं देखा। रिया ने भी नहीं।

पीछे से रामदीन की आवाज़ आई, "मीरा। मेरा नाम। मेरा नाम अभी भी याद है मुझे। पर मुझे डर लग रहा है कि अब ज़्यादा देर नहीं।"

"अभी बोलो।"

"रामदीन प्रसाद। चालीस साल पहले पीतल गली में रहता था। बस स्टैंड के पास एम्बुलेंस चलाता था।"

"और?"

"और मैंने एक बार किसी का नाम मिटाया था। वह औरत मुझे हर रात दिखती थी। अब नहीं दिखती। फिर भी डरता हूँ।"

मैंने उसकी तरफ़ आइने से देखा। "कौन थी वह?"

वह चुप रहा। फिर बोला, "वह नहीं जिसका नाम तेरे काग़ज़ पर है। दूसरी। चौथी। जिसकी तस्वीर में चेहरा गीली स्याही से मिटा हुआ है।"

"नाम?"

"नाम मेरी ज़ुबान पर है।" उसकी आवाज़ धीमी थी। "पर ज़ुबान मान नहीं रही। जैसे किसी ने उसे होंठों पर ही बंद कर दिया हो।"

मैंने रिया की तरफ़ देखा। वह सीधी सड़क देख रही थी, कॉपी गोद में, हाथ का निशान फीका। उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा, पर बोली, "माँ, वह औरत जो मोड़ पर थी, वह हमें रोक नहीं रही थी। वह हमें देख रही थी।"

"क्या फ़र्क़ है?"

"बहुत बड़ा फ़र्क़ है। रोकने वाला रास्ता बंद करता है। देखने वाला रास्ता खोलता है, ताकि जान सके कि हम कहाँ जा रहे हैं।"

मैंने गाड़ी की रफ़्तार बढ़ाई। हवेली के पीछे का रास्ता पुराने बाज़ार से होकर जाता था। मैंने गलियों से गाड़ी निकाली। तुलसी चौक के पास से गुज़रे। चाय का ठेला बंद था, पीपल का पेड़ खाली खड़ा था। गली में एक कुत्ता भी नहीं।

"यहाँ से बाएँ," रामदीन ने कहा।

मैंने गाड़ी मोड़ी। संकरी गली। गाड़ी की लाइट दीवारों पर पड़ रही थी। कुछ दूर चलकर वह बोला, "रुक जाओ।"

मैंने गाड़ी रोकी। सामने एक पुराना कुआँ था, चारों तरफ़ पत्थर की जाली, जंग लगी। उसके पास ही हवेली की पीली दीवार शुरू होती थी।

"यही है?"

"यही।" रामदीन नीचे उतरा। उसने कुएँ की जाली का एक हिस्सा खींचा, वह पूरी नहीं, बस एक तरफ़ से खुली। "अंदर सीढ़ियाँ हैं। और मीरा—" वह मेरी तरफ़ मुड़ा, "—सीढ़ियों के आख़िर में एक दरवाज़ा है, लकड़ी का नहीं, लोहे का। वह खुला मिलेगा। पर उसके अंदर जाते ही तुम्हें काजल की हवेली दिखेगी, जो असली हवेली नहीं है।"

"क्या मतलब?"

"असली हवेली में जो कमरा है न, जिसकी दीवारों पर तीन पीढ़ियों की तस्वीरें हैं, उसके बाद दूसरा कमरा है, जिसमें तिजोरी है। तुम जब लोहे का दरवाज़ा खोलोगी, तो पहले कमरे में ही दोबारा पहुँचोगी। पर वह पहला कमरा नहीं होगा। वह उसका ही रूप होगा, बदला हुआ।"

"कैसे पहचानूँ?"

"तस्वीरें नहीं होंगी।"

"बस?"

"बस।" उसने जाली उठाई। "अब चलो। दिन निकलने वाला है। सूरज निकला तो रजिस्टर और मज़बूत हो जाएगा।"

मैंने रिया का हाथ पकड़ा। "तू मेरे पीछे।"

"बराबर।"

"रिया—"

"माँ, मैं तेरे पीछे नहीं रहूँगी। तेरे बगल में रहूँगी। और अगर तू गिरे, तो मैं तुझे उठाऊँगी।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें साफ़ थीं। डर नहीं था। या था, पर उसने उसे छिपा लिया था। मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सिर्फ़ उसका हाथ कसकर पकड़ा।

हम कुएँ में उतरे। सीढ़ियाँ पत्थर की थीं, घिसी हुई, बीच में गड्ढे। मेरी एम्बुलेंस की टॉर्च रोशनी दे रही थी। रामदीन आगे था, मैं बीच में, रिया पीछे। दीवारों पर काई जमी थी, सीलन थी। दस कदम बाद रामदीन अचानक रुका।

"चाचा?"

वह हिला नहीं। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।

"चाचा?"

उसने पीछे मुड़कर देखा। मुझे देखा, फिर रिया को देखा। फिर उसने अपने हाथ की तरफ़ देखा, जैसे वह उसे पहचान न रहा हो।

"मैं…" उसकी आवाज़ खाली थी। "मैं कहाँ हूँ?"

"चाचा।"

"तुम कौन हो?"

मेरा दिल धक् से रह गया। मैंने तुरंत कहा, धीरे नहीं, ज़ोर से, जैसे वह कह चुका था — "रामदीन। रामदीन प्रसाद। पीतल गली। तीस साल पहले तुम वहाँ रहते थे। तुम एम्बुलेंस चलाते थे। तुम बस स्टैंड के पास रहते थे। तुम्हारी आवाज़ यही है।"

वह कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसकी आँखों में कुछ लौटा। बहुत धीरे। फिर वह बोला, "मीरा।"

"हाँ।"

"मैंने अपना नाम भूल दिया था।"

"अभी नहीं भूला। मैंने बोल दिया।"

वह दीवार के सहारे बैठ गया। "चालीस साल में पहली बार। चालीस साल में पहली बार मैंने अपना नाम भुलाया।" उसने अपनी जैकेट की जेब में हाथ डाला, फिर उसे खाली बाहर निकाला। "मीरा, यह सीढ़ी मुझे जाती नहीं। अंदर जाते ही मैं भूल जाऊँगा। और शायद बाहर आने के बाद भी।"

"तो अंदर मत आओ।"

"कैसे?"

"आप यहीं रुकिए। कुएँ के ऊपर। हम दो अंदर जाएँगे।"

"अकेले?"

"अकेले नहीं। मेरे पास रिया है।"

रामदीन ने रिया की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। "वह बच्ची है।"

"वह मेरी बेटी है।"

"मीरा।"

"चाचा, आज के दिन जो रोका जा सकता है, वह सिर्फ़ वही रोका जाएगा जो अंदर जाने से फ़ायदा होगा। आप अंदर आए, तो भूल जाएँगे, और मुझे रास्ता बताने वाला नहीं मिलेगा। इसलिए आप ऊपर रहिएगा। हम निकलेंगे, तब आपको हम याद दिलाएँगे।"

वह कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "ऊपर कुएँ के पास, दस मिनट में पानी आ जाता है। अंदर से तीन बजे निकलना, वरना सीढ़ी बह जाएगी।"

"दस मिनट?"

"दस मिनट।" उसने फिर दीवार के सहारे खुद को उठाया। "और मीरा, अंदर जो औरत मिलेगी — वह अपना नाम नहीं पूछेगी। वह तेरा पूछेगी। और अगर तू अपना पूरा नाम बोल दी, तो फिर लौटने में देर हो जाएगी। अगर वह पूछे, तो सिर्फ़ इतना कहना — 'नाम दीवार पर है, वहीं से पढ़ लेना।'"

मैंने सिर हिलाया। फिर रिया का हाथ पकड़ा और सीढ़ियाँ उतरने लगी।

पीछे से रामदीन की आवाज़ आई, "मीरा।"

"हाँ?"

"अगर मैं भूलने लगूँ, तो बस एक बात याद दिलाना — मैंने कभी किसी का नाम मिटाया था।"

"यह तो बुरी बात है।"

"हाँ।" उसकी आवाज़ पत्थरों से टकराकर आई। "पर इसीलिए याद रखने लायक है।"

हम सीढ़ियाँ उतरते गए। पाँच कदम बाद एक मोड़ आया, फिर दूसरा। सीलन बढ़ती गई। मेरी एम्बुलेंस की टॉर्च अब काँप रही थी। रिया चुप थी। मैंने उसके हाथ को कसकर पकड़ा।

फिर सीढ़ी ख़त्म हुई। सामने एक लोहे का दरवाज़ा था, जंग लगा, पर बंद नहीं — खुला था। मैंने दरवाज़े को धक्का दिया। वह चरमराया और अंदर खुल गया।

अंदर रोशनी थी। पीली, धीमी। मैंने टॉर्च बंद की और अंदर कदम रखा।

यह पहला कमरा था। हवेली का पहला कमरा, वही लंबा कमरा जिसमें तीन पीढ़ियों की तस्वीरें होनी चाहिए थीं। मैंने दीवारों की तरफ़ देखा।

तस्वीरें नहीं थीं।

दीवारें खाली थीं। सिर्फ़ एक तस्वीर बीच में टँगी थी — बाबू हरनाम सिंह की, जिसके हाथ में लकड़ी की छड़ी थी। उसने मुझे ऐसे देखा जैसे कोई मेहमान आया हो।

रिया ने मेरा हाथ पकड़ा। "माँ।"

"हाँ।"

"यह कमरा पहला है, या दूसरा?"

"पहला।"

"तो दूसरे में तिजोरी है न?"

"हाँ।"

"तो वहाँ चलते हैं।"

मैंने उसके साथ दीवार के साथ बढ़ना शुरू किया। कमरा पहले से छोटा लग रहा था। दीवार के आख़िर में एक और दरवाज़ा था, लकड़ी का, बंद। मैं उसकी तरफ़ बढ़ी ही थी कि पीछे से एक आवाज़ आई।

"इतनी जल्दी कहाँ, मीरा?"

मैं पलटी। बाबू हरनाम की तस्वीर में कुछ नहीं बदला था। पर उसके नीचे, कुर्सी पर, कोई बैठा था। काजल हरनाम।

वह मुस्कुरा रही थी। "मैं तुम्हारा इंतज़ार ही कर रही थी। मुझे पता था, आज तुम आओगी।"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho