A Dark Secret – Chapter 345
"मुझे पता है।"
"तो किसकी है?"
"यह वही स्याही है।" मैंने उँगली उठाई, काली उँगली। "जो पीतल गली में बनती थी। और यह दीवार… रिया, यह दीवार मेरी है। मेरा नाम मेरी दीवार पर लिखा गया है।"
"तो?"
"तो इसका मतलब है कि अब वे मेरे घर तक आ गए हैं।"
उसी वक़्त एम्बुलेंस का हॉर्न बजा।
नहीं, बजा नहीं। फटा। जैसे कोई अंदर बैठकर हॉर्न दबा रहा हो। मैं भागी। आँगन के पीछे वह खड़ी थी, मेरी गाड़ी, सफ़ेद रंग उतरा हुआ, पर उसका हॉर्न अपने आप बज रहा था, बार-बार, दो सेकंड के अंतराल पर। मैंने दरवाज़ा खोला। खाली। सीट पर कोई नहीं। डैशबोर्ड पर रिया की तस्वीर चिपकी थी, वही, पर अब उसके नीचे एक छोटी पीली पुड़िया रखी थी जो मेरी जेब में होनी चाहिए थी।
मैंने हॉर्न बंद किया। फिर पुड़िया उठाई। वही — जिस पर रामदीन की लिखाई में "मेरा नाम" लिखा था। वह अब भी पीली थी, पर अब कोई लिखाई नहीं थी। खाली।
पीछे से भागते कदमों की आवाज़ आई। रामदीन गेट पर खड़ा था, वही भूरी जैकेट, हाँफ रहा था, सिर पर पसीना।
"चाचा?"
"मीरा।" वह बेंती की तरह झुका हुआ था, हाथ घुटनों पर। "आज सुबह मैं बस स्टैंड तक गया था। रोज़ जाता हूँ। पता है न। पर आज… आज मैं स्टैंड से आगे नहीं जा सका।"
"कैसे?"
"दस कदम चला, फिर हवा ने रोका। दस कदम आगे, फिर सड़क ने। बस स्टैंड के उस पार जो पुलिया है न—"
"हाँ।"
"उस पर पैर रखा और मैं वापस आ गया। मुझे पता ही नहीं चला कब। जैसे किसी ने मुझे कंधे से पकड़कर घुमा दिया। चालीस साल में पहली बार। पहली बार, मीरा।"
मैं उसके पास गई। "चाचा, आज क्या तारीख़ है?"
"पंद्रह।"
"और रखवाला कौन बना?"
वह रुका। आसमान की तरफ़ देखा, वही आदत। फिर बोला, "कोई नहीं बना। इसीलिए तो वे मुझे बाहर जाने नहीं दे रहे। रजिस्टर को रखवाला चाहिए। आज तक जो भी था, वह अब नहीं है। इनके पास एक ही रास्ता बचा है।"
"कौन सा?"
"तेरा घर। तेरी दीवार। तेरा नाम।" उसने दीवार की तरफ़ इशारा किया जहाँ स्याही अब भी गीली थी। "अगर रखवाला नहीं बना, तो रजिस्टर खुद एक नाम उठा लेगा। और वह नाम वही होगा जो सबसे ज़्यादा इस्तेमाल हुआ है।"
"मैं—"
"मीरा जोशी। तीस साल। तारीख़ आज।" उसने धीरे से पढ़ा। "यह नाम अब तेरी दीवार पर है। तेरी दीवार पर लिखा नाम उसका होता है।"
रिया मेरे पीछे आकर खड़ी हो गई। "माँ।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा। उसकी उँगली पर निशान अब फीका पड़ रहा था। मैंने रामदीन की तरफ़ देखा।
"हवेली का रास्ता आता है?"
"कौन सा?"
"पिछला। अंदर का। जिससे काजल को पता न चले।"
वह कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर बोला, "आता है। पर मीरा, एक बात है।"
"बोलो।"
"वह रास्ता दरवाज़े से नहीं, पीछे के कुएँ से जाता है। कुएँ के अंदर सीढ़ियाँ हैं, पुरानी, चालीस साल पहले की। उन पर मैंने अपनी ज़िंदगी में एक ही बार पैर रखा था। उसके बाद कभी नहीं।"
"आज रखना पड़ेगा।"
"रखूँगा।" उसने जैकेट की जेब से पान मसाला निकाला, मुँह में रखा, फिर बोला, "पर एक शर्त है।"
"क्या?"
"रास्ता मुझे आता है, पर अंदर जाते ही मेरा नाम भूल सकता है। अगर मैं भूलने लगूँ, तो मेरा नाम ज़ोर से बोलना, भले मैं चुप कर जाऊँ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तुम्हारा नाम?"
"हाँ।"
"चाचा, तुम अपना पूरा नाम आज तक नहीं बोले।"
वह मुस्कुराया, वही टूटी-फूटी मुस्कान। "पूछा नहीं तुमने।"
"अब पूछ रही हूँ।"
"रामदीन।" रुका। "रामदीन प्रसाद।"
"पूरा?"
"पूरा नहीं। पूरा तब बोलूँगा जब अंदर जाऊँगा।" उसने जेब से एक पुराना काग़ज़ निकाला, मोड़ा हुआ, पीला। "यह मेरे पास चालीस साल से है। इसमें वह औरत है जिसका नाम मैंने याद रखा था। इस पर उसका नाम है, गली है, आवाज़ भी लिखी है।" उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "यह तेरे पास रहेगा। अगर मैं भूल जाऊँ, तो तू इसे पढ़कर मुझे याद दिलाना।"
मैंने काग़ज़ लिया। खोला। ऊपर सिर्फ़ एक नाम लिखा था — "सुशीला"। मेरी माँ का नाम।
मेरा हाथ काँपा।
"यह मेरी माँ है।"
"हाँ।" रामदीन ने जैकेट की जेब में हाथ डाला, फिर बाहर निकाला। "और उसकी सहेली वह औरत है जिसका नाम कभी नहीं लिखा गया। दोनों एक ही गली में रहती थीं। पीतल गली। मकान नंबर पाँच। तेरी माँ पाँच में, वह चार में। और उन दोनों के बीच की दीवार पर… उसी स्याही से लिखा गया था।"
"क्या?"
"एक नाम। जो अब तक मिटा नहीं।"
मैंने रिया की तरफ़ देखा। वह चुप खड़ी थी। "माँ," उसने कहा, "मुझे भी चलना है।"
"नहीं।"
"माँ—"
"तू घर पर रहेगी।"
"घर पर?" उसने आँगन की दीवार की तरफ़ इशारा किया। "इस घर पर? जहाँ तेरा नाम लिखा जा रहा है?"
मैं रुकी। वह सही कह रही थी। घर अब सुरक्षित नहीं था। मैंने रामदीन की तरफ़ देखा।
"उसे साथ ले जाना ख़तरनाक है?"
"सब जगह ख़तरनाक है," उसने कहा। "अब कहीं भी सुरक्षित नहीं। पर हाँ, हवेली में वह और जगह से ज़्यादा असुरक्षित है। वहाँ रजिस्टर है।"
"तो?"
"तो यह तेरा फ़ैसला है।"
मैंने सोचा। फिर रिया का हाथ पकड़ा। "चल। पर एक बात सुन ले। जहाँ मैं कहूँ, वहीं रुकेगी। जहाँ मैं कहूँ, वहाँ से हटेगी। और अगर मैं कहूँ कि भाग, तो बिना सवाल भागेगी।"
"भागूँगी नहीं।"
"रिया—"
"माँ, मैं भागूँगी नहीं।" उसने मेरी आँखों में देखा। "अगर आज हम भागे, तो कल वे मेरा नाम ले लेंगे। और फिर तू किसके लिए लड़ेगी?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। बारह साल की, मेरी बेटी, पर आज उसकी आवाज़ किसी और की लग रही थी। मेरी माँ की। वही जल्दबाज़ी, वही ज़िद।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर मेरे पीछे रहेगी।"
"पीछे नहीं। बराबर।"
"रिया।"
"बराबर, माँ।"
मैंने रामदीन की तरफ़ देखा। उसने कंधे उठाए। "तेरी बेटी है," उसने कहा। "तेरे जैसी ही।"
हम तीनों एम्बुलेंस में बैठे। रामदीन पीछे बैठा, मैंने इंजन चालू किया। रिया आगे मेरे बगल में बैठी थी, कॉपी गोद में रखी। मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"कॉपी क्यों लाई?"
"लिखूँगी। जो भी होगा, लिखूँगी।"
"अभी नहीं।"
"अभी नहीं।" उसने कॉपी बंद कर दी।
मैंने गाड़ी आगे बढ़ाई। गली के मोड़ पर मैंने हेडलाइट जलाई और सामने देखा।
वहाँ, मोड़ के ठीक बीच में, एक पतली औरत खड़ी थी। लंबी, सफ़ेद साड़ी, हाथ में कुछ लपेटा हुआ — कपड़े में लिपटा कोई लंबा-सा। मैंने गाड़ी धीमी की। रामदीन ने पीछे से देखा और उसकी साँस रुक गई।
"यह…" वह बोला, "यह तो…"
"कौन है, चाचा?"
वह औरत हिली नहीं। बस खड़ी रही, मेरी गाड़ी की रोशनी में। उसका चेहरा अंधेरे में था, पर जिस तरह उसने हाथ में लिपटी चीज़ पकड़ी थी, वह किसी चीज़ की तरह नहीं, किसी के हाथ की तरह लग रही थी।
रामदीन पीछे से आगे झुका। "मीरा," उसकी आवाज़ फटी हुई थी, "आज से पहले मैंने इस औरत को कभी नहीं देखा। और मैं चालीस साल से इस शहर में हूँ।"
"तो?"
"तो इसका मतलब है कि यह आज पहली बार निकली है। इसका मतलब है कि रजिस्टर ने कुछ शुरू कर दिया है।"
मैंने गाड़ी रोक दी। उस औरत ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपना हाथ उठाया और कपड़े में लिपटी चीज़ को खोल दिया।
उसके हाथ में, लंबी पतली, वही पीतल की कलम थी। जो मेरी जेब में होनी चाहिए थी।
मैंने जेब में हाथ डाला। खाली थी।
वह औरत मुस्कुराई। फिर उसने उस कलम को अपने होंठों से लगाया, जैसे कोई आदमी पान खाते वक़्त चाकू से बीड़ा लगाता है। और फिर उसने कलम को अपनी बाईं हथेली पर रख लिया।
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